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Hindi News ओपिनियन नजरियामाली और मालिक की बढ़ती दूरियों के चुनावी मायने

माली और मालिक की बढ़ती दूरियों के चुनावी मायने

जब उच्च वर्ग के रूप में भाजपा को अपना ध्वजवाहक मिला, तब पार्टी के एक मतदाता वर्ग पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। कुछ दिनों पहले अपनी कॉलोनी में मुझे झगड़े का शोर सुनाई पड़ा। यह बहसबाजी मेरे जैसे मकान में ...

माली और मालिक की बढ़ती दूरियों के चुनावी मायने
manu joseph
Monika Minalमनु जोसेफ, पत्रकार और उपन्यासकारMon, 10 Jun 2024 10:07 PM
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कुछ दिनों पहले अपनी कॉलोनी में मुझे झगड़े का शोर सुनाई पड़ा। यह बहसबाजी मेरे जैसे मकान में रहने वाले एक शख्स और उसके माली में हो रही थी। वह आदमी अलग से कुछ काम करवाना चाहता था, जिसके एवज में माली कुछ रुपये और मांग रहा था। मालिक प्रवासियों के ‘लालच’ व ‘कामचोरी’ की कथित मानसिकता पर बिफरा हुआ था। उसने कहा, ‘संभल जाओ। देखा नहीं, केजरीवाल के साथ क्या हुआ है? बहुत चालाकी दिखा रहे थे, अपनी हद नहीं जानते थे।’ दरअसल, कुछ घंटे पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।
यह झगड़ा मुझे कुछ असामान्य लग रहा था, क्योंकि संभाव्यता के नियमों के मुताबिक, दोनों के भाजपा वोटर होने की संभावना अधिक थी। यह पूरा घटनाक्रम इस तथ्य का खुलासा भी कर रहा था कि आखिर क्यों इस बार भाजपा को 60 से अधिक सीटों का नुकसान हुआ है? दरअसल, एक समय था, जब वह मालिक और उसके खिदमतगार, दोनों समान चीजें किया करते थे, मसलन, कांग्रेस पार्टी को वोट देना और एक ही हिंदी फिल्म देखना। फिर ऐसा वक्त आया, जब उनके बच्चे भी समान स्कूलों में पढ़ने लगे। इसके बाद भारत बदला और अलग-अलग वर्ग के लोगों की राहें अलग-अलग हो गईं। मगर जैसे ही भाजपा सत्ता में आई, तमाम वर्गों के लोग फिर समान पार्टी और विचारधारा के लिए वोट करने लगे, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक स्थायी नहीं रहने वाली थी। असल में, राजनेताओं और कुछ रसूखदार लाभार्थियों के अलावा भाजपा का वोटर कौन है? पत्रकारिता, सिनेमा, कारोबार आदि क्षेत्रों का अमूमन उच्च मध्यम वर्ग। कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो उतने नामचीन नहीं, पर उसके हिमायती हैं। वे शहरी उच्च वर्गों से हैं, जो अपने यहां घरेलू सहायक, ड्राइवर, माली आदि रखते हैं। वे भाजपा के शुभंकर जैसे हैं, पर दुर्भाग्य से ये किसी भी पार्टी के सबसे खराब ध्वजवाहक माने जा सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक कह रहे हैं कि ‘अहंकार’ ने ‘भाजपा’ को नुकसान पहुंचाया है। मगर मैं इससे सहमत नहीं। वास्तव में, पिछले कुछ महीनों से भाजपा नेता अपनी घबराहट ही जाहिर कर रहे थे। असल में, जो लोग आत्ममुग्ध और मगरूर थे, वे उनके सहायक थे, ठीक उस शख्स जैसा, जो माली से झगड़ रहा था। लाखों आम  मतदाताओं ने, जिन्होंने कभी भाजपा को वोट दिया था, इन्हीं लोगों का दंभ देखा। लोग आमतौर पर उन इंसानों के विचार पसंद नहीं करते, जिनसे वे नफरत करते हैं। यहां यह मत समझिए कि उनको ज्ञान पसंद नहीं, बल्कि वे इसलिए उसे नहीं मानते, क्योंकि ज्ञान बांटने वाला शख्स उन्हें पसंद नहीं। यह भी एक परिघटना है, जिसने भारत में दक्षिणपंथियों का साथ दिया था। मगर जब उच्च वर्ग के रूप में भाजपा को अपना ध्वजवाहक मिला, तब उसके मतदाता-आधार पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा।
समीक्षकों की नजर में महंगाई ने लोकसभा के नतीजों को सबसे अधिक प्रभावित किया, फिर बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी कारगर साबित हुए, लेकिन यह कल्पना करना कठिन है कि भाजपा के मतदाता यह सोचेंगे कि कोई दूसरी पार्टी उनको संपन्न बनाएगी। दरअसल, भारत के लाखों लोगों की नजर में भाजपा ‘साहबों’ और ‘दबंगों’ की पार्टी बन गई है। इसीलिए, जब भाजपा ने दागी नेताओं के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय का इस्तेमाल करना शुरू किया, तो इसे उच्च वर्ग की दबंगई के रूप में देखा गया। 
मैं पिछली भाजपा सरकार का इस मामले में मुरीद हूं कि उसे अपने दम पर बहुमत हासिल था। मुझे लगता था कि कोई है, जिसका देश पर नियंत्रण है, यहां तक कि इसके भविष्य पर भी। फिर, पहले किसी राजनेता का जेल जाना भी दुर्लभ था। शायद इसका कारण राजनीतिक शिष्टाचार था, क्योंकि राजनेता जानते थे कि एक दिन वे भी सत्ता में नहीं रहेंगे और सत्तारूढ़ दल ऐसा ही शिष्टाचार दिखाएंगे। मगर वह समय आया, जब लगा, भाजपा को सत्ता गंवाने का डर नहीं है। कई विरोधी नेता जेल भेजे गए। लिहाजा यह स्पष्ट हैै कि कमजोर होती भाजपा को अब अपने आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कहीं अधिक बैठकें करनी पड़ सकती हैं, अन्य विचारों के प्रति अधिक सहिष्णु नजरिया अपनाना पड़ सकता है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)