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अमृत काल में भी खूब काम आ रहा बाबासाहेब का दर्शन

बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को शरीर त्यागे 67 वर्ष हो गए। उनकी याद में 6 दिसंबर को देश महापरिनिर्वाण दिवस मनाता है और उनके जीवन व दर्शन से प्रेरणा लेता है। आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने...

अमृत काल में भी खूब काम आ रहा बाबासाहेब का दर्शन
Pankaj Tomarअसीम अरुण, राज्यमंत्री, समाज कल्याण, उत्तर प्रदेशTue, 05 Dec 2023 11:03 PM
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बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को शरीर त्यागे 67 वर्ष हो गए। उनकी याद में 6 दिसंबर को देश महापरिनिर्वाण दिवस मनाता है और उनके जीवन व दर्शन से प्रेरणा लेता है। आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा करने का संकल्प देशवासियों के सामने रखा है, तब बाबासाहेब के दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। 
विकसित देश या विश्व गुरु से आशय है, ऐसा समाज, जो आर्थिक रूप से संपन्न हो, नैतिकता के उच्च मूल्यों को आत्मसात कर चुका हो, विकास यात्रा में किसी को पीछे न छूटने देता हो और धरती मां का सम्मान करता हो। बाबासाहेब का स्मरण करके ही हम अमृत काल को साकार करने में सफल हो सकते हैं। 
सबसे पहले हम याद करते हैं डॉ आंबेडकर को एक अर्थशास्त्री के रूप में। अपनी पुस्तक रुपये की समस्या  में उस समय की प्रमुख आर्थिक विषमताओं को चिह्नित करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक का ब्लू प्रिंट उन्होंने प्रस्तुत किया था। आज हम जीएसटी जैसा सुदृढ़ व पारदर्शी सिस्टम बना चुके हैं, और आगे ऐसी सशक्त प्रणालियां और भी विकसित करनी होंगी। जमीन की खरीद-फरोख्त का पारदर्शी व आधुनिक तरीका ईजाद करने, जनपदीय न्यायालयों को त्वरित व कार्य-कुशल बनाने, ब्यूरोक्रेसी को विशेषज्ञ व ईमानदार बनाने जैसे मूलभूत सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। बाबासाहेब का ध्यान हमेशा समस्याओं के प्रणालीगत हल निकालने पर था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आत्मसात किया है। 
बाबासाहेब ने कहा था, ‘मैं समाज की प्रगति को उस प्रगति के स्तर से नापता हूं, जो उनकी महिलाओं ने हासिल की हो।’ महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिलाने के लिए देश के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की नींव रखकर इतिहास रचा था। आज डबल इंजन की सरकार ने मुख्य सरकारी योजनाओं में महिलाओं को लाभार्थी बनाकर उन्हें नई ताकत दी है। चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो या मध्य प्रदेश की लाडली बहना, पूरा पैसा महिलाओं के खाते में जा रहा है। सरकार की नवीनतम पहल है नारी शक्ति वंदन अधिनियम, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण लागू होना है। बाबासाहेब की परिकल्पना के अनुसार, भविष्य में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बैंक सखी, स्वयं सहायता समूह व सहकारी समिति जैसे उपक्रमों को सशक्त बनाने के लिए नीतियां बनानी होंगी। अमृत काल में पत्नी पर हाथ उठाने को पुलिस ‘घरेलू मामला’ कहकर नहीं टालेगी।
ध्यान रहे, अंग्रेजों के समय मजदूरों के अधिकारों का हनन चरम पर था। इसे बदलने के लिए डॉ आंबेडकर ने 1942 में बनी प्रायोगिक सरकार- वायसराय लेजिस्लेटिव कौंसिल में लेबर विभाग के मुखिया के रूप में और फिर देश के पहले कानून मंत्री के रूप में श्रमिक, मिल मालिक और सरकार के आपसी संबंधों का सही संतुलन बनाने का प्रयास किया था। शिफ्ट आठ घंटे की हो, वेतन सहित अवकाश मिले, महिला श्रमिकों को समान वेतन, जैसे कानून उन्होंने बनाए, जो समय से आगे थे। बाबासाहेब के दर्शन में सामाजिक न्याय का अर्थ केवल अपनी जाति के अधिकारों की बात करना नहीं था। हर व्यक्ति, जो भेदभाव का शिकार था, उसके न्याय, अधिकार व अवसर की समानता की बात उन्होंने कही थी। वर्तमान प्रधानमंत्री ने ‘सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र के रूप में समावेशी विकास, विविधता के महत्व, प्रतिनिधित्व की राजनीति जैसी जटिल अवधारणाओं को आसान शब्दों में सबको समझा दिया। अमृत काल में सामजिक न्याय को मात्र सरकार की योजना के रूप में न देखते हुए, पूरे समाज को आगे आना होगा। आज कई कंपनियां स्वयं ही सामजिक न्याय की व्यवस्था कर रही हैं। 
हमें बाबासाहेब से प्रेरणा लेते हुए यह प्रण भी लेना होगा कि हम उनकी तरह सतत विद्यार्थी बनेंगे। विश्व गुरु बनने के लिए, पहले विश्व शिष्य बनना होगा। नीति-निर्माण के लिए जिम्मेदार निर्वाचित पदाधिकारी और परीक्षा पास करके आए अधिकारी, दोनों को ग्लोबल स्तर का विशेषज्ञ बनना होगा। अमृत काल में आंबेडकर से प्रेरणा लेते हुए आगे का रोडमैप तैयार करना होगा और उन्हीं की तरह ज्ञान की प्यास को जागृत रखना होगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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