फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन नजरियाआरामदेह जीवन को कठिन बनाता जलवायु परिवर्तन

आरामदेह जीवन को कठिन बनाता जलवायु परिवर्तन

ज्यादातर संपन्न शहरी आबादी जलवायु परिवर्तन के असर से खुद को दूर समझती है और इसे एक ऐसी समस्या मानती है, जिससे ग्रामीण इलाकों को जूझना है। उनकी तकलीफें दर्शाती तस्वीरें परोसी जाती हैं। मसलन...

आरामदेह जीवन को कठिन बनाता जलवायु परिवर्तन
Monika Minalराहुल जैकब, आर्थिक शोधकर्ता व वरिष्ठ पत्रकारMon, 17 Jun 2024 08:13 PM
ऐप पर पढ़ें

ज्यादातर संपन्न शहरी आबादी जलवायु परिवर्तन के असर से खुद को दूर समझती है और इसे एक ऐसी समस्या मानती है, जिससे ग्रामीण इलाकों को जूझना है। उनकी तकलीफें दर्शाती तस्वीरें परोसी जाती हैं। मसलन, बांग्लादेश के वे ग्रामीण इलाके, जहां पहले फसलें उगा करती थीं, अब खारेपन के कारण उनको खाली छोड़ देना पड़ा है; उत्तरी अफ्रीका से दक्षिणी यूरोप के समुद्री तटों पर पहुंचने वाली शरणार्थियों की वे नावें, जिनमें ज्यादातर अप्रत्याशित गरमी से बचने के लिए भागे लोग सवार थे। इस साल फोटो जर्नलिज्म अवॉर्ड के विजेता द्वारा खीचीं गईं तस्वीरें या फिर, फ्रंटलाइन पत्रिका में प्रकाशित सुदीप मैती की तस्वीरें, जिनमें गंगा और उसकी सहायक नदियों के कटाव के कारण विस्थापित हुए सैकड़ों ग्रामीणों की मुश्किलें दिखाई गई हैं। 
मगर बीते कुछ महीनों से शहरी भारत ने भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को काफी करीब से महसूस किया है। दिल्ली में तो इस साल तापमान 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया, जबकि साल 2023 में हीट वेव के कुल दिनों में दो-तिहाई देश के दक्षिण और पूर्वी हिस्से की गरमी के दिन थे। पिछले हफ्ते ‘सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट’ ने ‘एनाटॉमी ऑफ एन इनफर्नो’ नामक एक रिपोर्ट जारी की, जिसके परेशान करने वाले निष्कर्षों में से एक यह भी है कि शहर अब रात में उस तरह ठंडे नहीं हो रहे, जैसे 20 साल पहले हुआ करते थे। यह खासा चिंताजनक है, क्योंकि रात का तापमान पहले की तरह कम नहीं होने से ताप संकट और बदतर हो गया है, जिसके कारण एसी का अधिक इस्तेमाल करना पड़ता है, जो अमूमन अस्वच्छ ऊर्जा की ही खपत बढ़ाते हैं।
भारतीय शहर गरमियों में भट्टी तो बन ही जाते हैं, जलवायु परिवर्तन से अमीर विकसित आबादी भी खूब प्रभावित हो रही है। जिस तरह पिछले साल भारत में टमाटर व प्याज की फसलों के साथ-साथ अनाज की पैदावार गरम हवाओं या गलत समय पर भारी बारिश की वजह से प्रभावित हुईं, उसी तरह की परिस्थितियां दक्षिणी यूरोप में भी फसलों को प्रभावित कर रही हैं, जहां पर वाइन अंगूर और जैतून का उत्पादन प्रभावित हुआ है। इंडोनेशिया और वियतनाम में भी ठीक इसी तरह कॉफी का उत्पादन कम हुआ है। इस हफ्ते वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक स्टोरी में बाकायदा आंकड़ों के साथ बताया गया है कि कैसे जैतून तेल और कोको की कीमतें आसमान छू रही हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर शराब का उत्पादन साल 1961 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर है।
शराब और चॉकलेट का संकट तो हम झेल सकते हैं, लेकिन भारतीय शहरों में खासतौर से दिन और रात के तापमान में कम होता अंतर व नमी में वृद्धि सेहत के लिए एक गंभीर चुनौती है। बीतते समय के साथ यह देश में कई मौतों का कारक बन सकता है। फिर भी, इस मुद्दे पर आम चुनाव में शायद ही कोई बात की गई। मुश्किल यह भी है कि गरमी के बीत जाने के बाद हमारा रोजमर्रा का व्यवहार ज्यादा नहीं बदलता। एसी हम उसी तरह इस्तेमाल करते हैं, जैसे कोई नवधनाढ्य अपनी हैसियत का प्रदर्शन करता है, जबकि हांगकांग जैसी जगहों में सार्वजनिक स्थानों पर एसी का तापमान लाजिमी तौर पर 25 डिग्री सेल्सियस के करीब रखने के निर्देश जारी किए जाते हैं।
यह विडंबना है कि अपने देश में, जहां इतनी अधिक धूप है और जिसका लक्ष्य जीवाश्म ईंधन को कम करना है, घरों में सोलर पैनल का इस्तेमाल कम होता है। जबकि, कोलंबो में मैंने देखा था कि बड़े घरों की हर छत से लेकर पास के सुपरमार्केंट तक सौर पैनलों से जगमगा रहे थे। इसके बरअक्स बेंगलुरु में, जहां पर मैं रहता हूं, शहरी अव्यवस्था और गरमी  बदस्तूर कायम है। यहां तक कि कोई छूट्टी में यहां से निकलना भी चाहे, तो उसकी मुश्किलें कम नहीं होतीं, क्योंकि अखबारों ने यह खबर दी थी कि पिछले महीने उड़ान भरते समय लंदन से सिंगापुर जाने वाला एक विमान हवा के भयावह विक्षोभ में फंस गया था, जो पृथ्वी की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण पैदा होता है। स्पष्ट है, हमें अब अपनी सीट बेल्ट बांध लेनी चाहिए, क्योंकि जलवायु परिवर्तन हमारे आरामदायक जीवन को तकलीफदेह बनाने जा रहा है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

Advertisement