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Hindi News ओपिनियन नजरियाआधी रात तक जागते बच्चे और उनका ब्लड प्रेशर

आधी रात तक जागते बच्चे और उनका ब्लड प्रेशर

कल एक खबर पढ़ते हुए कई साल पहले की घटना दिमाग में कौंध गई। बुखार के कारण मैं एक डॉक्टर के पास पहुंची थी। सामने एक छह-सात साल की बच्ची बैठी थी। उसकी नकसीर बह रही थी। मां बार-बार रूमाल से पोंछ रही थी...

आधी रात तक जागते बच्चे और उनका ब्लड प्रेशर
kshama sharma
Pankaj Tomarक्षमा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकारFri, 21 Jun 2024 09:38 PM
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कल एक खबर पढ़ते हुए कई साल पहले की घटना दिमाग में कौंध गई। बुखार के कारण मैं एक डॉक्टर के पास पहुंची थी। सामने एक छह-सात साल की बच्ची बैठी थी। उसकी नकसीर बह रही थी। मां बार-बार रूमाल से पोंछ रही थी। बच्ची डॉक्टर के सामने गई, तो कुछ देर वह सोचते रहे। फिर मां से पूछा, तो पता चला कि कल से रह-रहकर ऐसा हो रहा है। डॉक्टर ने बच्ची का ‘ब्लड प्रेशर’ मापा। ऊपर का बीपी ढाई सौ से ऊपर और नीचे का एक सौ दस था। डॉक्टर हतप्रभ थे। देखने वालों के लिए भी यह आश्चर्य की बात थी कि इतनी छोटी बच्ची को ब्लड प्रेशर, जबकि इसे तो उम्रदराज लोगों का रोग माना जाता है। न जाने उस बच्ची का क्या हुआ होगा! मगर जिस खबर का ऊपर जिक्र किया, वह भी बच्चों में बढ़ते ब्लड प्रेशर से संबंधित थी। 
कई अध्ययनों और शोध के मुताबिक, भारत में स्कूल जाने वाले बच्चों में से सात प्रतिशत बच्चे ‘हाई ब्लड प्रेशर’ यानी उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। दुनिया भर में बच्चों और किशोरों में बीपी बढ़ रहा है। बच्चों में मोटापा भी इसका एक बड़ा कारण है। अब तक माना जाता था कि योग, कसरत और खान-पान का ध्यान रखकर इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। मगर बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित पत्रिका में छपे एक लेख में बताया गया है कि उनमें उच्च रक्तचाप को रोकने के लिए जरूरी है कि वे पूरी नींद लें। जिन बच्चों को बीपी की समस्या है, उनकी काउंसलिंग के वक्त उन्हें सही समय पर सोने की हिदायतें दी जानी चाहिए। डॉक्टर उनके अभिभावकों को भी जागरूक करें। उच्च रक्तचाप से ग्रसित 539 बच्चों और किशोरों पर किए गए अध्ययन के निष्कर्ष इस पत्रिका में छापे गए हैं। डॉक्टरों ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि जो बच्चे ज्यादा देर तक गहरी नींद लेते हैं, उनका रक्तचाप संतुलित रहता है। इसलिए ज्यादा नींद और जल्दी सोना जरूरी है। 
मगर दिक्कत यह है कि आजकल बच्चे भी आधी रात तक जागते रहते हैं। उनका बहुत सारा समय मोबाइल पर बीतता है। ऐसी कई रिपोर्ट आ ही चुकी हैं कि काफी बच्चों को मोबाइल की ऐसी लत लग चुकी है कि वे न बाहर खेलते-कूदते हैं और न ही किसी शारीरिक काम में दिलचस्पी लेते हैं। यहां तक कि वे दोस्तों से भी नहीं मिलते। स्क्रीन देखते हुए वे कुछ न कुछ खाते रहते हैं। खाने-पीने की इन चीजों में भी जंक फूड अधिक होता है, जिससे उनका मोटापा भी बढ़ता है। इससे न केवल बल्ड प्रेशर, बल्कि डायबिटीज और जोड़ों की समस्याएं भी बढ़ती हैं। 
दुनिया भर में बच्चों में मोटापा एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। इस पर नियंत्रण के लिए अक्सर बताया जाता है कि बच्चों को स्क्रीन से ज्यादा से ज्यादा दूर रखें। उन्हें मोबाइल थोडे़ समय के लिए दें, मगर ऐसा हो नहीं पाता। बहुत से माता-पिता कहते हैं कि अगर हम बच्चों को मोबाइल देना बंद करते हैं, तो वे अपने दोस्तों के मुकाबले खुद को हीन समझते हैं। दोस्त उनका मजाक भी उड़ाते हैं। बच्चों के बीच एक से एक नए ब्रांड का मोबाइल उनकी हैसियत का प्रतीक बन गया है। दूसरी तरफ, डॉक्टरों का कहना है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम का मतलब है, देर से सोना। इसके अलावा बहुत से मामलों में नींद ही न आना। विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी नींद का हमारे हृदय के स्वास्थ्य से भी संबंध है। दिमागी स्वास्थ्य के लिए भी गहरी और लंबी नींद जरूरी है। छह से बारह साल के बच्चों को कम से कम बारह घंटे सोना चाहिए। यही नहीं, सोने से कम से कम आधा घंटे पहले टीवी, मोबाइल कुछ नहीं देखना चाहिए। ये तो ऐसी हिदायतें हैं, जो हर उम्र के व्यक्ति के लिए जरूरी हैं। मगर बच्चों की सेहत के लिए ये अनिवार्य हैं। 
छोटी उम्र में उच्च रक्तचाप जैसी स्वास्थ्य समस्या का मतलब है, पूरी जिंदगी उसे भुगतना। भारत में यदि सात प्रतिशत बच्चे इसके शिकार हैं, तो सोचिए कि उनकी संख्या कितनी बड़ी है और ये प्रतिशत भी सिर्फ उन बच्चों का है, जो स्कूल जाते हैं। बहुत से बच्चे, जो स्कूल नहीं जाते, उनकी समस्या का निपटारा कैसे हो? हर जगह सही जांच के तौर-तरीके भी उपलब्ध नहीं हैं। फिर यह भी सोचा जाता है कि बच्चों को कोई गंभीर बीमारी होती ही नहीं। ऐसे में, इस चिंताजनक स्थिति पर अभिभावकों का ध्यान देना भी जरूरी है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)