अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भारत और चीन को संतुलित करने में नाकाम होता नेपाल

राजीव मिश्र, पूर्व सीईओ, लोकसभा टीवी

नेपाल ने चीन से उसके चार बंदरगाहों व तीन लैंड पोर्ट के इस्तेमाल की इजाजत हासिल कर ली है। नेपाल भले ही इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कुछ और वैकल्पिक रास्ते बनाने की बात कह रहा हो, लेकिन इस कदम को भारत की सामरिक चिंताएं बढ़ाने वाला ही माना जाएगा। हालांकि काठमांडू में एक चर्चा यह भी है कि इस कदम के बाद नेपाल को भारत के साथ चल रही परियोजनाओं में अधिक मोल-भाव करने का मौका हासिल हो सकेगा। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस वर्ष की शुरुआत में यह कहा भी था कि वह चीन के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाकर नए अवसर तलाशेंगे और भारत के साथ पहले हुए समझौतों में अधिक फायदा लेने की कोशिश करेंगे। 

लेकिन इससे जुड़ा हुआ असल सवाल यह है कि क्या चीन के इन बंदरगाहों का इस्तेमाल नेपाल के लिए व्यापारिक रूप से फायदेमंद है? चीन ने नेपाल के लिए जो बंदरगाह आवंटित किए है, उनमें सबसे करीबी तियानजिन नेपाली सीमा से लगभग 3,000 किलोमीटर दूर है। वहीं, भारत के कोलकाता की दूरी नेपाल सीमा से करीब 700 किलोमीटर और विशाखापट्टनम की दूरी लगभग 1,200 किलोमीटर है। जाहिर है कि यह दूरी आयात और निर्यात, दोनों मामलों में नेपाल को महंगी पड़ने वाली है। यह दूरी एक ही सूरत में फायदेमंद हो सकती है, जब चीन नेपाल के लिए कुछ अतिरिक्त ढांचागत सुविधाएं तैयार करे। यह भी कहा जा रहा है कि चीन अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना में भारत को शामिल करने के लिए दबाव बना रहा है और नेपाल को दी जा रही सुविधाएं उसी का हिस्सा हैं।

लेकिन फिलहाल मुद्दा भारत के प्रति नेपाल के बदलते रवैये का है। नेपाल ने बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में भाग लेने पर सहमति जताई थी और फिर अचानक फैसला बदल दिया। ऐसा नहीं है कि ये सारी चीजें अचानक हो रही हैं। केपी शर्मा ओली की सरकार बनते ही यह साफ हो गया था कि नेपाल की नीतियों में अब चीन के प्रति झुकाव दिखाई देगा। यह कहा जाता है कि मधेसी आंदोलन और नाकाबंदी को भारत की रणनीति बताकर ओली नए नेपाली राष्ट्रवाद के नायक बने थे। अब चीन की मदद को पहाड़ी नेपालियों के बीच फायदेमंद सौदे के तौर पर प्रचारित कर इसका राजनीतिक लाभ लेने का मौका भी वह शायद छोड़ना नहीं चाहते।

नेपाल का व्यापार घाटा पहली बार 10 अरब डॉलर को पार कर गया है। महज पांच वर्ष पहले नेपाल का व्यापार घाटा 4.87 अरब डॉलर था, यानी पांच वर्ष में दोगुने से ज्यादा हो गया है। इस दौरान आयात भी दोगुना बढ़ा है, जबकि निर्यात में मामूली वृद्धि ही हुई। नेपाल का आयात 2013-14 में 5.57 अरब डॉलर का था, जो अब 11.28 अरब डॉलर का हो गया है। निर्यात 2013-14 में 70.31 करोड़ डॉलर था, अब 73.75 करोड़ डॉलर ही पहुंच सका है। अब आयात व निर्यात के लिए नेपाल ने चीन में जो वैकल्पिक रास्ते खोजे हैं, वे उसकी आर्थिक समस्या को बढ़ा देंगे। एक तरफ उसे आयात के लिए ज्यादा रकम खर्च करनी होगी, तो वहीं दूसरी तरफ उसका निर्यात महंगा हो जाएगा।

नेपाल दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतों का पड़ोसी है और इनमें से किसी से भी उसके शत्रुतापूर्ण रिश्ते नहीं हैं। वह चाहे, तो समझदारी दिखाकर इस स्थिति का फायदा उठा सकता है। शुरू में नेपाल ऐसा करता हुआ दिखा भी। नेपाल और चीन के बीच इस वर्ष टापनी प्रवेश बिंदु को शुरू करने को लेकर समझौता हुआ और केरूंग और रासूवगढ़ी में बेहतर आधारभूत ढांचा खड़ा करने पर भी सहमति बनी। एक समझौता दोनों देशों में रेल ढांचा विकसित करने को लेकर हुआ है। लेकिन समस्या तब शुरू हुई, जब नेपाल ने इसे संतुलित करने की बजाय रिश्तों को चीन के पक्ष में झुकाना शुरू कर दिया। वह भी उस समय जब भारत को नजरंदाज करना उसके लिए कई तरह से महंगा सौदा साबित हो सकता है। नेपाल के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 66 प्रतिशत की है। इसके अलावा भारत में करीब 60 लाख नागरिकों को रोजगार मिला हुआ है। फिर भी उसके लिए नेपाल का महत्वपूर्ण हो जाना अच्छा संकेत नहीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Lok Sabha TV Former CEO Rajiv Mishra article in HIndustan on 13 september