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भारत जैसी विविधता वाले देश पापुआ न्यू गिनी से सबक 

पापुआ न्यू गिनी देश इस बात की मिसाल है कि बहुत ज्यादा विविधता वाले समाज तब तक गहरे संकट में पड़े रह सकते हैं, जब तक कि वे खुद को नियंत्रित करने के लिए जरूरी सामाजिक पूंजी विकसित नहीं कर लेते। यह देश...

भारत जैसी विविधता वाले देश पापुआ न्यू गिनी से सबक 
Monika Minalनितिन पई,निदेशक, तक्षशिला संस्थानMon, 26 Feb 2024 11:06 PM
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पापुआ न्यू गिनी देश इस बात की मिसाल है कि बहुत ज्यादा विविधता वाले समाज तब तक गहरे संकट में पड़े रह सकते हैं, जब तक कि वे खुद को नियंत्रित करने के लिए जरूरी सामाजिक पूंजी विकसित नहीं कर लेते। यह देश इंडोनेशिया के सबसे पूर्वी हिस्से में और ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित द्वीप समूह पर बसा है। इसकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा दावा यह है कि इसकी आबादी दुनिया में सबसे वैविध्यपूर्ण है, जहां 850 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं और हजारों जातियां व जनजातियां बसी हैं। पापुआ महाराष्ट्र या गुजरात के आकार का देश है, जहां एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। 
यह देश ज्वालामुखी विस्फोट, शहरी दंगों, अंतर-आदिवासी हिंसा, ईंधन की कमी, विदेशी मुद्रा समस्याओं और प्रधानमंत्री को बदलने के लिए चल रही संसदीय साजिशों से गुजरता रहा है। आप कह सकते हैं कि यह देश अनेक प्रकार के संकटों में फंसा हुआ है। 150 साल पहले यूरोपीय उपनिवेशीकरण से पहले जिन लोगों की सामाजिक संरचना एक गांव से भी बड़ी नहीं थी, वे अब एक आधुनिक राज्य के नागरिक हैं। यहां अनेक छोटे-छोटे समूह अपनी-अपनी भाषा-बोली को बचाए हुए हैं। अपनी जाति और जनजाति के प्रति यहां लोगों में गजब की निष्ठा है। लोग नेताओं से उम्मीद करते हैं कि वे सामाजिक समूह के हित का पूरा ध्यान रखेंगे। ऐसे में, वे राष्ट्रीय शासन की तुलना में स्थानीय शासन के प्रति ज्यादा लगाव दिखाते हैं। एक और खास बात यह है कि विदेशी मिशनरियों ने यहां भले ही लोगों को बड़ी संख्या में ईसाई बना दिया है, पर लोग अपनी आदिवासी पहचान को भी बनाए हुए हैं। 1975 में ऑस्ट्रेलिया से आजादी मिलने के बाद पापुआ न्यू गिनीवासियों ने एक राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिश की है, पर यह काम अभी भी प्रगति पर है। एकेश्वरवादी धर्म, राष्ट्रवाद और सर्वदेशीयवाद के सामने जनजातीय समूह शक्तिशाली बने हुए हैं।
यह देश इतनी विविधताओं से भरा है कि सदियों तक इसका समाज खुद को आदिवासी संघों में संगठित नहीं कर सका है, शासन और प्रशासन को तो छोड़ ही दें। यहां ग्रामीण समुदाय भौगोलिक रूप से इतने अलग-थलग, सांस्कृतिक रूप से अलग और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं कि वे एकजुट होकर एक बड़ी इकाई नहीं बना सके हैं। दरअसल, इस देश को जिस गति से सामाजिक पूंजी का निर्माण करना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। यह देश न सुदृढ़ राजनीतिक तंत्र सुनिश्चित कर सका है, न कानून का शासन बनाए रख सका और न बुनियादी सार्वजनिक वस्तुओं-सुविधाओं का विकास हुआ है। 
मतलब, अति-विविधता के चलते यहां सामाजिक पूंजी बहुत कमजोर रही है, जिससे किसी सार्थक पैमाने पर लोगों से प्रभावी सहयोग लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में, निम्न मानव विकास संकेतक, उच्च अपराध और भ्रष्टाचार को भी बल मिलता है। छोटे-छोटे समूह अपने-अपने लोगों को रोजगार व सुविधा दिलाने की कोशिश करते हैं, जैसे भारत में भी कई परिवारों, समूहों या जातियों में देखने में आता है। भारतीय समाज में भी पापुआ की तरह ही समस्याएं हैं। यहां भी चुनावी राजनीति शासन के विभिन्न दृष्टिकोणों पर नहीं, बल्कि अपने-अपने समूह के ईद-गिर्द संगठित होती है। बड़ी संख्या में ऐसे दल और नेता हैं, जो बार-बार अपने स्वार्थ के लिए हस्तक्षेप करते हैं। ऐसे में, सरकारें कुल वोटों के आधे से भी कम वोटों के साथ शासन करती हैं। संघवाद खराब नजर आने लगता है। भाषा को लेकर भी झगड़े होते रहते हैं और किसी भी कानून को सभी पर लागू करने में कठिनाई आती है। 
फिर भी यह ध्यान देने की बात है कि अति-विविधता वाला भारत बेहतर प्रदर्शन करने में क्यों सक्षम है? हमारे पास साझी सभ्यता, भूगोल व मजबूत सामुदायिक भावना है। हमारी धार्मिक, जातीय और राष्ट्रीय पहचान जातिगत सीमाओं से ऊपर उठ जाती है। समाज के रूप में भारतीयों की समझ विकसित है। इसी बुनियाद पर हम सामाजिक पूंजी का व्यापक भंडार बना सकते हैं, ताकि सभी समूहों को जोड़ सकें और सभी को लाभ पहुंचा सकें। बहरहाल, पापुआ की चुनौती अपने सैकड़ों छोटे समाजों को एक देश में बदलना है। यह आसान नहीं होगा। यह काम इस देश के लोगों को ही करना होगा। भारत भी इसकी मिसाल है कि मजबूत देश बनाने के प्रयासों का कोई अंत नहीं है। 
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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