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कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मायाजाल को समझने में हमारा फायदा

जर्मन रसायन विज्ञानी फ्रेडरिक केकुले को एक दिवा-स्वप्न आया था, जिसमें एक सांप ने अपनी ही पूंछ को डस लिया था। तब हेक्सागोनल रिंग संरचना की खोज संभव हुई थी। इससे कार्बनिक रसायन विज्ञान को एक अपूर्व...

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मायाजाल को समझने में हमारा फायदा
Pankaj Tomarजसप्रीत बिंद्रा, तकनीक विशेषज्ञSun, 18 Feb 2024 11:07 PM
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जर्मन रसायन विज्ञानी फ्रेडरिक केकुले को एक दिवा-स्वप्न आया था, जिसमें एक सांप ने अपनी ही पूंछ को डस लिया था। तब हेक्सागोनल रिंग संरचना की खोज संभव हुई थी। इससे कार्बनिक रसायन विज्ञान को एक अपूर्व सिद्धांत हासिल मिला था। केकुले अकेले नहीं हैं। कथित तौर पर दिमित्री मेंडेलीव ने आवर्त सारणी का सपना देखा था और थॉमस एडिसन ने भी दावा किया था कि उन्होंने अपने सपनों को ही अपने जीवन में भौतिक रूप से साकार किया है। लेखक स्टीफन किंग ने भी दावा किया था कि उन्होंने नींद में एक उड़ान के दौरान अपने उपन्यास माइजरी का सपना देखा था। ऐसे अनेक रचनाकार या वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने अपने देखे सपनों या माया को ही साकार किया है। दुनिया की अनेक श्रेष्ठ कृतियां माया या मतिभ्रम से प्रेरित हैं।
बहुत दिलचस्प है कि चैट-जीपीटी की शुरुआत के बाद ‘हेलुसिनेट’ शब्द प्रौद्योगिकीय शब्दकोश में शामिल हो गया है और इस शब्द का हिंदी में अर्थ है माया या मतिभ्रम। यह एहसास जगजाहिर है कि हम जेनरेटिव एआई चैटबॉट पर बहुत सारी झूठी और अजीब चीजों के आविष्कार के सपने देखने लगे हैं या तरह-तरह की कल्पना करने लगे हैं। सिडनी नामक एक चैटबॉट ने न्यूयॉर्क टाइम्स के एक रिपोर्टर के प्रति अपने अटूट प्रेम का इजहार कर दिया था। एक अमेरिकी वकील ने एक विमानन कंपनी के खिलाफ मामला दायर करने के लिए एआई पर भरोसा किया, पर न्यायाधीश ने पाया कि उद्धृत तमाम बातें चैट-जीपीटी की उपज थीं। 
इतना ही नहीं, जब मैं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के लिए भारतीय दर्शन व गोपनीयता पर शोध पत्र लिख रहा था, तब चैट-जीपीटी ने आधिकारिक तौर पर मुझे उद्धृत करने के लिए पांच शोध पत्र दिए थे और वे सब गलत थे। जेनेरेटिव एआई की इस मतिभ्रम या माया रचने की क्षमता से जानकार बहुत चिंतित हो उठे हैं। 
वास्तव में, एक बड़े भाषा मॉडल या इंटरनेट की भाषा में कहें, तो लार्ज लंग्वेज मॉडल की कारगरता को अक्सर इस बात से मापा जाता है कि यह कितनी माया उत्पन्न करता है या नहीं करता है। अब कुछ अनुसंधान कंपनियां मतिभ्रम सूचकांक भी पेश करने लगी हैं। एक हालिया कॉर्नेल शोध से पता चलता है कि जीपीटी3.5 इन दिनों 69 प्रतिशत बार मतिभ्रम पैदा करता है और मेटा का एलएलएएमए2 आश्चर्यजनक रूप से 88 प्रतिशत से ज्यादा बार मतिभ्रम पैदा कर रहा है। जेनेरेटिव एआई के मॉडलों के नए संस्करणों में काफी सुधार हुआ है, पर कंपनियों को चिंता है कि ये मॉडल बड़े पैमाने पर बकवास फैला रहे हैं, इससे उनके ब्रांड और शेयर की कीमत को भी नुकसान पहुंच सकता है। ग्राहक नाराज हो सकते हैं और कानूनी खतरा भी पैदा हो सकता है।
वैसे, हमें इस बारे में अलग ढंग से सोचने की जरूरत है। क्या होगा यदि इस दुनिया में मतिभ्रम ही एक विशेषता बन जाए? तब क्या होगा, अगर हम रचनात्मकता के मायावी स्वरूप का उसी तरह लाभ उठाना शुरू कर दें, जैसे कभी केकुले ने उठाया था? गूगल के सुंदर पिचई इसी विचार के पैरोकार हैं। उनका सुझाव है कि जेनेरेटिव एआई का अनुभव कल्पनाशील होना चाहिए, एक बच्चे की तरह, जो यह नहीं जानता कि जब वह कुछ कल्पना कर रहा है, तो राह में कैसी बाधाएं हैं। एक विशेषज्ञ मार्क आंद्रेसेन कहते हैं, जब हमें उत्तर पसंद आता है, तब हम इसे रचनात्मकता कहते हैं और जब पसंद नहीं आता है, तो मतिभ्रम। वैसे अनेक आधुनिक कलाकारों और रचनाकारों ने एआई पर पकड़ बना ली है, माया के सहारे ही सही, वे कुछ नया रचने में जुट गए हैं। 
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मतिभ्रम विज्ञान का विचलन उतना नहीं है, जितना मानव संस्कृति का प्रतिबिंब। यदि हम इसे एक पूर्वानुमान उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे उपकरण के रूप में देखना बंद कर दें, जो हमें नवीन विचार और सामग्री देकर हमारी रचनात्मक शक्ति को बढ़ाता है, तो मतिभ्रम का स्वागत ही किया जाएगा। कल्पना करने वाले लेखक के रूप में सोचें, तो यह सही है, पर गैर-काल्पनिक लेखक के रूप में सोचें, तो गलत है। रचनात्मकता को सहारा अवश्य मिलेगा, लेकिन हमें एआई मॉडलों में सुधार होने तक सचेत रहना ही होगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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