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मजहब का अधिक इस्तेमाल करने वाले समाज को संदेश 

सांप्रदायिकता को एक जवाब मिल गया है, पर यह कहना गलती होगी कि यह जनादेश पुरानी शैली की धर्मनिरपेक्षता की जीत है। अधिकतर हिंदू मतदाताओं ने धर्मनिरपेक्ष सामान्य ज्ञान को आज हिंदुत्व-युक्त सामान्य ज्ञान

मजहब का अधिक इस्तेमाल करने वाले समाज को संदेश 
Monika Minalप्रशांत झा, एसोसिएट एडिटर, हिन्दुस्तान टाइम्सWed, 05 Jun 2024 10:37 PM
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अधिकतर हिंदू मतदाताओं ने धर्मनिरपेक्ष सामान्य ज्ञान को आज हिंदुत्व-युक्त सामान्य ज्ञान में बदल लिया है, मगर वे ऐसे सुसंगत, एकीकृत और समरूप हिंदू राजनीतिक पहचान बनाने के पक्ष में भी नहीं गए हैं, जो लगातार मुस्लिमों से मतभेद रखती है।
मुस्लिम मतदाता अपनी राजनीतिक आवाज और प्रतिनिधित्व चाहते हैं। अपनी पहचान के आधार पर वे किसी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रहना नहीं चाहते, पर उनका भारत के संविधान में पूरा विश्वास है, वे हिंदू सामाजिक समूहों के साथ व्यापक चुनावी गठबंधन की जरूरत व अहमियत को पहचानते हैं। वे मुस्लिम पहचान-केंद्रित पार्टियों के बजाय मुख्यधारा के लोकतांत्रिक दलों के पीछे चलना चाहते हैं। 
भारतीय मतदाता अपनी जातिगत पहचान से परे जाने के इच्छुक तो हैं, पर वे अभी भी अपनी जातिगत पहचान को अपने जीवन के अनुभव की रोशनी में देखते हैं। जाति की लामबंदी को वे एक वैध राजनीतिक साधन मानते हैं और वास्तविक या कथित जाति-आधारित अन्याय के एवज में लाभ चाहते हैं।
वास्तव में, यही वह त्रि-आयामी सामाजिक संदेश है, जो 2024 के जनादेश से उभर रहा है। यह निष्कर्ष चुनाव अभियान की व्यापक रूपरेखा, सार्वजनिक संदेश और पार्टियों के राजनीतिक कार्यों पर आधारित है। विपक्ष ने दावा किया कि भाजपा संविधान को बदलने और दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों के लिए तय आरक्षण हटाने पर तुली हुई है; हालांकि, भाजपा ने कहा कि उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है। भाजपा की ओर से यह दावा किया गया कि विपक्ष पिछडे़ हिंदुओं के आरक्षण को हटाकर मुसलमानों को देना चाहता है; जबकि ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियों ने कहा कि उनकी ऐसी कोई योजना नहीं है। 
धर्म के सवाल पर भाजपा ने एक दशक तक मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपने दायरे में नगण्य ही रखा और मुस्लिम सियासी पहचान के किसी भी दावे को सांप्रदायिक माना। कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे भाजपा के कथित मुस्लिम विरोधी रुख को ठोस बल मिला। यह विपक्षी दलों के लिए चुनाव अभियान का मुद्दा बन गया। विपक्ष ने मुस्लिम वोटों को एकजुट करके मुकाबला किया। इस पृष्ठभूमि में जनादेश क्या संकेत दे रहा है?  
तथ्य यह है कि मतदाताओं ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी का दरजा दिया है, इसका मतलब है कि दूसरे कार्यकाल में उसके कुछ कामों की लोकप्रियता की कुछ हद तक पुष्टि हुई है, चाहे वह सीएए का पारित होना हो या अनुच्छेद 370 को प्रभावी ढंग से निरस्त करने का निर्णय हो। यह ध्यान देने की बात है कि कश्मीर व राम मंदिर मामले में विपक्ष ने भाजपा को खुली चुनौती देने की हिम्मत नहीं की। यहां तक कि विपक्ष ने मुस्लिमों को आनुपातिक रूप से वाजिब संख्या में टिकट देने से भी परहेज किया। विपक्ष की रणनीति में भी हिंदुत्व से लैस सामान्य ज्ञान का उदय हो चुका है। विपक्ष ने वैचारिक लड़ाई को टाल दिया और इसलिए यह कहना गलती होगी कि यह जनादेश पुरानी शैली की धर्मनिरपेक्षता की जीत है। फैजाबाद में भाजपा की चुनावी हार स्थानीय कारकों के चलते हो सकती है, पर इसे चुनावी मकसद के लिए धर्म के लगातार उपयोग या दुरुपयोग के विरोध के रूप में भी देखा जा सकता है। 
इस लोकसभा चुनाव में यह साफ हुआ कि आरक्षण की वर्तमान संरचना आगे भी केंद्रीय विषय बनी रहेगी। कोई भी पार्टी दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के आरक्षण को हटाने की हिम्मत नहीं करेगी। एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस का वोट शेयर और सीट संख्या बढ़ी है, उसके मतदाताओं में युवा, पिछड़े और दलित मतदाता भी शामिल हैं, यह दर्शाता है कि इनकी मांगों में दम है।
तथ्य यह है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है - जातिगत जनगणना की मांग का समर्थन किए बिना और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज किए बिना। यह बताता है कि हिंदू समर्थक मतदाता बरकरार हैं और जातिगत पहचान-आधारित राजनीति भी जारी रहेगी। इसके मूल में पहचान-आधारित न्याय है, जिसने पहचान आधारित अंध-राष्ट्रवाद पर जीत हासिल की है। यह एक संदेश है कि पार्टियों को समाज में बंटवारे की खाई को गहरा करने के बजाय उसे पाटने पर ध्यान देना चाहिए।