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सियासत के बाजार में तरक्की से ज्यादा उम्मीद का बिकना

उन्नीस नवंबर को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट विश्व कप फाइनल मुकाबला होने से कुछ ही घंटे पहले, एक सूचना वायरल हुई, जिसमें बताया गया था कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 4 ट्रिलियन डॉलर को...

सियासत के बाजार में तरक्की से ज्यादा उम्मीद का बिकना
Pankaj Tomarविवेक कौल, आर्थिक विशेषज्ञSun, 03 Dec 2023 10:37 PM
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उन्नीस नवंबर को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट विश्व कप फाइनल मुकाबला होने से कुछ ही घंटे पहले, एक सूचना वायरल हुई, जिसमें बताया गया था कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 4 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया है। जीडीपी किसी खास अवधि में किसी देश के आर्थिक आकार का अनुमान भर है, पर जल्द ही यह सूचना पूरे सोशल मीडिया पर छा गई। इस विश्वास के साथ कि भारत मैच में ऑस्ट्रेलिया को हरा देगा, यह एक फैलाने या प्रचार लायक राष्ट्रवादी संदेश बन गया। अफसोस, भारत क्रिकेट फाइनल हार गया। 
बहरहाल, तब तक वह संदेश दूर-दूर तक फैल चुका था। आम लोगों से लेकर राजनेताओं और बड़े उद्यमियों तक, सभी ने उसे सोशल मीडिया पर साझा कर दिया था। कुछ ही लोगों ने यह जानने की जहमत उठाई कि क्या भारतीय जीडीपी वास्तव में 4 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गई है? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रकाशित विश्व आर्थिक आउटलुक के अनुसार, मौजूदा कीमतों में भारतीय जीडीपी 2024 में 4.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। मुद्रास्फीति के साथ अगर एक हिसाब लगाएं, तो भारत के 4 ट्रिलियन डॉलर सकल घरेलू उत्पाद तक पहुंचने में अभी भी शायद कुछ समय है।
निस्संदेह, बाजार में संदेश और सच्चाई वास्तव में एक साथ नहीं चलती है। इसके बाद एक बड़ा सवाल उठता है कि हम भारत की जीडीपी को 4 ट्रिलियन डॉलर, 5 ट्रिलियन डॉलर, 10 ट्रिलियन डॉलर, 30 ट्रिलियन डॉलर आदि पार करने को लेकर इतने जुनूनी क्यों हैं? ये वे आंकड़े हैं, जिनको भारत कभी न कभी पार कर ही लेगा, पर इधर जो वास्तविक तरक्की हुई है, उसके बारे में चर्चा इतनी कम क्यों है?
आइए, दो बहुत महत्वपूर्ण आंकड़ों पर नजर डालते हैं। देश की शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और कुल प्रजनन दर (टीएफआर)। आईएमआर एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु की संख्या है, जो प्रति 1,000 जीवित बच्चों पर व्यक्त की जाती है। गौर कीजिए, बाल मृत्यु दर भारत में 1953 में 181 थी और 2021 में लगभग 25 हो गई। तब और अब के बीच आईएमआर हर वर्ष औसतन 2.8 प्रतिशत की दर से गिरी है। भारत में अब कम ही बच्चे काल के गाल में समा रहे हैं। 
अब टीएफआर पर नजर डालें, साल 1951 में हर महिला औसतन 5.77 बच्चे पैदा करती थी, पर अब केवल 2.03 बच्चे पैदा कर रही है। अगर भारत में यह दर 2.1 हो जाए, तो जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। सात दशकों में यह जो कमी आई है, वह काफी हद तक सरकारी दबाव के बिना ही है। इसका तात्पर्य यह है कि औसत आय बढ़ गई है और महिलाएं अब पहले की तुलना में अधिक शिक्षित हैं। ये दो कारक कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं। महिलाओं के कम बच्चे पैदा करने के चलते जनसंख्या-वृद्धि भी धीमी हो गई है। हालांकि, यह बदलाव भारत में बहुत धीमी रफ्तार से आया है। 
इससे हमें पता चलता है कि असली तरक्की के लिए सामाजिक स्तर पर बदलाव की जरूरत होती है और इसमें समय लगता है। जैसा कि हेंस रोसलिंग, ओला रोसलिंग और अन्ना रोसलिंग फैक्टफुलनेस में लिखते हैं, कई चीजें (लोगों, देशों, धर्मों और संस्कृतियों सहित) सिर्फ इसलिए थमी हुई प्रतीत होती हैं, क्योंकि बदलाव बहुत धीरे-धीरे हो रहा है।
परेशानी यही है, इन बहुत धीमे बदलावों को जनता के सामने पेश करना राजनेताओं के लिए मुश्किल हो जाता है। इसे लेकर मैं उत्साहित हूं, जैसा कि मॉर्गन हॉसेल ने सेम ऐज एवर : टाइमलेस लेसन्स ऑन रिस्क, ऑपर्च्युनिटी ऐंड लिविंग अ गुड लाइफ में लिखा है : लोग उस दुनिया को याद नहीं करते, जब वे पैदा हुए थे। उन्हें पिछले कुछ महीने ही याद रहते हैं। ऐसे में, तरक्की हमेशा अदृश्य रहती है।
तरक्की के चक्र को पूरा होने में दशकों लग जाते हैं, जबकि राजनेताओं को हर कुछ साल बाद चुनाव जीतने की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि उनके लिए असली तरक्की को बेचना शायद मुश्किल हो जाता है और वह आशा या उम्मीदें बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। कोई अचरज नहीं, अमेरिका से भारत तक तमाम चुनावों में ऐसा ही देखा जाता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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