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क्या कश्मीर में कामयाब होगी पंजाब की रणनीति

विनोद शर्मा, राजनीतिक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स

अभी चंद दिनों पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दावा किया था कि कश्मीर में पुलिसकर्मियों के अगवा परिजनों को सुरक्षा बलों के दबाव में आतंकियों को आजाद करना पड़ा। उनका कहना था कि ‘जिस तरह के हमारे पुलिसकर्मियों के परिजनों का अपहरण किया गया था... आपने सुना ही होगा कि हमारी फौज ने ऐसा दबाव बनाया कि उन्हें सभी को रिहा करना पड़ा।’ यह बात सच हो सकती है। मगर खबरों के मुताबिक इसमें उस जवाबी रणनीति का भी हाथ है, जिसकी पहल नए राज्यपाल सतपाल मलिक के दफ्तर से हुई। पुलिसकर्मियों के परिजन क्या इसलिए नहीं छोडे़ गए कि आतंकियों के परिवार वालों को पुलिस ने उठा लिया था?

यह संकट तब पैदा हुआ था, जब एन एन वोहरा के उत्तराधिकारी के रूप में मलिक ने राजभवन की कुरसी संभाली ही थी। यह शायद उनकी सियासी चतुराई थी कि गंभीर हालात को वह ऐसे मोड़ पर ले गए, जहां वर्जनाओं का कोई मतलब नहीं था। यह सब कुछ राज्यपाल के 31 अगस्त को हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के चंद घंटों के भीतर किया गया, जिसमें उन्होंने इसकी पुष्टि की थी कि उनका प्रशासन संविधान के अनुच्छेद 35 ए पर सुनवाई टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाला है। मलिक की पहली राजनीतिक चुनौती स्वाभाविक रूप से घाटी की सड़कों पर शांति बहाली थी, जो 1954 के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका के विरोध में प्रदर्शनों से उबली जा रही थीं। यह अनुच्छेद दरअसल, जम्मू-कश्मीर की विधायिका को यह पूर्ण-अधिकार देता है कि वह राज्य के मूल निवासियों को परिभाषित करे और नौकरियों व संपत्ति के स्वामित्व के मामले में विशेषाधिकार रखे। गवर्नर के शब्द थे, ‘एक चुनी हुई सरकार ही लोगों के विचार अभिव्यक्त कर सकती है’। बहरहाल, एक अधिकारी का कहना था कि पुलिसकर्मियों के परिजनों का जिस तरह से अपहरण किया गया, उसने पुलिस और आतंकियों के बीच के उस अघोषित समझौते को तोड़ दिया था, जिसमें परिवार वालों को संघर्ष से बाहर रखने की बात थी। 

दुनिया भर के आतंकियों और विद्रोहियों की रणनीति यही है कि सुरक्षा बलों के सामने स्थानीय लोगों को खड़ा किया जाए। इसका उद्देश्य अपराधी और कानून के रखवाले के अंतर को खत्म करना होता है। यहां यह मायने नहीं रखता कि इसे किसने शुरू किया, क्योंकि जीत चाहे जिसे मिली हो, हिरासत में लेने और अगवा करने के इस सिलसिले ने लगभग तीन दशक पुराने उस अलिखित समझौते को तोड़ दिया, जो जंग में शामिल पक्षों के घर वालों को अंतहीन संघर्ष में भी बचाता रहा।

कश्मीर घाटी में पुलिस-प्रशासन को आतंकवाद-विरोधी अपनी कार्रवाइयों और अपराध व हिंसा से आम लोगों की सुरक्षा के मूल दायित्वों के निर्वहन के बीच एक संतुलन साधना होता है। लेकिन फिलहाल यह संतुलन नहीं दिख रहा। जिस तरह से वे मुठभेड़ों और खुफिया तंत्रों की सफलता को प्रचारित करते हैं, वे अक्सर उनके स्थानीय सूत्रों के लिए घातक साबित होते हैं। उचित वक्त पर भय दिखाना जरूरी है, मगर पुलिस मानवाधिकारों की कीमत पर लोगों का समर्थन जुटाने की रणनीति नहीं बना सकती। 

राज्यपाल के सामने फिलहाल एक बेहद मुश्किल कार्य है। घाटी में अभी आतंकियों की संख्या लगभग 300 है, लेकिन स्थिति उतनी ही गंभीर है, जितनी यह 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में थी। उस समय, आतंकियों की संख्या को लेकर सशस्त्र बलों का दावा हजारों में होता था, जिन्हें सीमा पार पाकिस्तान से समर्थन मिलता था। विद्रोह को मिलता स्थानीय समर्थन और इसमें स्थानीय नौजवानों की बढ़ती सहभागिता को पुलिस द्वारा ‘पकड़ो और मारो’ की रणनीति से कम नहीं किया जा सकता। यहां तक कि सेना और अन्य वर्दीधारी बलों को भी कानून के शासन का सम्मान करना चाहिए। यही एकमात्र तरीका है, जो स्थानीय नौजवानों को संगठित करने की आतंकियों की रणनीति की काट हो सकता है। मगर यह छवि तभी बन सकती है, जब वहां एक ऐसी पुलिस हो, जो आतंकियों से मोर्चा तो लेती हो, मगर बेगुनाहों को भी परेशान नहीं होने देती हो। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Times Political Editor Vinod Sharma article in Hindustan on 07 september