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क्यों लगातार छूमंतर हो रही हैं हमारी खुशियां

महेश भारद्वाज, वरिष्ठ अधिकारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

बहुत सारे गम इसलिए होते हैं कि खुशी गैर-हाजिर होती है। जीवन में खुशी कैसे हाजिरी दे, इसका मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र काफी जटिल है। इधर दिल्ली सरकार ने स्कूलों में हैप्पीनेस को एक विषय के रूप में पढ़ाने की कवायद पिछले महीने से शुरू की है। सीबीएसई यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड भी बच्चों के कंधों पर से बोझ कम करने के प्रति गंभीर है। हिंसा की बढ़ती वारदातों और खबरों के बीच बच्चे कैसे खुश रहें, यह एक गंभीर मसला बन चुका है। खुशी का यह संकट बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जाति के लिए चुनौती बनकर उभर रहा है। पूरी दुनिया ही इस मुद्दे को लेकर चिंतित दिखाई दे रही है।

कोई देश कितना खुश है, कितना कम या ज्यादा खुश है, संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे मापने का बाकायदा एक पैमाना ही बना दिया है। इसी पैमाने पर संघ के 193 सदस्य देशों में खुशी के स्तर को मापने के लिए 2012 से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘वल्र्ड हैप्पीनेस इंडेक्स’ को तैयार करने में जिन मानदंडों का ध्यान रखा जाता है, उनमें प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी, जनता को उपलब्ध सामाजिक और संस्थागत समर्थन, अनुमानित स्वास्थ्यपूर्ण आयु, सामाजिक आजादी, समाज में व्याप्त आपसी भरोसा व उदारता और उस देश में भ्रष्टाचार के बारे में लोगों की राय जैसे कई मसले शामिल हैं। इसी के साथ हर साल पूरी दुनिया ने 20 मार्च को ‘वल्र्ड हैप्पीनेस डे’ भी मनाना शुरू कर दिया है।

आखिर ऐसा क्या हो गया कि खुशियों को लेकर चिंता विश्व व्यापी होने लगी है? अमेरिका के लिए तो सवाल और भी गहरा है, जो अमीर भी होता जा रहा है और खुशियों से दूर भी। भारत अगर इस क्षेत्र में पीछे है, तो उसके अपने कारण हैं। कहा जा सकता है कि कुछ कमी तो हैप्पीनेस को मापने के फॉर्मूले में भी है। इसमें रखे गए मानदंड पाश्चात्य विकसित देशों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्धारित किए गए हैं। ऊपरी पायदान वाले देशों में संसाधनों पर जनसंख्या का किसी प्रकार का दबाव नहीं है, जिसे भारत जैसे विकासशील देशों में प्रमुखता से देखा जा सकता है। जहां फिनलैंड कुदरती सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, अच्छे स्कूल और मुफ्त चिकित्सा सुविधाओं की वजह से अव्वल नंबर पर है, वहीं अमेरिका आमदनी बढ़ने के बावजूद मोटापे, ड्रग्स की लत, तनाव के कारण सूचकांक में लगातार नीचे जा रहा है। इस लिहाज से भारत में स्वीडन वाली सुविधाएं तो महज चंद लोगों और बड़े शहरों तक सीमित हैं और अमेरिका वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। बल्कि अभी तो आबादी के बड़े हिस्से को पेट भर भोजन और पीने का साफ पानी तक मयस्सर नहीं हो पा रहा है। जीडीपी में जरूर इजाफा हो रहा है, पर वह पर्याप्त नहीं है। ऊपर से राजधानी दिल्ली सहित देश के बड़े शहरों मे साफ हवा तक को लेकर हो रही चिंता ने हैप्पीनेस के विचार के होश उड़ा दिए हैं। हां, आबादी की अनुमानित औसत आयु अवश्य बढ़ी है, लेकिन उसके स्वास्थ्य और स्वास्थ्य-सुविधाओं को लेकर हालत में कोई खास बदलाव नहीं आया है। भ्रष्टाचार की चिंता तो स्थाई सी लगती है।

भारत में खुशियों में कमी की असल जड़ है संसाधनों की कमी, जिसके चलते कहीं पहले वाली पीढ़ियों ने, तो कहीं मौजूदा पीढ़ी ने अपने जीवन में अभाव देखे हैं और इससे लोगों में संचय करने की भावना तीव्रतर होती गई, जो बाद में सामाजिक मूल्यों के रूप में स्थापित हो गई। यहां लोग तीन पीढ़ियों तक की चिंता में लगे रहते हैं, भले ही खुद का जीवन कितना ही नारकीय क्यों न बना रहे। सामाजिक उत्तरदायित्व के मद्देनजर आने वाली पीढ़ी के लिए संवेदनशील होना कोई खराब बात नहीं है। यह राष्ट्र-निर्माण के लिए जरूरी भी है। फिर भी वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के बीच कोई रेखा तो खींचनी ही होगी। यह भी कहा जाता है कि खुशियों की चिंता से पहले जनता को भरपेट खाना देने की चिंता जरूरी है। नीतियां, आर्थिक स्थिति, संसाधन और सेहत वगैरह अपने आप में कोई खुशी नहीं है, लेकिन मिलकर उसकी जरूरी शर्त तो हैं ही। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Mahesh Bhardwaj article in Hindustan on 20 march