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नई पीढ़ी को ही करना होगा विश्व पर्यावरण का उद्धार

मार्च में बेंगलुरु महानगर में 500 वर्ष में पहली बार पानी के लिए हेल्पलाइन खोलनी पड़ी। कई लोगों ने पानी की समस्या के चलते कुछ दिनों के लिए शहर छोड़ दिया। जल के लिए तरसते शहरों में बेंगलुरु कोई अकेला...

नई पीढ़ी को ही करना होगा विश्व पर्यावरण का उद्धार
Pankaj Tomarअनिता भटनागर जैन, पूर्व आईएएस अधिकारीMon, 03 Jun 2024 11:12 PM
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मार्च में बेंगलुरु महानगर में 500 वर्ष में पहली बार पानी के लिए हेल्पलाइन खोलनी पड़ी। कई लोगों ने पानी की समस्या के चलते कुछ दिनों के लिए शहर छोड़ दिया। जल के लिए तरसते शहरों में बेंगलुरु कोई अकेला नहीं है। यह एक चुभने वाला तथ्य है कि अप्रैल 2024 में भारत के 22 राज्यों में 150 मुख्य वाटर रिजरवॉयर या जलाशयों में एक-तिहाई से कम पानी बचा था। यह भी चुभने वाला तथ्य है कि मई 2024 में अनेक राज्यों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहा। जब जल जैसे प्राकृतिक संसाधन का अभाव होने लगे, जब मौसम प्रतिकूल हो, तब पर्यावरण की चिंता बढ़ जाती है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस बार पर्यावरण दिवस का विषय है, भूमि बहाली, मरुस्थलीकरण और सूखे की स्थिति में बदलाव। ये तीनों मुद्दे परस्पर जुड़े हैं और इस बार का नारा है - हमारी भूमि, हमारा भविष्य, हम हैं उद्धार करने वाली पीढ़ी।  
गौर करने की बात है कि पृथ्वी की 75 प्रतिशत से अधिक भूमि का क्षरण हो चुका है। भारत में भी 30 प्रतिशत से अधिक भूमि में उत्पादकता समाप्त हो चुकी है और 25 प्रतिशत कुल भूमि मरुस्थलीकरण श्रेणी में है। विश्व में सूखा पड़ने की संख्या और अवधि में 29 प्रतिशत वृद्धि हुई है और यदि युद्ध-स्तर से रोकथाम नहीं की गई, तो 2050 तक दुनिया की 75 प्रतिशत से अधिक आबादी सूखाग्रस्त हो जाएगी। आज मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पता चल रहा है। जलवायु परिवर्तन से इस बार जनवरी में गुलमर्ग की पहाड़ियों पर बर्फ नहीं गिरी, जिससे न केवल पर्यटन पर प्रभाव पड़ा, नदियों में पानी कम होने के कारण पीने व सिंचाई हेतु जल का अभाव हो गया। 
आज गंगा जैसी नदी भी मुश्किल में है। उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते समय गंगा में 70 प्रतिशत पानी हिमालय के झरनों और छोटी नदियों से आता था। हिमालय के 30 लाख झरनों में से 50 प्रतिशत सूख चुके हैं। 2030 तक देश में भूगर्भ जल 409 मीटर गिरने का अनुमान है और इससे भूजल में रासायनिक जहर की वृद्धि होगी। भूमि क्षरण के कारण सूखा बढ़ रहा है और वर्ष 2030 तक भूख को समाप्त करने के लक्ष्य की प्राप्ति अब संभव प्रतीत नहीं होती है। 2023 में 28.20 करोड़ लोग तीव्र भूख से ग्रसित रहे। भारत में वर्ष 2022 में गरम हवाओं या लू की वजह से गेहूं की फसल में 35 प्रतिशत गिरावट आई। अब खामोश सूखा भी पाया जाता है यानी भूमि की उपजाऊ  क्षमता में कमी होने से धान और गेहूं की गुणवत्ता 45 प्रतिशत कम हो गई है। इनमें जिंक व आयरन जैसे आवश्यक तत्वों में भी 33-27 प्रतिशत तक गिरावट आई है। जब भोजन में उपयुक्त पौष्टिकता नहीं रह जाएगी, तब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाएगी और लोग बार-बार बीमार पड़ेंगे और इससे भी देश की उत्पादकता व आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा।
ध्यान रहे, भूमि क्षरण का संबंध केवल मनुष्यों से नहीं है, भूमि पर केवल हम ही नहीं, 60 प्रतिशत जीव भी उसी में रहते हैं। 95 प्रतिशत भोजन जो हम खाते हैं, वह भूमि से ही उत्पादित होता है। स्वस्थ भूमि कार्बन डाइऑक्साइड को भी जज्ब करती है। 75 प्रतिशत प्रतिशत फल और बीज परागीकरण के लिए मधुमक्खियों आदि पर निर्भर हैं। भूमि पर निर्भर ये सभी जीव जलवायु परिवर्तन, खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों के उपयोग से खत्म हो रहे हैं। जैव विविधता प्रभावित हो रही है। खेतों में या भूमि पर कीटाणु न मिलने के कारण पक्षियों को भोजन नहीं मिल पा रहा है और तालाबों के सूखने से पक्षियों के रहने के स्थान भी समाप्त होते जा रहे हैं। यह खतरा अनुमानित है कि वर्ष 2050 तक समुद्र में मछलियां नहीं रह जाएंगी। 
सबसे पहले शहर में रहने वालों को सचेत होना पड़ेगा। विश्व की आधी आबादी अब शहरों में रहती है और 2050 तक यह 66 प्रतिशत हो जाएगी। शहरी क्षेत्र पृथ्वी के 75 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं और 50 प्रतिशत से अधिक कूड़ा व 68 प्रतिशत से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्पादित कर रहे हैं। शहरों के बढ़ने के साथ आसपास की प्राकृतिक दुनिया समाप्त होती जा रही है, जीवन बचाने के लिए सजग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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