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रोजगार की बदलती दुनिया में हमारे लिए अवसर

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

जापान के उद्योग और व्यापार को बढ़ावा देने वाली सरकारी एजेंसी जापान विदेश व्यापार संगठन (जेईटीआरओ) ने कहा है कि जापान की औद्योगिक और कारोबार आवश्यकताओं में तकनीक व इनोवेशन का इस्तेमाल तेज होने से जापान में आईटी के साथ ही हेल्थकेयर, कृषि, अनुसंधान और विकास, सेवा व वित्त आदि क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षित कार्यबल की भारी कमी अनुभव की जा रही है। खासतौर से जापान की बुजुर्ग होती जनसंख्या और जापान में जन्म दर के गिरने की वजह से आईटी पेशेवरों की सबसे अधिक जरूरत है। यह कहा गया कि ऐसे में भारत जापान में अपने आईटी प्रोफेशनल्स भेजकर इस कमी को दूर कर सकता है। जापान में अभी 9.20 लाख आईटी पेशेवर हैं और अब भारत से दो लाख आईटी पेशेवरों को लेने की कार्ययोजना बनाई गई है। अनुमान है कि 2030 तक जापान में आठ लाख पेशेवरों को नौकरी दी जाएगी। जापान ने इसी जनवरी से भारतीय लोगों के लिए वीजा नियमों को आसान कर दिया है। यह सब तब हो रहा है, जब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देश वीजा-संबंधी नियमों को कठोर बनाकर भारत के प्रोफेशनल्स के बढ़ते कदमों को रोकना चाह रहे हैं।  

इस बीच वैश्विक रोजगार पर विश्व बैंक की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में कामकाजी आबादी कम हो रही है। वह भी तब, जब भारत की जनसंख्या में करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा वे लोग हैं, जिनकी उम्र 25 साल से कम है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। ऐसे में, भारत की युवा आबादी को अगर कुशल बनाया जाए, तो वह दुनिया के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। वैश्विक शोध अध्ययन संगठन ‘टॉवर्स वॉटसन’ की भारतीय श्रम की आर्थिक उपयोगिता की रिपोर्ट का जिक्र यहां जरूरी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की तुलना में भारत में श्रम ज्यादा सस्ता है। इस शोध अध्ययन में भारत व चीन में इस समय मिल रही मजदूरी की तुलना की गई है और निष्कर्ष निकाला गया है कि भारत की तुलना में चीन में श्रमिकों और कर्मचारियों को औसतन दोगुना वेतन मिलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब चीन अपने उद्योगों में उत्पादकता बढ़ाने के चाहे जितने प्रयास करे, वह अपनी जनसंख्या नीति में परिवर्तन करने के बाद भी कई वर्षों तक श्रमबल के घटने और श्रम लागत के बढ़ने से होने वाले नुकसान से बच नहीं सकेगा। अभी अपने सस्ते व प्रशिक्षित श्रमबल के कारण चीन लगातार विकास के मोर्चे पर दमदार  प्रदर्शन कर रहा है, पर उसकी यह बढ़त ज्यादा वक्त तक नहीं रहेगी। वॉटसन की रिपोर्ट के मुताबिक, सस्ते भारतीय श्रम को देश-दुनिया की रोजगार जरूरतों के मुताबिक तैयार किया जाना जरूरी है। 

अभी हमारी दिक्कत यह है कि भारत में करीब 20 फीसदी लोग ही ठीक से प्रशिक्षित हैं, जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या 91 प्रतिशत है। जाहिर है, इस सूरत को बदलने के लिए हमें कई बड़े कदम उठाने होंगे। एक ओर हमें शिक्षित युवाओं को कौशल विकास से प्रशिक्षित करना होगा, तो वहीं दूसरी ओर गांवों में काफी संख्या में जो गरीब, अशिक्षित और अद्र्धशिक्षित लोग हैं, उन्हें निम्न तकनीक वाले उत्पादन कार्यक्रमों में लगाना होगा। यह जरूरी है कि सरकार द्वारा कौशल प्रशिक्षण को दी जा रही प्राथमिकता के नतीजे धरातल पर दिखाई दें। और साथ ही नौजवानों को नए दौर के कौशल प्रशिक्षण से लैस किया जाए। पिछले दिनों इलेक्ट्रॉनिक व सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने तकनीकी क्षेत्र की कंपनियों के संगठन नैस्काम के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वर्चुअल रियल्टी, रोबोटिक प्रॉसेस ऑटोमेशन इंटरनेट ऑफ थिंग्स, बिग डाटा एनालिसिस, 3डी प्रिंटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, सोशल मीडिया-मोबाइल जैसे आठ नए क्षेत्रों में  55 नई भूमिकाओं में 90 लाख युवाओं को अगले तीन साल में प्रशिक्षित करने का जो अनुबंध किया है, उसे कारगर तरीके से क्रियान्वित करना होगा। ऐसा होने पर ही अगले एक दशक में भारत विश्व को बड़े पैमाने पर पेशवर व कौशल प्रशिक्षित युवा मुहैया कराने वाले देश के रूप में उभर सकेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Jayantilal Bhandari article in Hindustan on 19 march