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Hindi News ओपिनियन नजरियाकृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े नियम जापान जैसे बनने चाहिए

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े नियम जापान जैसे बनने चाहिए

साल 1991 में भारत ने अपने पूर्वी पड़ोसियों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापक आर्थिक और सामरिक संबंध बनाने के लिए ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ यानी ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ बनाई थी, जो पश्चिम पर...

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े नियम जापान जैसे बनने चाहिए
jaspreet bindra
Pankaj Tomarजसप्रीत बिंद्रा, तकनीक विशेषज्ञSun, 23 Jun 2024 10:33 PM
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साल 1991 में भारत ने अपने पूर्वी पड़ोसियों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापक आर्थिक और सामरिक संबंध बनाने के लिए ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ यानी ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ बनाई थी, जो पश्चिम पर निर्भरता संबंधी पुरानी सोच से अलग थी। भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआई वाले इस दौर में यह विचार कर रहा है कि इस ताकतवर नई तकनीक को उसे कैसे बढ़ावा देना चाहिए और किस तरह इससे जुड़े नियम बनाने चाहिए, क्योंकि एआई हमारे उद्योग, समाज और भू-राजनीति को नया रूप दे सकती है। निस्संदेह, एआई से बड़े आर्थिक और सामाजिक लाभ मिलने की उम्मीद है, पर कॉपीराइट, मानवाधिकार हनन, निजता व निष्पक्षता से जुड़ी आशंकाएं भी कायम हैं। लिहाजा सवाल उठ रहे हैं कि एआई को नियमों के अधीन करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
मेरा मानना है कि भारत को पूर्व की ओर देखना चाहिए और जापान से सीखना चाहिए, जो ऐसे नियम बना रहा है, जिसमें नवाचार का माहौल बनाने के साथ-साथ सुरक्षित एआई के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। उसकी नजर में एआई ऐसा प्रेरक है, जो नवाचार और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में दशकों से आए ठहराव को दूर कर सकती है। 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने के लिए हम भी एआई से इसी तरह मदद ले सकते हैं। दरअसल, जापान ने 2023 के जी-7 शिखर सम्मेलन का फायदा उठाया, जिसमें ‘हिरोशिमा एआई प्रोसेस’ (एआई सिस्टम बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमन को बढ़ावा देने वाला फ्रेमवर्क) द्वारा एआई को विनियमित करने के लिए प्रावधान बनाने पर जोर दिया गया। इसमें दो दृष्टिकोण सामने आए- पहला, यूरोपीय संघ या चीन के नियमों की तरह सख्त कानून बनाया जाए, और दूसरा, पारंपरिक सिद्धातों और निगरानी को दरकिनार करके अपेक्षाकृत नरम कानून बनाना। जापान ने दूसरा नजरिया चुना।
स्टेलेनबोश यूनिवर्सिटी की इंगे ओडेन्डाल ने अपने शोध-पत्र में उसके प्रयासों के बारे में बताया है। इनमें पहला है, सरकार का सुविधा-प्रदाता के रूप में काम करना- जापान की सरकार नवाचार से जुड़े प्रयासों को अपनी मुट्ठी में कैद करने के बजाय उसके लिए सुविधा मुहैया कराने वाली संस्था बनना पसंद करती है। वह निजी क्षेत्र को अगुवा मानती है और अपने विभागों को उनकी मदद के लिए सक्रिय रहने को कहती है। हम भी ऐसा कर सकते हैं। हमारी सरकार को निजी क्षेत्र को केंद्र में रखना चाहिए और तमाम मंत्रालयों के माध्यम से सहयोगी भूमिका निभानी चाहिए। दूसरा है, वित्तपोषण और निवेश पर ध्यान- जापान ने जेनरेटिव एआई, घरेलू डाटा सेंटर और स्थानीय चिप उत्पादन के लिए एक बड़ा कोष बनाया है। इससे तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी में प्रोत्साहन व सब्सिडी प्रदान की जाती है। भारत में भी इस तरह का कोष है, जो इंडिया एआई योजना के तहत बना है। मगर अंतर यह है कि इसका उपयोग प्रसंस्करण इकाइयों की खरीद पर अधिक हो रहा है, न कि जापान की तरह नवाचार पर।
तीसरा है, सरकार, अकादमिक और उद्योग में सामंजस्य- ‘एआई जापान आरऐंडडी नेटवर्क’ देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, निजी क्षेत्र व वैश्विक तकनीकी कंपनियों के साथ मिलकर एआई शोध और कंपनियों से जुड़ी नीतियों की सिफारिश करता है। भारत भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। मजबूत निजी क्षेत्र के साथ-साथ वैश्विक तकनीक में हमारा खास दखल है। चौथा है, घरेलू क्षमता का निर्माण- जापान अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) बनाने की सोच रहा है। भारत में भी ऐसे कई मॉडल बन रहे हैं और उनको सरकारी मदद से लाभ होगा। आधार, यूपीआई जैसे कदमों से पता चलता है कि आम लोगों को केंद्र में रखकर हम तकनीक विकसित कर सकते हैं। इसी तरह जेनरेटिव एआई को आम जनजीवन में उतारा जा सकता है। और पांचवां है, दार्शनिक नजरिया- निजता और डाटा उपयोग जैसे बुनियादी मसलों पर पूरब और पश्चिम की सोच अलग है। पश्चिमी देशों के लिए जहां निजता का अर्थ है, अकेले रहने का अधिकार, वहीं पूरब में इसका मतलब है, सामूहिक व सामाजिक निजता। ऐसे में, हमें एआई नियमन को लेकर उचित ही जापान की ओर देखना चाहिए, जिससे हमारी संस्कृति मिलती है और जो नवाचार व नियमन को लेकर संतुलित नजरिया भी रखता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)