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भीषण गरमी के समय बदल लीजिए अपना भोजन

दुनिया के गरम होते जाने के साथ अपने खान-पान को अनुकूलित करना होगा, इससे लू या हीट स्ट्रोक को रोकने में मदद मिल सकती है। भोजन संबंधी हमारी आदतों को प्रकृति ही गढ़ती है। मौसम और जलवायु के साथ समन्वय ...

भीषण गरमी के समय बदल लीजिए अपना भोजन
Monika Minalरविशंकर उपाध्याय, कला-संस्कृति और व्यंजन के जानकारTue, 21 May 2024 10:11 PM
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भोजन संबंधी हमारी आदतों को प्रकृति ही गढ़ती है। मौसम और जलवायु के साथ समन्वय बिठाते हुए जिस क्षेत्र में प्रकृति जो खाद्यान्न हमें उपलब्ध कराती है, हम उसी को विभिन्न रूपों में ग्रहण करते हैं। जैसे पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में चावल की उपज होने से यह वहां मुख्य आहार में शामिल है, तो पश्चिमोत्तर भारत में गेहूं और जौ की उपज अधिक होने से वहां यह मुख्य खाद्यान्न में शुमार है। इसके अलावा क्षेत्र विशेष में उपजने वाले ऋतुफल और सब्जियां हमारे भोजन का मुख्य हिस्सा होती हैं, पर क्या सभी लोग ऋतु या मौसम के हिसाब से खान-पान बदलते हैं? 
क्या गरमी के दिनों में अपने शरीर को ठंडा रखने के उपाय हम करते हैं? इस मौसम में प्रकृति प्रदत्त फल-सब्जियों, जिनमें आम, संतरा, आंवला, खीरा, ककड़ी, तरबूज आदि शामिल हैं, के साथ बिना आग में पकाए आहार प्राचीन समय से ही हमारी भोजन परंपरा का हिस्सा रहे हैं, क्योंकि इनकी तासीर ठंडी मानी जाती है। ध्यान रहे, बुद्धकालीन समाज में भी एक आहार बेहद प्रसिद्ध था, वह था यवागु। यवागु तैयार करने के लिए रात्रि में भात और पानी मिलाकर रख दिया जाता था और प्रात: काल में इसमें नमक, मिर्च और नींबू आदि मिलाकर खाया जाता था। यह न केवल पेट को लंबे वक्त तक ठंडक प्रदान करता था, बल्कि गरमी से निबटने का तरीका भी हुआ करता था। इसी प्रकार दही-छाछ आदि का इस्तेमाल गरमी से बचने के लिए किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। 
मानव सभ्यता में पहला मिष्ठान खीर माना जाता है। सिद्धार्थ गौतम को उरुवेला, यानी आधुनिक बोधगया में सुजाता ने जीवन की सार्थकता को खीर खिलाकर ही समझाया था, जो उनके लिए ज्ञान का आत्मबोध कराने में सहायक सिद्ध हुआ। महावग्ग  नामक जातक कथा में बताया गया है कि खीर लोगों का प्रिय आहार हुआ करता था। महात्मा बुद्ध ने भिक्षुओं को इस आहार का गुण बतलाते हुए कहा था कि प्रात:कालीन जलपान के लिए खीर सर्वोत्तम आहार है। उन दिनों खीर में शहद मिलाकर खाया जाता था। रात में खीर बनाकर उसे ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता था और फिर सुबह खाया जाता था। महर्षि पाणिनी ने गरमी में सत्तू पीने का जिक्र अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी में किया है। वह कहते हैं कि गरमी से बचने के लिए सत्तू को पानी में घोलकर पिया जाता है। 
भोजन की यह परंपरा कहीं न कहीं आयुर्वेद से प्रभावित जान पड़ती है। आयुर्वेद में बताया गया है कि गरमी के इस मौसम में ठंडी तासीर और चिकनाई वाली चीजों का सेवन ज्यादा करना चाहिए। इसके लिए सत्तू का शरबत, दूध-चावल की ठंडी खीर, छाछ, लस्सी, आम पन्ना, नारियल पानी, नींबू पानी, ककड़ी, तरबूज, मौसमी फलों का रस, पुदीना, गुलकंद, सौंफ और धनिया का सेवन करने की सलाह दी जाती है। गरमी के मौसम में मिलने वाले कद्दू, लौकी, परवल, साग, छिलका सहित आलू, करेला, कच्चा केला, चौलाई, छिलका सहित मूंग-मसूर की दाल आदि को आहार में शामिल करने पर बल दिया गया है। अतिथियों को सत्कार स्वरूप नींबू-पानी प्रदान करने और गरमी में बाहर जाने के पूर्व या आने के बाद नींबू-पानी और शक्कर का शरबत पीने के पीछे भी यही विज्ञान है। यह नींबू या नींबू के रस, नमक और चीनी का मिश्रण होता है, जो न केवल ठंडा करता है, बल्कि शरीर के अत्यधिक गरम होने के कारण कम हो चुके इलेक्ट्रोलाइट्स की भरपायी भी करता है।
गरमियों में पाचन शक्ति काफी कमजोर हो जाती है, इसलिए गरिष्ठ (तले-भुने-मसालेदार) भोजन से बचने की सलाह दी जाती है। इस मौसम में तरल और सुपाच्य आहार का सेवन सर्वोत्तम माना जाता है। आधुनिक आहार विज्ञान तो कहता है कि कैलोरी कम लेने से भी आप गरमी के प्रकोप से कुछ हद तक मुक्ति पा सकते हैं। चूंकि ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में औसतन बढ़ोतरी होती जा रही है, इस कारण यह कहा जाता है कि दुनिया के गरम होते जाने के साथ-साथ अपने खान-पान को अनुकूलित करना ही होगा। दैनिक कैलोरी में कटौती करने से शरीर का मुख्य तापमान कम हो सकता है। लू या हीट स्ट्रोक को रोकने में मदद मिल सकती है। समय आ गया है कि लोग हर मौसम में अपने खान-पान को जरूरत के साथ बदलें और सेहतमंद बनें। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)