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कैंसर के इलाज में नई उम्मीद जगाती इम्यूनोथेरेपी

अब कैंसर-कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट करने के लिए रोगी की प्रतिरक्षा-प्रणाली को मजबूत करने पर अध्ययन हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अनुमान के मुताबिक, साल 2018 में कैंसर से...

कैंसर के इलाज में नई उम्मीद जगाती इम्यूनोथेरेपी
Monika Minalनिरंकार सिंह, पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोषWed, 14 Feb 2024 09:29 PM
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आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और दवाओं ने कई असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर ली है और कुछ को तो रोक भी दिया है। लेकिन खतरनाक कैंसर सभी चिकित्सा विधियों को चकमा देकर आगे बढ़ने वाला रोग साबित हुआ है। पिछले 20 वर्षों में दुनिया भर में कैंसर के मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। हर साल देश-दुनिया में इससे लाखों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अनुमान के मुताबिक, साल 2018 में कैंसर से कुल 96 लाख मौतें हुई थीं। 
बीएमसी कैंसर जर्नल में प्रकाशित आईसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के 2022 के एक अध्ययन में यह अनुमान जताया गया है कि साल 2025 तक भारत में कैंसर के 2.98 करोड़ मामले हो सकते हैं। नीति आयोग के अनुमान के हिसाब से इस साल भारत की 1.4 अरब आबादी की यह करीब दो फीसदी होगी। आईसीएमआर का अध्ययन इनमें से 40 फीसदी मामले इन सात अंगों में से किसी एक के कैंसर का बताता है- फेफड़े, स्तन, भोजन नलिका, मंुह, पेट, लीवर और गर्भाशय ग्रीवा। 
चिकित्सा विज्ञान में आजकल कई पद्धतियों से कैंसर का उपचार किया जाता है और अनेक मामलों में ये पद्धतियां कारगर भी साबित हो रही हैं। इन दिनों इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल कैंसर के इलाज में भी किया जाने लगा है। इसमें हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर सेल्स से लड़ने के लिए मजबूत बनाया जाता है। कैंसर का इलाज अभी तक रेडिएशन (विकिरण) या कीमोथेरेपी (रसायन चिकित्सा) के भरोसे है, जिसमें कैंसर-कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है या फिर सर्जरी के भरोसे, जिसमें ट्यूमर को पूरा निकाला जाता है। मगर हीमैटोलॉजिकल या रक्त कैंसर सरीखे रोगों की उन्नत अवस्था में इन उपचारों की सफलता-दर 10 फीसदी से भी कम है। फिर कीमो या रेडिएशन के ‘साइड इफेक्ट’, जैसे थकान, मितली आना, दस्त, शरीर-दर्द, त्वचा व बालों में बदलाव, रक्तस्राव, अनिद्रा आदि हिम्मत तोड़ने वाले कारक हैं, क्योंकि ये दोनों इलाज कैंसर-कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाते हैं। मौजूदा इलाज कैंसर की हरेक कोशिका को खत्म कर देने की गारंटी नहीं देते, इसलिए उन्नत अवस्था के मामलों में इसके दोबारा होने की आशंका 30-40 फीसदी से भी ज्यादा बनी रहती है।
इम्यूनोथेरेपी या प्रतिरक्षा-उपचार इस लिहाज से काफी अहमियत रखता है। बीते कुछ वर्षों में कैंसर रिसर्च ने इस पर ध्यान केंद्रित किया है कि कैंसर-कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट करने के लिए खुद रोगी के शरीर की प्रतिरक्षा-प्रणाली को कैसे मजबूत व सक्रिय किया जा सकता है? नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मेडिकल आंकोलॉजी के पूर्व प्रमुख डॉक्टर ललित कुमार के मुताबिक, बीमारी से निजात पाने का शरीर का अपना तंत्र है। कैंसर में यह तंत्र ठप हो जाता है। बहुत सारे नए उपचारों का वास्ता इस बात से है कि इन कोशिकाओं को छिन्न-भिन्न करने के लिए शरीर को कैसे तैयार किया जाए? इम्यूनोथेरेपी यह सुनिश्चित करती है कि केवल ट्यूमर को निशाना बनाया जाए, स्वस्थ कोशिकाओं को नहीं, जिससे साइड इफेक्ट कम होते हैं। यदि कैंसर दोबारा होता है, तो इम्यून या प्रतिरक्षा-प्रणाली नुकसानदेह कोशिकाओं को पहचान सकती है। 
वैसे तो, अब हर प्रकार के कैंसर रोगियों को यह थेरेपी दी जाती है, मगर अमेरिका में रेक्टल कैंसर के मरीजों पर हुए ट्रायल में इसके बेहतर परिणाम दिखे हैं। इस कारण इम्यूनोथेरेपी को लेकर बड़ी उम्मीदें जगी हैं। वहां रेक्टल कैंसर, लंग्स कैंसर और ओरल कैंसर में मुख्य रूप से यह थेरेपी दी जाती है। दुनिया के कई देशों में इम्यूनोथेरेपी के जरिये जानलेवा कैंसर का इलाज हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका, चीन, इजरायल और यूरोप में इम्यूनोथेरेपी के रोमांचक परीक्षण इसे कैंसर के इलाज की संभावना से भरपूर टेक्नोलॉजी के तौर पर स्थापित कर रहे हैं, जबकि भारत को इलाज की ज्यादा जरूरत है, क्योंकि यहां मामले अधिक हैं, पर नए इलाज दूसरे देशों में पेश किए जा रहे और हो रहे हैं। ऐसे में, ‘सेल्युलर इंटरवेंशन’ या कोशिका विधि से भारत में कैंसर के निदान व इलाज में बडे़ बदलाव की उम्मीद की जा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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