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निजी डाटा की सुरक्षा से ही बढ़ेगी ई-कॉमर्स की रफ्तार

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

हाल ही में प्रकाशित रिटेल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत का ई-कॉमर्स बाजार वर्ष 2021 तक 84 अरब डॉलर का हो जाएगा, जबकि 2017 में यह 24 अरब डॉलर का था। भारत में ई-कॉमर्स बाजार सालाना 32 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या 60 करोड़ से भी अधिक होने के कारण देश में ई-कॉमर्स की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। इस समय देश की विकास दर सात फीसदी से ऊंची है, इसे नौ फीसदी से अधिक तक पहुंचाने में ई-कॉमर्स की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इस समय देश में परंपरागत खुदरा कारोबार और ई-कॉमर्स, दोनों के विकास की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। अब देश के छोटे और बड़े सभी रिटेल कारोबारियों ने ई-कॉमर्स के महत्व को समझ लिया है और वे इससे जुड़ी चुनौतियों का सामना करने की तैयारी भी कर रहे हैं। 
यह बात महत्वपूर्ण है कि देश में खुदरा कारोबार में जैसे-जैसे विदेशी निवेश बढ़ा, वैसे-वैसे ई-कॉमर्स की रफ्तार बढ़ती गई। वर्ष 2011 में मल्टी-ब्रांड खुदरा कारोबार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और एकल-ब्रांड खुदरा कारोबार में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देने का फैसला किया गया था। वर्ष 2016 में सरकार ने मार्केटप्लेस ई-कॉमर्स में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी थी। इस कदम का सर्वाधिक फायदा अमेजन और फ्लिपकार्ट को हुआ। सरकार की इस नीति से ही प्रोत्साहित होकर वालमार्ट ने 2018 की शुरुआत में फ्लिपकार्ट में नियंत्रक हिस्सेदारी लेने के लिए करीब 16 अरब डॉलर का निवेश किया। ई-कॉमर्स में सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति है, लेकिन शर्त यह है कि यह घरेलू विक्रेता कंपनियों की बिक्री का ही प्लेटफॉर्म तक सीमित हो। 
ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश के मानक बदलने से इन कंपनियों में ढांचागत बदलाव की जरूरत है। इसलिए नई ई-कॉमर्स नीति के मसौदे से काफी उम्मीदें हैं। इस मसौदे में ऐसी कुछ बातें खासतौर पर कही गई हैं, जिनका संबंध वैश्विक और भारतीय कंपनियों के लिए समान अवसर मुहैया कराने से है, ताकि छूट और विशेष बिक्री के जरिए बाजार को न बिगाड़ा जा सके। मसौदे में कहा गया है कि यह सरकार का दायित्व है कि ई-कॉमर्स से देश की विकास आकांक्षाएं पूरी हों तथा बाजार भी विफलता और विसंगति से बचा रहे। इस मसौदे के तहत ई-कॉमर्स कंपनियों के द्वारा ग्राहकों के डाटा की सुरक्षा और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर तमाम पाबंदी लगाए जाने का प्रस्ताव है। 
नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के तहत भविष्य में डाटा की वही अहमियत होगी, जो आज तेल की है। अभी डाटा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां कोई नियम-कानून नहीं है। इसका एक पहलू नागरिक और राजनीतिक अधिकार  हैं, जो निजता से जुड़े हैं तथा दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में डाटा एक बुनियादी संसाधन है। जिस देश के पास जितना ज्यादा डाटा संरक्षण होगा, वह देश आर्थिक रूप से उतना मजबूत होगा। इसीलिए ई-कॉमर्स नीति के नए मसौदे में डाटा के स्थानीय स्तर और भंडारण के विभिन्न पहलुओं पर जोर दिया गया है। इसे एक अहम आर्थिक संसाधन के रूप में मान्यता देने की बात कही गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह डाटा को भारत में ही रखना चाहती है, ताकि लोगों की व्यक्तिगत जानकारी का संरक्षण हो सके। 
पिछले कुछ समय में भारत के उपभोक्ताओं से संबंधित डाटा का विदेशी कंपनियों ने जमकर उपयोग किया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने गत वर्ष विभिन्न पेमेंट गेटवे को आदेश दिया था कि वे अपने डाटा को स्थानीय स्तर पर रखें, ताकि केंद्रीय बैंक उसकी बेहतर निगरानी कर सके। यह ध्यान रखा जाना भी जरूरी है कि देश के भीतर बड़े पैमाने पर तैयार डाटा के बिना देसी कंपनियों के द्वारा उच्च मूल्य के डिजिटल उत्पाद तैयार करने की संभावना बहुत कम है। इसीलिए अमेरिका सहित कई देश डाटा संरक्षण के इन कदमों का विरोध कर रहे हैं। डाटा प्रवाह को नियंत्रित करना बेहतर और उपयोगी है, लेकिन इसे व्यावहारिक बनाने के लिए कारगर प्रयासों की जरूरत स्पष्ट दिखाई दे रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column 12 march