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Hindi News ओपिनियन नजरियाइंसानी फितरत को समझने में नाकामी और एग्जिट पोल 

इंसानी फितरत को समझने में नाकामी और एग्जिट पोल 

दो दिन पहले आपने क्या नाश्ता किया? चूंकि नाश्ता रोजमर्रा का मामला है, अत: नाश्ते के फैसले पर ज्यादा विचार नहीं किया जाता है। हममें से अधिकांश लोग भूल जाते हैं कि हमने दो दिन पहले क्या भोजन ग्रहण...

इंसानी फितरत को समझने में नाकामी और एग्जिट पोल 
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Monika Minalबीजू डोमिनिक, सीईओ, फाइनल माइल कंसल्टिंगThu, 13 Jun 2024 10:11 PM
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दो दिन पहले आपने क्या नाश्ता किया? चूंकि नाश्ता रोजमर्रा का मामला है, अत: नाश्ते के फैसले पर ज्यादा विचार नहीं किया जाता है। हममें से अधिकांश लोग भूल जाते हैं कि हमने दो दिन पहले क्या भोजन ग्रहण किया था। मगर क्या हममें से बहुत लोग भूल गए होंगे कि हमने 2024 के आम चुनाव में किस प्रत्याशी को वोट दिया था? मतदान करना कोई रोजमर्रा का व्यवहार नहीं है। अधिकांश लोगों के लिए, मतदान एक बहुत सोच-विचारकर लिया गया फैसला है। यह संभव नहीं है कि कोई यह भूल जाए कि उसने किस राजनीतिक दल को वोट दिया था। यदि ऐसा है, तो ज्यादातर एग्जिट पोल सही भविष्यवाणी में नाकाम क्यों रहे?
हर निर्वाचन क्षेत्र के बड़े मतदाताओं का सटीक प्रतिनिधित्व करने वाले सही नमूनों का चयन न कर पाना, आकलन में गलती का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। सर्वोत्तम सांख्यिकीय तरीकों का इस्तेमाल करने के बावजूद मतदाताओं के फैसले का सटीक मूल्यांकन आसान नहीं होता। भारत में बाजार अनुसंधान उद्योग कई दशक पुराना है और कई एजेंसियों ने पिछले कुछ वर्षों में बहुत सारे उपभोक्ता या मतदान अनुसंधान किए हैं। ऐसे में, यह यकीन करना मुश्किल है कि उन्होंने भारत जैसे जटिल देश को समझने के लिए जरूरी सांख्यिकीय तरीकों का अब तक पता नहीं लगाया है।
एग्जिट पोल के नतीजे गलत क्यों थे, इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं। अपनी किताब प्राइवेट ट्रुथ्स, पब्लिक लाइज : द सोशल कॉन्सिक्वेंसेस ऑफ प्रिफरेंस फाल्सिफिकेशन में अर्थशास्त्री तिमुर कुरन ‘वरीयता मिथ्याकरण’ की बात करते हैं। कुरन के अनुसार, यह वास्तविक या कथित सामाजिक दबावों के तहत किसी के वास्तविक विचारों को गलत ढंग से पेश करने का कार्य है। रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसा अक्सर होता है, जब हम किसी मेजबान को बताते हैं कि हम परोसे गए भोजन का खूब आनंद ले रहे हैं, जबकि हमें भोजन बेस्वाद लग रहा होता है।
समाज में ऐसे व्यवहार की व्यापकता को देखते हुए, क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ मतदाताओं ने अपना वोट किसी खास सियासी दल को दिया हो, पर जब एग्जिट पोल करने वालों ने उनसे पूछा, तो उन्होंने दूसरे दल का नाम बता दिया? मतदाता आखिर ऐसा क्यों करते हैं? उनकी कथनी और करनी में अंतर क्यों हो जाता है?
दरअसल, सामाजिक जीव होने के नाते, इंसान इस बात की बहुत चिंता करता है कि दूसरे लोग उसके विचारों व कार्यों के बारे में क्या सोचते हैं? कई बार लोग बहुमत के विचार के साथ दिखने मात्र के लिए गलत जवाब देते हैं। इसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सोलोमन एश के एक प्रसिद्ध प्रयोग द्वारा समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो लोगों से अगर अलग-अलग पूछा जाए, तो वे सही जवाब दे सकते हैं, मगर जब तीन की पसंद चौथा आदमी सुन लेता है, तो वह भी उसी पसंद के पक्ष में फैसला सुना देता है। यह एक तरह की नकल है। शायद ही कोई व्यक्ति अल्पमत में दिखना चाहता है। मतदान केंद्र के अंदर लोगों को भरोसा होता है कि उनका व्यवहार गोपनीय रहेगा, इसलिए वहां वे अपनी सोच के हिसाब से व्यवहार करते हैं, पर मतदान केंद्र के बाहर उन पर बहुमत के विचारों से सहमत होने का दबाव होता है। ऐसे में, यह मुमकिन है कि इस साल के एग्जिट पोल में कई उत्तरदाताओं ने बहुमत के हिसाब से अपना फैसला जाहिर किया है। इन एग्जिट पोल में हमने देखा है कि लोग जो कहते हैं और जो करते हैं, दोनों के बीच अंतर स्पष्ट है। अधिकांश अनुसंधान एजेंसियां मतदाताओं के इस रवैये को समझने में नाकाम हैं। 
किसी भी सर्वेक्षण में व्यावहारिक पहलू को समझना जरूरी है। मिसाल के लिए, यदि हम ड्राइवरों को सुरक्षित गाड़ी चलाने के लिए तैयार नहीं कर सकते हैं, तो नई सड़कों की इंजीनियरिंग दुरुस्त करने का क्या मतलब है? यदि हम बडे़ पैमाने पर लोगों को स्वास्थ्य केंद्र में जाकर टीका लगवाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते, तो बीमारियों से बचाव के लिए कारगर टीकों के आविष्कार का क्या मतलब है? हमें मानव व्यवहार को समझना होगा। सर्वेक्षण एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें हमें नए सिरे से सोचने और नए सिरे से काम करने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)