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Hindi News ओपिनियन नजरियामखमली आवाज से गीतों को  पिरोते थे अमीन सायानी

मखमली आवाज से गीतों को  पिरोते थे अमीन सायानी

अमीन सायानी की आवाज से जमीन की खुशबू आती थी। लगता, घर का ही कोई पुकार रहा है, और हम खिंचे चले आते। बिनाका गीतमाला सुनने वाले सभी संगीत प्रेमियों को सलाम, उपस्थित है, आपका दोस्त, अमीन सायानी...

मखमली आवाज से गीतों को  पिरोते थे अमीन सायानी
Monika Minalपवन दुग्गल, सूचना प्रौद्योगिकी मामलों के विशेषज्ञWed, 21 Feb 2024 10:27 PM
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बिनाका गीतमाला सुनने वाले सभी संगीत प्रेमियों को सलाम, उपस्थित है, आपका दोस्त, आपका साथी, अमीन सायानी, तो आइए... बहनो और भाइयो, गाना है फिल्म जानेमन  से और लता मंगशेकर कह रही हैं, आएगी आएगी आएगी किसी को हमारी याद आएगी...। 
किसी गाने के बोल को अपने शब्दों से किस खूबसूरती से पिरो देना है, यह कलाकारी अमीन सायानी से बेहतर शायद ही कोई जानता था। उन दिनों मैं छोटी उम्र का था, लेकिन गीतमाला एक ऐसा कार्यक्रम था, जिसका हम लोग शिद्दत से इंतजार किया करते थे। तब तक देश में टीवी जरूर आ गया था, पर ज्यादातर घरों में रेडियो ही देश-दुनिया से जुड़ने का एकमात्र साधन हुआ करता था। गीतमाला करीब एक घंटे तक चलता और जब अमीन सायानी के शब्द गूंजते, तो घर, बाजार, दुकान में मानो सब कुछ थम जाता। सायानी साहब जिस तरह से फिल्मी दुनिया से जुड़ी छोटी-छोटी कहानियों को आपस में जोड़ा करते, उससे यह प्रोग्राम एक अलग ही मुकाम पर पहुंच जाता। इसीलिए हम एक नई दुनिया में खो जाते थे। लगता, एक ऐसे दोस्त के साथ बैठे हैं, जो हमें नया रास्ता दिखा रहा है। इसी वजह से गीतमाला के कई गाने या धुनें हमें आज तक याद हैं। 
अब अमीन सायानी साहब भौतिक रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज हमेशा गूंजती रहेगी। वह भारतवासियों की आवाज है। जब भी रेडियो पर यह आवाज आती, तो समाज का हर तबका उसे पहचान लेता। उसमें कोई बनावटी-भाव नहीं था, जमीन की खुशबू आती थी उससे। लगता, घर का ही कोई पुकार रहा है, और हम उस ओर खिंचे चले जाते। इस आवाज की एक खासियत यह भी थी कि यह हर उम्र के लोगों को भाती थी। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बुजुर्ग, सभी अमीन सायानी के शब्दों से जुड़ जाते थे। वह भारत की उम्मीद और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा भी है, हिन्दुस्तान को टूटने से बचाने में फिल्म-संगीत का बड़ा हाथ है, वरना हम तो काफी पहले बिखर चुके होते। हालांकि, ज्यादातर लोग आवाज के इस जादूगर को हिंदी तक महदूद रखते हैं, लेकिन अमीन सायानी बहुभाषी थे और रेडियो पर अलग-अलग भाषाओं के कार्यक्रम किया करते थे। रेडियो उद्घोषक के रूप में उनका पहला कार्यक्रम अंग्रेजी में था। 
मुझे कई बार उनसे मिलने का मौका मिला और हर बार मैंने उनसे कुछ नया सीखा। दिलचस्प है कि उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ सीखा, करियर के दौरान सीखा, अपनी सिखाई को मांजा और फिर अपना स्तर इतना ऊंचा कर लिया कि एक चलते-फिरते संस्थान बन गए। वह सिर्फ खनकती आवाज के ही मालिक नहीं थे, बल्कि तमाम किस्म की जानकारियों का भी खजाना थे। मैं उनसे पहली बार तब मिला था, जब वह ‘कैडबरी बोर्नविटा क्वीज’ प्रतियोगिता कर रहे थे। उनके सामने आते ही मेरे हाथ-पैर सुन्न हो गए। उनकी आवाज तो बचपन से सुनता आ रहा था, लेकिन शक्ल को आवाज से मिलाना मुश्किल हो गया था। मुंह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। मेरी इस उलझन को संभवत: सायानी साहब ने भांप लिया। यह उनकी सिफत ही थी कि सामने वाले को वह एहसास नहीं होने देते थे कि वह कितनी ऊंची शख्सियत के मालिक हैं। सामने कोई भी इंसान हो, उसे वह पूरी इज्जत देते थे। उनमें किसी किस्म का घमंड नहीं था। यही कारण था कि उनसे बातचीत करके हर कोई अभिभूत हो जाता। 
ऐसी ही एक मुलाकात में मैंने पूछा कि आपने अपनी शैली कैसे विकसित की? उनका जवाब था, मैंने यही कोशिश की कि किसी की नकल न करूं। आप किसी भी जगह पर रहें, आपका प्रयास मौलिक होना चाहिए। अपनी स्टाइल खुद बनाएं। आप किसी दूसरेे की महत्वपूर्ण बातें इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उसे अपनी शैली में ही पेश करें। मैंने भी रेडियो और टीवी पर प्रस्तुति के दिनों में सायानी साहब के इन शब्दों को जीने की कोशिश की। आज भी मैं उनकी यह सीख नहीं भूल पाता कि यदि वास्तविकता दिखाएंगे, तो आपको कभी छिपाने का कोई प्रयास नहीं करना होगा, और वह सबसे अलग भी होगी। मुझे लगता है, अमीन सयानी साहब को सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी कि हम हमेशा मौलिकता में विश्वास करें और नकल से दूर रहें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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