फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन नजरियासऊदी अरब में भी महिलाओं के हक में बहने लगी हवा

सऊदी अरब में भी महिलाओं के हक में बहने लगी हवा

किसी खिली चांदनी रात में एक ऐसे स्विमिंग पूल की कल्पना कीजिए, जिसके पानी का तापमान नहाने के बिल्कुल अनुकूल हो और बगल की रेतीली जमीन पर प्रागैतिहासिक कालीन पहाड़ियों की छाया पड़ रही हो, जिससे वह पूल...

सऊदी अरब में भी महिलाओं के हक में बहने लगी हवा
Monika Minalनिष्ठा गौतम, वरिष्ठ पत्रकारTue, 06 Feb 2024 12:09 AM
ऐप पर पढ़ें

किसी खिली चांदनी रात में एक ऐसे स्विमिंग पूल की कल्पना कीजिए, जिसके पानी का तापमान नहाने के बिल्कुल अनुकूल हो और बगल की रेतीली जमीन पर प्रागैतिहासिक कालीन पहाड़ियों की छाया पड़ रही हो, जिससे वह पूल एक आरामदायक कोकून जैसा बन जाता हो। इस पूल से दो युवक तैरकर बाहर निकलते हैं और पानी में डूबे बिस्तरों पर लेट जाते हैं, तभी काली-गुलाबी बिकनी में एक औरत पानी में छलांग लगाती है। वे एक-दूसरे का अभिवादन भी करते हैं। यह कोई असाधारण घटना नहीं है, लेकिन यह मंजर बहुत साधारण भी नहीं। बमुश्किल पांच साल पहले तक सऊदी अरब में किसी महिला को अपनी जुल्फें बाहर निकालने की हिम्मत नहीं होती थी, सार्वजनिक रूप से बिकनी पहनना तो बहुत दूर की बात है। भले ही, अल-उला शहर के इस स्विमिंग पूल के आसपास अबाया पहने कई महिलाएं दिख जाती हैं, लेकिन अब हवा का रुख बदल रहा है।
अल-उला सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ के केंद्र में है। सऊदी सरकार का ‘टॉप-डाउन’ नजरिया (ऊपर से रिसकर विकास-कार्यों का नीचे तक आना) बेशक विवादास्पद हो सकता है, लेकिन यह दृष्टिकोण स्पष्ट और सराहनीय बदलाव ला रहा है। यह परिवर्तन सिर्फ पांच सितारा रिसॉर्ट्स तक सीमित नहीं है। कई लोग जेद्दा के पुराने दिनों को याद कर सकते हैं, जब महिलाएं दिखती तक नहीं थीं। मगर अब अप्रवसान डेस्क से लेकर बिक्री काउंटर तक हर जगह औरतें नजर आती हैं। उन्हें महरम पुरुषों (जिन मर्दों से औरतों को शादी करने की अनुमति नहीं होती) द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता है और न मुतावा (मजहबी पुलिस) अब दिखती है। साफ है, सऊदी अरब उन्मुक्तता को बढ़ावा दे रहा है और अल-उला को इसकी सामाजिक प्रयोगशाला कह सकते हैं। 
कहा जाता है कि कभी यह शहर शापित था, क्योंकि यहां के लोग चेतावनियों को नजरंदाज करते हुए बुतों की पूजा किया करते थे, जिसके कारण इस पर आसमानी बिजली गिरी। मगर अब यहां हर जगह मूर्तियां दिखती हैं। यहां की प्रागैतिहासिक चट्टानों में लौह युग की कब्रें हैं, जिनका अध्ययन मानव इतिहास के बारे में जानकारी जुटाने के लिए किया जा रहा है। यहां इस्लाम-पूर्व की जीवनशैली की झलक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को दिखाई जा रही है। यहां के पत्थरों में इतिहास, रेगिस्तान में कला, बाजार में तमाम तरह की खाने-पीने की चीजें, और रिसॉर्ट्स में महंगे गैर-प्राकृतिक उत्पाद मौजूद हैं। जाहिर है, एक ऐसे देश के लिए, जो जीवाश्म ईंधन और मजहबी यात्रा पर फलता-फूलता रहा हो, यह विश्वास की एक लंबी छलांग है। इसका असर भी खूब दिख रहा है। अब यहां के तमाम रिसॉर्ट्स भरे होते हैं, जिनमें सुबह में सूर्य नमस्कार, तो देर शाम बौद्ध धर्म का ध्यान कराया जाता है और ये सभी काम महिलाएं कराती हैं।
इसकी पुरातात्विक खोजों में छात्राएं शामिल हो सकें, इसके लिए विदेश में प्रशिक्षण की खातिर उनको छात्रवृत्ति दी जा रही है। ऐसा लगता है कि क्राउन प्रिंस ने अपनी शर्तों पर ‘सऊदी ्प्रिरंग’ लाने का फैसला कर लिया है। अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर जरूर कुछ कहा जा सकता है, लेकिन पूर्णता पर जोर अक्सर अच्छे सुधारों के क्रियान्वयन को रोकता है। इसलिए एक समय में एक कदम, और जब यह कदम महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की दिशा में उठाया जा रहा है, तो निश्चय ही यह स्वागत के योग्य है।
बीते हफ्ते से गैर-मुस्लिम विदेशी राजनयिक रियाद के विशेष स्टोर से शराब खरीद सकते हैं। यह कोई छोटा बदलाव नहीं है, क्योंकि यह व्यक्तिगत पसंद के अधिकार की रक्षा करता है। इस बदलाव का मकसद वैश्विक प्रक्रियाओं में भागीदारी बढ़ाना है। सऊदी अरब यह समझने के लिए संयुक्त अरब अमीरात के रास्ते पर चल पड़ा है कि तेल और मजहब पर्याप्त नहीं है। पारंपरिक सोच रखने वालों के लिए भले ही अल-उला एक शापित शहर हो, पर अब वे इसको नजरंदाज भी नहीं कर सकते। मदीना क्षेत्र का एक उत्साही गाइड हंसते हुए कहता है, अब हमारे पास ताकत है, आपको यदि यह पसंद नहीं, तो यह आपकी समस्या है। निस्संदेह, यह हंसी अब सऊदी अरब का सबसे बड़ा पर्यटक आकर्षण है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)  

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें