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सुविधा की सियासत में सिर्फ एक हथियार वोटिंग मशीन

नव-निर्वाचित भाजपा सांसदों की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईवीएम पर टिप्पणी थी, तो विपक्ष पर कटाक्ष, पर मतदान प्रक्रिया पर हमारी राजनीति को भी वह बेनकाब कर गई। मोदी ने कहा कि 4 जून को जब...

सुविधा की सियासत में सिर्फ एक हथियार वोटिंग मशीन
Monika Minalराज कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकारThu, 13 Jun 2024 12:35 AM
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नव-निर्वाचित भाजपा सांसदों की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईवीएम पर टिप्पणी थी, तो विपक्ष पर कटाक्ष, पर मतदान प्रक्रिया पर हमारी राजनीति को भी वह बेनकाब कर गई। मोदी ने कहा कि 4 जून को जब चुनाव परिणाम आ रहे थे, तब उन्होंने किसी से पूछा कि ईवीएम जिंदा है या मर गई? मोदी का कटाक्ष विपक्ष द्वारा एक बार फिर चुनाव के वक्त ईवीएम की विश्वसनीयता पर उठाए गए सवालों के संदर्भ में था। वीवीपैट के 100 प्रतिशत मिलान या बैलेट पेपर से मतदान की मांग सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिए जाने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष लगातार ईवीएम पर आशंकाएं जताता रहा। आरोप था कि संदेहास्पद ईवीएम व सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर सत्ता पक्ष चुनाव जीतने पर आमादा है, पर परिणामों के बाद इस मुद्दे पर मौन पसर गया। बेशक, चुनाव प्रणाली को संदेह से परे होना चाहिए, मगर उस पर बिना ठोस आधार के सवाल भी नहीं उठाए जाने चाहिए। भारतीय चुनाव प्रक्रिया की साख पूरी दुनिया में है। उस पर देश में ही सवाल उठना विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सुखद तस्वीर पेश नहीं करता।
वैसे, विपक्ष में रहते हुए भाजपा भी ईवीएम पर संदेह का शोर मचाने में पीछे नहीं रही। साल 2009 में भाजपा के नेता जीवीएल नरसिम्हा ने ईवीएम की विश्वनीयता पर सवाल उठाते हुए पुस्तक लिखी थी। उसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी, जो तब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। मामला अदालत तक गया था। 2014 में भाजपा केंद्र की सत्ता में आ गई, तो उसके लिए ईवीएम पवित्र गाय-सी हो गई और विपक्ष में पहुंच गए दलों को उसमें खामियां नजर आने लगीं। मार्च, 2017 में जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए, तो 13 दलों ने परिणामों पर सवाल उठाया। चुनाव आयोग से शिकायत भी की, पर 2018 के अंत में हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता मिल गई, तो ईवीएम पर विपक्ष मौन हो गया। पिछले साल हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार पर ईवीएम पर उंगली उठाई गई, लेकिन हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में जीत पर ईवीएम निर्दोष रही।
कुछ ही दिनों बाद दिसंबर में फिर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ लोकसभा चुनाव में वीवीपैट के 100 प्रतिशत मिलान की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिसे खारिज करते हुए डेटा सुरक्षा संबंधी कुछ जरूरी निर्देश चुनाव आयोग को दिए गए। मामला चुनाव प्रक्रिया में जनता के विश्वास से जुड़ा है, इसलिए उसे और अधिक पारदर्शी व विश्वसनीय बनाने के मुद्दे पर शीर्ष अदालत में सुनवाई आगे भी होगी, मगर उसकी इस नसीहत पर चुनाव आयोग व राजनीतिक दलों को गौर करना चाहिए कि संदेह जताने से जनता के मन में संशय पैदा होता है, जो अच्छा नहीं है। जब छेड़छाड़ के संदेह को साबित करने के लिए आयोग ने राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया था, तब कोई दल नहीं पहुंचा। जिन लोगों ने मतपत्रों से चुनावों का दौर देखा है, उन्हें मतदान केंद्रों पर कब्जे और मतपत्रों की लूट की डरावनी स्मृतियां होंगी, इसलिए नई प्रौद्योगिकी से मुंह मोड़कर उस युग में वापसी की मांग तर्कसंगत नहीं।
यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे यहां ईवीएम अचानक नहीं आ गई। जांच-परख के बाद चरणबद्ध ढंग से अपनाया गया है। देश में ईवीएम का विधिवत इस्तेमाल पहली बार 1998 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर किया गया था। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश में इससे मतदान कराया गया और जीत सत्ता पक्ष की नहीं, विपक्ष की हुई। इस बीच मतदान प्रक्रिया में वीवीपैट समेत कई सुधार भी किए गए हैं। याद रहे कि 2019 के चुनाव में आंध्र प्रदेश के मईदुकुर में ईवीएम और वीपीपैट की गिनती में 14 वोटों का अंतर पाया गया था, तो 2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार के एक विधानसभा क्षेत्र में ईवीएम की गिनती से पहले के बजाय बाद में गिने गए बैलेट पेपर हार-जीत के अंतर से ज्यादा रहे। इसलिए चुनाव प्रक्रिया को संदेह से परे रखने के लिए जरूरी सुधार जारी रहने चाहिए। यह जिम्मेदारी सांविधानिक संस्था चुनाव आयोग की ज्यादा  है, जिसकी साख पर इतने सवाल पहले कभी नहीं उठे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)