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शहरों में लोगों पर क्यों गिरने लगे विशालकाय होर्डिंग

अपने देश में कई लोग बड़े-बड़े होर्डिंग या सूचना-पट्ट की ओर शक की निगाह से देख रहे होंगे। देश की व्यावसायिक राजधानी कहलाने वाले महानगर मुंबई में होर्डिंग गिरने से 14 लोगों की मौत हुई है और 74 घायल हुए...

शहरों में लोगों पर क्यों गिरने लगे विशालकाय होर्डिंग
Monika Minalके के पाण्डेय, प्रोफेसर, अर्बन मैनेजमेंट, आईआईपीएWed, 15 May 2024 11:37 PM
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अपने देश में कई लोग बड़े-बड़े होर्डिंग या सूचना-पट्ट की ओर शक की निगाह से देख रहे होंगे। देश की व्यावसायिक राजधानी कहलाने वाले महानगर मुंबई में होर्डिंग गिरने से 14 लोगों की मौत हुई है और 74 घायल हुए हैं। यह विशालकाय विज्ञापन-पट्ट 120 फुट का था, जबकि इतने बड़े पट्ट या होर्डिंग लगाने को मंजूरी नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों, शहरों में होर्डिंग का आकार अलग-अलग तय है। हालांकि, ऐसे शहर भी हैं, जहां होर्डिंग को लेकर स्थानीय नियम-कायदे तय नहीं हैं। 
मुंबई में जो त्रासद हादसा हुआ है, वह साफ तौर पर स्थानीय निकायों और रेलवे की लापरवाही को दर्शाता है। मुंबई जैसे महानगर में प्राथमिक जिम्मेदारी तो बीएमसी की है, पर बीएमसी ने रेलवे को और रेलवे ने बीएमसी को जिम्मेदार ठहराया है। देखने की बात है, बीएमसी ने रेलवे या आरोपियों को दो साल बाद नोटिस भेजा है। इस होर्डिंग की शिकायत भी तब हुई, जब होर्डिंग के सामने आ रहे पेड़ों को काटा जा रहा था। आखिर बीएमसी को इस गलत होर्डिंग तक पहुंचने में इतना समय क्यों लगा? क्या बीएमसी की स्थानीय निगरानी व्यवस्था दुरुस्त नहीं है? नियमों को तोड़कर होर्डिंग लगाने वाले क्या इतने ताकतवर हो गए हैं कि रेलवे और बीएमसी के अधिकारी उनके खिलाफ कदम नहीं उठा पा रहे हैं? 
यह हादसा हमारी व्यवस्था की कमी का नतीजा है। इतने विशाल होर्डिंग लगाने से पहले मृदा परीक्षण होना चाहिए था, निर्माण सामग्री व निर्माण को परखना था और फिर लगातार सुरक्षा जांच की जरूरत थी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह लापरवाही नई नहीं है और हमारे ज्यादातर शहरों में व्याप्त है। सबको याद होगा मोरबी सेतु हादसा। गुजरात में सेतु टूट गया था, वहां भी सुरक्षा जांच या सेफ्टी ऑडिट का काम नहीं हुआ था। निगम के तहत आने वाले ऐसे ढांचों की समय-समय पर जांच की व्यवस्था होनी ही चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है। 
सामान्य तौर पर ही देख लीजिए, हमारे शहरों में जो फुटपाथ हैं, वह बुजुर्गों या दिव्यांगों के अनुकूल नहीं होते हैं। अच्छा कहलाने वाले शहरों में भी सड़कों या फुटपाथ की देखरेख पर्याप्त नहीं है। जरूरी सुविधाओं की परख नियमित रूप से होनी चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है। मिसाल के लिए, कुछ वर्ष पहले तिरुवनंतपुरम के नगर निगम ने विशेष अभियान चलाकर जांच की और शहर में 54 हजार होर्डिंग को गलत पाया। शहरों में होर्डिंग लगाकर विज्ञापन शुल्क वसूला जाता है। नगरीय निकायों की अन्य स्रोतों से आय घटी है और वे होर्डिंग इत्यादि से ज्यादा कमाने के उपाय करते रहते हैं। विज्ञापन शुल्क को हटाया तो नहीं जा सकता और न होर्डिंग पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, पर इसके नियम-कायदे स्पष्ट होने चाहिए। एक बार जो प्रक्रिया तय हो जाए, तो उसकी पूरी पालना करनी चाहिए। निकाय विज्ञापनों के जरिये कमाई करे, पर सुरक्षा से किसी तरह का समझौता न करे। शहर के तय और सुरक्षित स्थानों पर ही विधिवत होर्डिंग लगाए जाएं। अवैध या गलत होर्डिंग को हटाना चाहिए।
केंद्र सरकारों को भी होर्डिंग संबंधी दिशानिर्देश तय करने चाहिए और अलग-अलग राज्यों में अपने हिसाब से दिशानिर्देश लागू करने चाहिए। जैसे पहाड़ी राज्यों के दिशा-निर्देश अलग हो सकते हैं। अवैध होर्डिंग के खिलाफ लोगों को भी जागरूक होना चाहिए और नगर निकायों को निगरानी के काम में आम लोगों की मदद लेनी चाहिए। जैसे बेंगलुरु में निकाय ने लोगों से कहा कि वे होर्डिंग के फोटो खींचकर भेजें। ऐसा होने से फायदा यह है कि अवैध होर्डिंग की जांच की जा सकती है या असुरक्षित होर्डिंग के बारे में शिकायत समय रहते सामने आ सकती है। अभी निगरानी का अभाव है, जिससे नगर निकाय को आर्थिक नुकसान के साथ ही आम लोगों को भी परेशानी होती है। अभी मुंबई में क्या हुआ, आम लोगों पर ही मुसीबत टूट पड़ी। आम लोग अगर सजग होते, तो यह नौबत ही नहीं आती। लोग अगर चाहें, तो मिलकर कहीं से भी असुरक्षित या अवैध होर्डिंग को हटवा सकते हैं। शहरों में विशालकाय होर्डिंग की संख्या बढ़ती चली जा रही है, अत: अपने स्तर पर शहरों के नीति नियंताओं को नियम-कायदे बना लेने चाहिए। श्रेष्ठ तरीका ऐसा होना चाहिए कि निकायों को कमाई भी हो और शहरवासियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)