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दक्षिण अफ्रीका में भी चुनावी जनादेश का इंतजार 

जब भारत में चुनाव समापन की ओर बढ़ चला है, तब दक्षिण अफ्रीका में भी चुनाव पूरा होने वाला है। यहां 4 जून को नतीजे आएंगे और वहां 2 जून को। दक्षिण अफ्रीका में 30 साल पहले अमानवीय रंगभेद को खत्म करने में...

दक्षिण अफ्रीका में भी चुनावी जनादेश का इंतजार 
Monika Minalविवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकारWed, 29 May 2024 09:26 PM
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जब भारत में चुनाव समापन की ओर बढ़ चला है, तब दक्षिण अफ्रीका में भी चुनाव पूरा होने वाला है। यहां 4 जून को नतीजे आएंगे और वहां 2 जून को। दक्षिण अफ्रीका में 30 साल पहले अमानवीय रंगभेद को खत्म करने में नेल्सन मंडेला की अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) की खास भूमिका थी। एएनसी तभी से सत्ता पर काबिज है। उसे वहां बसे हुए लगभग 16 लाख भारतवंशियों का भी साथ मिलता रहा है। वैसे, इस बार आशंका है कि 1994 के बाद पहली बार एएनसी बहुमत से दूर रह सकती है। वहां मिली-जुली सरकार बन सकती है। वर्तमान सरकार से वहां के भारतवंशी भी नाखुश हैं।
दक्षिण अफ्रीका में गोरों के शासन के अंत के बाद यह देश में सातवां आम चुनाव है। करीब पौने तीन करोड़ मतदाता देश की नई सरकार को चुन रहे हैं। अगर एएनसी को  चुनावों में 50 फीसद से कम वोट मिले, तो पार्टी को गठबंधन सरकार बनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उस हालत में एएनसी के नेता और राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा को मिली-जुली सरकार बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। बताते चलें कि रामाफोसा 2019 में भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थे। एएनसी ने 2018 में बदनाम राष्ट्रपति जैकब जुमा को हटाकर रामाफोसा को देश का राष्ट्रपति बनाया था। जैकब जुमा पर 2009 और 2018 के बीच राष्ट्रपति पद पर रहते भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। जुमा पर यह भी आरोप लगा था कि उन्होंने भारत के उद्योगपति ‘गुप्ता ब्रदर्स’ (अनिल और अजय) को खूब लाभ पहुंचाया। उत्तराखंड पुलिस ने बीते दिनों एक बड़े बिल्डर को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गुप्ता ब्रदर्स को गिरफ्तार किया था। बेशक, एएनसी से अवाम की नाराजगी की मुख्य वजह जुमा का कुशासन था। चूंकि जुमा गुप्ता ब्रदर्स के संरक्षक माने जाते थे, इस कारण 2021 में दक्षिण अफ्रीका में भारतवंशियों पर हमले भी हुए थे। जैकब जुमा की गिरफ्तारी के बाद वहां हालात बिगड़ गए थे। भारतीय मूल के नागरिकों को जोहानिसबर्ग और क्वाजुलु नटाल में निशाना बनाया गया था। 
तभी से वहां के भारतवंशी अपनी सरकार से नाराज हैं। हालांकि, एक दौर में एएनसी के प्रति भारतवंशियों के मन में गहरा प्रेम था और इसकी बड़ी वजह नेल्सन मंडेला थे। वैसे, एएनसी को 2019 के आम चुनाव में पहली बार झटका लगा था, तब पार्टी को 57.50 फीसद वोट मिले थे। इस बार वोट में गिरावट की आशंका है।
आज दक्षिण अफ्रीका हत्या के मामले बीते 20 साल के उच्च स्तर पर है; देश में लगभग हर 20 मिनट में एक व्यक्ति का कत्ल होता है। बेरोजगारी, बिजली व जल संकट के स्थायी हल न खोज पाने के कारण जनता एएनसी से दूर हो रही है। बहरहाल, देश की मुख्य विपक्षी पार्टी, सेंट्रिस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (डीए) का नेतृत्व जॉन स्टीनहुइसन करते हैं और इसे कई लोग गोरे दक्षिण अफ्रीकियों की पार्टी मानते हैं। इस चुनाव के लिए डीए ने छोटी विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया है। यह गठबंधन सत्ता में आ सकता है। वैसे डीए जरूरत पड़ने पर एएनसी के साथ भी जा सकता है और एएनसी भी डीए की मदद ले सकती है। एक अन्य दल इकोनॉमिक फ्रीडम फाइटर्स (ईएफएफ) भी एएनसी के साथ खड़ा हो सकता है। ईएफएफ एक वामपंथी पार्टी है, जिसका नेतृत्व जूलियस मालेमा कर रहे हैं।
भारतीय मूल के कुछ नेता भी वहां चुनाव मैदान में हैं। इनमें पैट्रिक पिल्ले शामिल हैं, जिन्होंने डेमोक्रेटिक लिबरल कांग्रेस (डीएलसी) नाम से पार्टी बनाई है। डीएलसी ने भारतीय मूल के 10 उम्मीदवार उतारे हैं। एस सिंह विपक्षी पार्टी डीए के प्रत्याशी हैं। भारतीय मूल के तीन प्रत्याशी- फसीहा हसन, मागेश्वरी गोवेंदर और शाएक इमरान सुब्रथी एएनसी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इनके अलावा भी कुछ भारतवंशी निर्दलीय भाग्य आजमा रहे हैं। भारतवंशियों के वहां ज्यादा संख्या में जीतने पर जाहिर है उनकी समस्याओं का समाधान होगा। दोनों देशों के बीच संबंध पुराना है और प्रगाढ़ता बढ़नी चाहिए। दोनों के बीच व्यापार भी 10 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। दोनों लोकतांत्रिक देशों में बेहतर सरकार और परस्पर संबंध विस्तार होना चाहिए, पर फिलहाल दोनों को चुनावी नतीजों का इंतजार है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)