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Hindi News ओपिनियन नजरियाशहबाज की बीजिंग यात्रा में दिखी दोनों देशों की मजबूरी 

शहबाज की बीजिंग यात्रा में दिखी दोनों देशों की मजबूरी 

चीन-पाकिस्तान साझा बयान मेें आधी सदी पुराने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को याद करने की जरूरत आखिर  क्यों पड़ी? वैसे तो हरेक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए चीन-यात्रा उसकी परंपरा का हिस्सा है, मगर शहबाज..

शहबाज की बीजिंग यात्रा में दिखी दोनों देशों की मजबूरी 
Monika Minalदिनकर पी श्रीवास्तव, पूर्व राजदूतTue, 11 Jun 2024 10:03 PM
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वैसे तो हरेक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए चीन-यात्रा उसकी परंपरा का हिस्सा है, मगर शहबाज शरीफ की 8 जून को संपन्न हुई पांच दिवसीय चीन-यात्रा समय के लिहाज से काफी अहम है। शहबाज उस वक्त बीजिंग गए, जब देश में बजट पेश करने की तैयारी हो रही थी। अमूमन, ऐसे समय में प्रधानमंत्री की देश में मौजूदगी जरूरी होती है। मगर शहबाज शरीफ की यात्रा के लिए बजट को टाल दिया गया। यह वाकया पाकिस्तान की दयनीय आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। ऐसे में, सबसे बडे़ देनदार देश की यात्रा जरूरी थी। बदले में चीन ने भी ताईवान, शिनजियांग, शिझांग, हांगकांग और दक्षिण चीन सागर पर पाकिस्तान से समर्थन वसूल किया!
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के प्रतिनिधिमंडल में उनके मंत्रिमंडल के लगभग सभी वरिष्ठ मंत्री शामिल थे। दिलचस्प यह है कि सेना प्रमुख जनरल आसिफ मुनीर भी इसमें शामिल थे। वैसे, मुनीर का शामिल होना मुनासिब था, क्योंकि वह ‘विशेष निवेश सुविधा परिषद्’ (एसआईएफसी) के सदस्य हैं। इस संस्था की स्थापना पाकिस्तान में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए की गई थी। 
अपनी बिगड़ती आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए चीनी मदद पाकिस्तान की प्राथमिकता है। वह इस वक्त अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से तीन वर्ष में छह अरब डॉलर की ऋण सुविधा पर बातचीत कर रहा है। जाहिर है, आईएमएफ यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि उसके ऋण का उपयोग केवल चीनी कर्ज चुकाने के लिए न किया जाए। ऐसे में, चीनी ऋण भुगतान के ‘रोलओवर’ की जरूरत होगी और वह भी न केवल चालू वित्त-वर्ष के लिए, बल्कि कर्ज की नई सुविधा की अवधि के लिए भी। शहबाज सरकार के अस्तित्व के लिए दीर्घकालिक पुनर्भुगतान कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं। सवाल है, चीन पाकिस्तान को बचाने के लिए किस हद तक जाएगा? 
ताईवान पर चीनी रुख का समर्थन पाकिस्तान के पिछले सभी बयानों की एक विशेषता रही है। मगर इस वर्ष पिछली प्रतिबद्धताओं से भी आगे बढ़कर कहा-लिखा गया। क्या यह केवल पाकिस्तान की चीन पर अत्यधिक निर्भरता को दर्शाता है या यह चीन की भू-राजनीतिक मजबूरियों को भी दर्शाता है? पिछले साल से चीन ने ताईवान से जुड़े जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा दिया है। ताईवान में लाई चिंग-ते के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उसने उस पर सैन्य दबाव बढ़ा दिया है। जाहिर है, वह जो एकतरफा बदलाव लाना चाहता है, उसके लिए उसे कूटनीतिक समर्थन की जरूरत है। साझा बयान में कहा गया है, ‘दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 2758 के अधिकार पर कोई विवाद या चुनौती नहीं है।’ यह प्रस्ताव 1971 में स्वीकार किया गया था, जब कम्युनिस्ट चीन ने ताईवान को संयुक्त राष्ट्र के सदस्य के रूप में प्रतिस्थापित किया था। तथ्य यह है कि अपने अस्तित्व से जुडे़ आर्थिक संकट का सामना कर रहे देश पाकिस्तान के साथ संयुक्त बयान में चीन को आधी सदी बाद इसे याद करने की जरूरत पड़ी। साफ है, इससे चीन की धौंसपट्टी से उत्पन्न प्रतिरोध के संकेत मिलते हैं।
संयुक्त बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान ‘राष्ट्रीय एकीकरण के लिए चीन की सरकार के हर प्रयास का पूरी मजबूती से समर्थन करता है और ताईवान की स्वतंत्रता के किसी भी रूप का विरोध करता है।’ ताईवान पर चीनी रुख का पाकिस्तान द्वारा यह उत्साही समर्थन अमेरिका से उसके रिश्ते को जटिल बना सकता है। आईएमएफ से कर्ज की मंजूरी के लिए उसे अमेरिकी समर्थन की जरूरत है। 
शहबाज शरीफ की इस यात्रा से पहले पाकिस्तानी मीडिया ने अपनी खबरों से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के दूसरे चरण की शुरुआत को लेकर काफी उम्मीदें बढ़ा दी थीं। मगर इस कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान में 46 अरब डॉलर के चीनी निवेश के शुरुआती दावों के विपरीत यह 25 अरब डॉलर ही ला सका। दोनों देशों का संयुक्त वक्तव्य नई-नई योजनाओं की घोषणा करने के बजाय मौजूदा कार्यक्रम को ‘अपग्रेड’ करने तक सीमित है। इस बीच, पाकिस्तान को 2025-26 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्य के तौर पर दो साल के कार्यकाल के लिए चुना गया है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)