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Hindi News ओपिनियन नजरियाहर साल अधिक गरम होती गरमी से बचने की कवायद

हर साल अधिक गरम होती गरमी से बचने की कवायद

गरमियों में तापमान का 47 डिग्री या इससे पार चले जाना अब सामान्य हो गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो पिछले दिनों गरमी 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई थी। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होने के कारण...

हर साल अधिक गरम होती गरमी से बचने की कवायद
Monika Minalसुरुचि भडवाल, मृदा एवं जलवायु विशेषज्ञSun, 09 Jun 2024 08:22 PM
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गरमियों में तापमान का 47 डिग्री या इससे पार चले जाना अब सामान्य हो गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो पिछले दिनों गरमी 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई थी। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होने के कारण भारत में इस समय गरमी रहती ही है, लेकिन जलवायु संकट की वजह से पिछले डेढ़ दशक में कई बार तापमान ने रिकॉर्ड तोड़ा है। लंबे समय तक तापमान अधिक रहने से हीटवेव, यानी अत्यधिक गरमी की स्थिति बन जाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के कई हिस्से अब हर साल हीटवेव से झुलसने लगे हैं। ग्रीनहाउस गैस के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पिछले करीब 200 वर्षों में 10 सबसे गरम साल 2014 से 2023 तक के वर्ष ही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह प्रवृत्ति आगे भी बनी रह सकती है और हम साल दर साल इसी तरह या इससे अधिक गरमी झेलने को मजबूर होंगे।
भारत में किए गए कई अध्ययनों ने बताए हैं कि जलवायु संकट का देश पर किस कदर प्रभाव पड़ रहा है। चरम मौसमी परिस्थितियों की तीव्रता और आने की दर पिछले कुछ दशकों में बढ़ी है। एनर्जी ऐंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) ने पिछले पांच दशकों के जलवायु पैटर्न को जांचने के लिए एक अध्ययन किया, जिसमें अधिकतम और न्यूनतम तापमान में वृद्धि की प्रवृत्ति दिखती है। चंद इलाकों को छोड़ दें, तो कमोबेश पूरे देश में अधिकतम तापमान में तेज बढ़ोतरी हो रही है। यह वृद्धि प्रति दशक 0.1 डिग्री सेल्सियस से लेकर 0.4 डिग्री सेल्सियस तक है। देश के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में सबसे तेज बढ़ोतरी (एक दशक में 0.3 डिग्री सेल्सियस) हुई है, जबकि पूर्वोत्तर में गरम दिनों की संख्या (सालाना 10-15 दिन) बढ़ी है। पश्चिमी तट में भी गरम दिनों की संख्या अधिक हुई है, हर साल पांच से दस दिन।
जलवायु संकट गहराने के साथ आने वाले दशकों में अधिकतम तापमान और गरम दिनों की संख्या में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी ही होगी। राजस्थान के पश्चिमी हिस्से और लद्दाख में अधिकतम तापमान में तेज वृद्धि की आशंका है, जो साल 2055 तक 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकती है। जहां तक गरम दिनों की बात है, तो ग्रीष्म ऋतु में चार से 40 दिनों तक तेज गरमी के दिन बढ़ सकते हैं। इसमें राजस्थान के पश्चिमी हिस्से, गुजरात का पश्चिमी भाग और पश्चिमी तट भी शामिल हैं, जहां 25-30 दिनों तक गरम दिनों में वृद्धि हो सकती है।
तापमान के सामान्य मौसमी परिस्थितियों से लगातार अधिक बने रहने से हीटवेव पैदा होती है, जो हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है। कई बार तो लोगों तो एहसास तक नहीं होता कि वे किस खतरे के बीच अपना दिन गुजार रहे हैं। हीटवेव के कारण हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन हो सकता है और कुछ मामलों में जान भी जा सकती है। इसके अलावा, अत्यधिक गरमी से उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। समय बीतने के साथ ये परिस्थितियां बढ़ती ही जाएंगी, इसलिए इस पर पर्याप्त ध्यान देने की दरकार है। जलवायु संकट के कारण यदा-कदा होने वाली अत्यधिक गरमी का दौर सामान्य, लंबा और अधिक गंभीर होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का आकलन है कि इससे एक अरब से अधिक लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है। 
स्पष्ट है, मौसम पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। मौसम विभाग की चेतावनियों को भी व्यापक तौर पर प्रसारित करने की जरूरत है, जो न सिर्फ आम लोगों को समझ में आए, बल्कि वे उन पर अमल भी कर सकें। कुछ आसान उपाय तो हमारे सामने हैं, जैसे तेज धूप के समय घर के भीतर रहना, अत्यधिक गरमी में बाहरी गतिविधियों से बचना, ज्यादा भीड़-भाड़ वाली जगहों से परहेज करना, शरीर में पानी की कमी न होने देना आदि। दूरगामी कदमों के तहत चेतावनी प्रसारित करने वाली संचार सुविधाओं में सुधार, इमारतों का मौसम-अनुकूल निर्माण, शहरी नियोजन व भू-निर्माण को अपनाने (इसमें खुला व हरित क्षेत्र हो, ताकि हवा का बहाव सुगम रहे और प्राकृतिक ठंडक बनी रहे) जैसे काम किए जा सकते हैं। हरित छत की अवधारणा पर भी काम किया जा सकता है। बढ़ते तापमान और अत्यधिक गरमी के खिलाफ हमें संजीदगी दिखानी ही होगी। हम चूंकि जलवायु संकट में फंस चुके हैं, इसलिए इस तरह की कवायद आसन्न मुश्किलों को दूर करने में हमारी मदद कर सकती है।
(साथ में के वेंकटरमना)