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संबोधन से नहीं बदलेगी पुरानी मानसिकता

उदित राज, लोकसभा सदस्य

सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने सलाह दी है कि मीडिया को दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए। यह विषय बिना कारण उठ खड़ा हुआ है, फिर भी इसमें दम बहुत है। दलितों में भी एक बहुत ही छोटा वर्ग है, जो इस शब्द के प्रयोग से परहेज करता है और वैसे ही कुछ लोग गैर दलितों में हैं। शब्द किसी तथ्य या वस्तु को संबोधित करता है, लेकिन जहां जाति आती है,  वहां पर यह मापदंड नहीं लागू होता। जाति का नाम अच्छा रख लिया जाए, लेकिन इससे दूसरों की मानसिकता में फर्क नही पडे़गा। एक समय था, जब ‘भंगी’ शब्द का प्रयोग होता था, फिर उसका निषेध हुआ और उसकी जगह पर बाल्मीकि शब्द का प्रयोग होने लगा। इस जाति के लोगों को नाम परिवर्तन से संतोष जरूर हुआ, लेकिन दूसरों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं हुआ। जाति के नाम का परिवर्तन की प्रक्रिया को मानव विज्ञान में संस्कृतिकरण कहा जाता है। कथित निम्न जातियां प्रतिष्ठा प्राप्ति की स्पद्र्धा में नाम बदलती हैं। दलितों की कई ऐसी जातियां हैं, जो अपनी जाति के नाम को बदलने का प्रयास करती हैं, क्योंकि उन नामों के साथ मान-सम्मान नहीं जुड़ा।

यह व्यक्ति और जाति की अभिव्यक्ति है कि वह किस नाम से जाना जाए? संविधान में अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग हुआ है, लेकिन प्रचलन में दलित शब्द का प्रयोग ज्यादा है। दोनों शब्द एक ही अर्थ में इस्तेमाल होते हैं। कुछ लोगों का मत है कि अनुसूचित जाति का प्रयोग किया जाए और समुदाय के लोग स्वयं को क्यों दलित मानें? दलित शब्द के प्रयोग की शुरुआत की कोई निश्चित तिथि नहीं है, लेकिन 70 के दशक में इसका प्रचलन तेजी से बढ़ा। एक समय अफ्रीकी मूल के लोगों को ब्लैक या काला कहा जाता था, जो कि उनके लिए अपमानित करने वाला शब्द था। जैसे-जैसे उनमें जागृति आई अपने नाम में ही उन्हें सम्मान दिखने लगा। ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’ का नारा भी यहीं से निकला। दलितों का शोषण उनसे कहीं ज्यादा है। फिर भी उनमें अश्वेतों के बराबर न तो जागृति पैदा हुई है, और न ही स्वाभिमान।   

अगर इस शब्द के प्रयोग का निषेध कर दिया जाता है, तो परिस्थिति में परिवर्तन तो नहीं होगा, लेकिन क्षति ज्यादा होगी। दलित शब्द अब आक्रोश, एकता और संघर्ष का नाम बन गया है। दलित साहित्य का निर्माण हो चुका है। न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी इसका प्रयोग आम हो चुका है। अगर कोई भेदभाव या अत्याचार होता है, तो समझने और समझाने में भी आसान हो जाता है कि यह दलित से संबंधित है। दलित शब्द का प्रयोग न हो, तो पत्रकार को उसकी जाति का उल्लेख करना पड़ेगा, जिससे हो सकता है कि पूरे देश में मामले को ठीक से समझा ही न जा सके। तमिलनाडु में अनुसूचित जाति में जो जातियां हैं, वे उत्तर-भारत में तो नहीं होगी, फिर कैसे समझा जाएगा कि यह शोषित समाज से संबंधित है?

दलित और पिछड़ी जातियों में नाम बदलने के संस्कृतिकरण की होड़ है, लेकिन उससे हालात बदतर ही होंगे। बेहतर है कि हर जाति अपने गैर-संस्कृतिकरण वाले नाम से स्वयं को संबोधित करे, इसमें आत्म-विश्वास और आक्रोश का संबोधन है। अगर कोई अपना परिचय अपने मूल जाति नाम के साथ दे, तो सामने वाले को झटका लगेगा कि यह अपनी जाति का उल्लेख इतने आत्म-विश्वास से कर रहा है। दलित नाम का प्रयोग  केवल भारत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका भूमंडलीकरण हो चुका है। अब इसकी जगह पर दूसरा शब्द न संबोधन कर सकेगा और न ही सामाजिक व्यवस्था को सुगमता से रख सकेगा। दुर्भाग्य है कि हमारे यहां फोड़े का चीर-फाड़ न करके मरहम पट्टी कर दिया जाता है, जबकि जरूरत है कि चीरकर उसमें से मवाद निकालकर ठीक किया जाए। ये दलित क्यों कहलाते हैं, विस्तार से सबको जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि जो सुविधाएं- जैसे आरक्षण व रियायतें आदि मिलती हैं, उनको जायज सिद्ध किया जा सके। जब तक गैर-दलित व्यक्ति इनके दुखों और शोषण की वास्तविकता व उनके अनुभवों के पूरे इतिहास को नहीं समझ पाएगा, तब तक उसके मन में ईष्या और जलन ही रहेगी कि उनको विशेष सुविधा क्यों दी जा रही है? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:MP Udit Raj article in HIndustan on 08 september