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आतंकवाद से मुक्ति की श्रीलंकाई घोषणा का अर्थ

अवधेश कुमार

भीषण आतंकवादी हमलों के बाद 15 दिन पूरे होते-होते श्रीलंका ने घोषणा कर दी कि अब उनका देश आतंकवाद से मुक्त है। यह बहुत बड़ी बात है। दुनिया में आतंकी हमला झेलने वाले किसी देश ने आज तक इस तरह से विश्वासपूर्वक घोषणा नहीं की थी। इस मायने में श्रीलंका बिल्कुल अलग उदाहरण बन रहा है। यह घोषणा सुनकर दुनिया को आश्चर्य हुआ। बाकायदे संवाददाता सम्मेलन बुलाकर कमांडरों और पुलिस प्रमुखों ने दावा किया कि ईस्टर आत्मघाती आतंकवादी हमलों में शामिल सभी आतंकवादियों का अंत हो गया है या उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। श्रीलंका के तटों और एयरपोर्ट को सुरक्षित कर दिया गया है, इसलिए देश अब पूरी तरह सुरक्षित है। लोग सामान्य जीवन की ओर लौट जाएं। 
ऐसी घोषणा किसी देश का सुरक्षा महकमा केवल लोगों को सांत्वना देने के लिए नहीं कर सकता। 21 अप्रैल को श्रीलंका के तीन चर्चों और तीन बडे़ होटलों में हुए हमले से पूरा देश हिल गया था। दस वर्ष पूर्व लिट्टे के खात्मे की घोषणा के बाद श्रीलंका आतंकवाद या हिंसक विद्रोह को लेकर एकदम निश्चिंत हो गया था। इसीलिए भारत द्वारा दी गई हमलों की चेतावनी को भी नजरअंदाज किया गया। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू श्रीलंका के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच संवाद का अभाव था। पहले प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने पत्रकार वार्ता बुलाकर कहा कि हमले की चेतावनी को हमसे छिपाया गया। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना ने पत्रकार वार्ता बुलाकर बताया कि उन्हें भी ऐसी चेतावनी से अवगत नहीं कराया गया। यह चर्चा इसलिए जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि श्रीलंका कितना लापरवाह देश हो गया था। किंतु हमले के कुछ घंटों के भीतर ही वह जिस तरह संभला, वह एक मिसाल है। एक साथ श्रीलंका की फौज और पुलिस की टीमें बनीं। भारत और अमेरिका की ओर से आई चेतावनियों का नए सिरे से विश्लेषण हुआ। भारत की एजेंसियों से लगातार संवाद  किया गया। पूरा प्रशासन दोषियों को खोज निकालने के लिए टूट पड़ा। प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति ने अपने मतभेदों को दरकिनार किया, विपक्ष को भी भरोसे में लिया गया, क्योंकि राजनीतिक एकता के बगैर आतंक मुक्ति का लक्ष्य पाना संभव नहीं होता। राजनीतिक एकता के बाद विशेष सुरक्षा योजना लागू हुई। पुलिस व सेना को लक्ष्य देकर पूरी छूट दी गई। सरकार का एलान था कि चाहे जो हो, अब एक भी हमले की आशंका नहीं रहनी चाहिए। 
किसी संदिग्ध को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने में कहीं कोई हिचक नहीं थी। देश के संपन्न, प्रभावशाली व्यापारी व बुद्धिजीवी पकडे़ गए। हमलावरों में दो भाई बडे़ मसाला व्यापारी के बेटे थे, जिन्होंने विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। जब पुलिस और सेना उनके घर पहुंची, तो तीसरे भाई ने भी आत्मघाती बेल्ट से अपने को उड़ा लिया। साफ था, पूरा परिवार आतंकवादी हो चुका था। उनके पिता को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। गली-गली को छान दिया गया। औपचारिक तौर पर यह भी नहीं बताया गया कि कितने लोग गिरफ्तार हुए। 
श्रीलंका सरकार के आतंकवाद विरोधी कुछ कदम देखिए। सबसे पहले सरकार ने देश के सारे चर्च बंद करवा दिए। कहा गया कि जब तक सुरक्षा सुनिश्चित न हो, सामूहिक प्रार्थना न की जाए। सबने इसे स्वीकार किया। मस्जिदों में भी सामूहिक नमाज को बंद किया गया। ज्यादातर मस्जिदें बंद हो गईं। फिर सरकार ने यह आदेश जारी कर दिया कि बुर्का या हिजाब पहनकर कोई बाहर न निकले। क्या हम भारत में इसकी कल्पना कर सकते हैं? इतना ही नहीं, एक ही समुदाय के करीब 600 विदेशी नागरिकों को देश से निकाल दिया गया, जिनमें 200 मौलाना थे, जो वहां पढ़ा रहे थे। सारे मदरसों व अन्य संबंधित शिक्षण संस्थाओं को छान दिया गया। पूरे देश में सफाई अभियान सा चल गया। स्वयं मुस्लिम समाज के प्रमुखों ने आगे बढ़कर सरकार का साथ दिया। क्या श्रीलंका सरकार को आप धार्मिक स्वतंत्रता की विरोधी कहेंगे? आखिर देश की सुरक्षा से बड़ा क्या हो सकता है? पहले सुरक्षा और उसके बाद ही बाकी गतिविधियां चल सकती हैं। अब धीरे-धीरे धर्मस्थल खुल रहे हैं। श्रीलंका द्वारा उठाए गए कदम हमारे लिए सीख हैं। ऐसे संकल्प, दृढ़ता और सशक्त कार्रवाइयों से ही सभ्यता के इस संकट का सामना किया जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column 13 may