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नैतिकता को कुचलती अमीरों और ज्ञानियों की भीड़

सत्येन्द्र श्रीवास्तव, सहायक प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र, हंसराज कॉलेजPublished By: Naman Dixit
Sat, 31 Jul 2021 12:31 AM
नैतिकता को कुचलती अमीरों और ज्ञानियों की भीड़

31 अगस्त, 1837 को हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में द अमेरिकन स्कॉलर  शीर्षक व्याख्यान देते हुए 34 वर्षीय युवा कवि आर डब्ल्यू इमर्सन ने कहा था, ‘चरित्र का स्तर बुद्धि से ऊंचा है।’ जब भी अपने आसपास हम बहुत ही पढ़े-लिखे युवाओं को बेहद भ्रष्ट आचरण करते देखते हैं, तब मन में एक टीस सी उठती है। समझ में नहीं आता बौद्धिकता के क्षेत्र में इतने समृद्ध लोग नैतिक आचरण में इतने गरीब क्यों हो जाते हैं? कठिनतम प्रतिस्पद्र्धा के इस युग में हर कोई बौद्धिक रूप से प्रखर होना चाहता है, जो सही भी है, लेकिन यह नैतिकता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। अफसोस! ऐसा हो रहा है और इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ रही है। स्वीडिश अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने लिखा है, भारत की समस्या यह नहीं है कि यहां भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है, अपितु उसे स्वीकार किया जा रहा है और उसे महिमामंडित भी किया जा रहा है। यह प्रवृत्ति बहुत कुछ उसी तरह की है, जिसमें उत्तर भारत के लोग दहेज कुप्रथा के विरोध के बजाय उसे मांगकर या देकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। 
ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशल की मानें, तो ईमानदारी के पैमाने पर भारत को 100 में से महज 41 अंक मिले हैं। अजीब विरोधाभास है कि हम लोग ज्ञान के क्षेत्र में जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, नैतिकता के क्षेत्र में उतने ही पीछे होते जा रहे हैं। तभी तो एपीजे अब्दुल कलाम को कहना पड़ा, ‘वी हैव गाइडेड मिसाइल्स, बट मिस्गाइडेड ह्यूमन बीइंग्स’। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस विरोधाभास को समझने की कोशिश की गई है। हालांकि, इस पर बहस हो सकती है कि नैतिक मूल्य सिखाए जा सकते हैं या नहीं, लेकिन इससे कोई नहीं इनकार कर सकता कि मनुष्य के समग्र विकास के लिए बुद्धि और नैतिक चेतना, दोनों जरूरी हैं। 
हममें से कुछ सयानों को लगता है कि ऐसी बातें किताबी और हवा-हवाई हैं, उनका व्यावहारिक जीवन में कोई महत्व नहीं है। यह बात बहुत ही सीमित संदर्भ में सही हो सकती है, जैसे दाल में नमक। लेकिन जब आप अपने हर गलत कार्य को इसी ‘व्यावहारिकता’ से न्यायसंगत ठहराने की कोशिश करते हैं, तब आप पूरी दाल काली कर देते हैं। याद रखिए, बहुत लोग हैं, जिन्होंने बौद्धिकता और नैतिकता में एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया या फिर अपनी अतिशय गरीबी में भी कोई गलत रास्ता नहीं चुना। आप कह सकते हैं कि ऐसे लोगों की संख्या गिनी-चुनी है और समाज के बहुत बडे़ हिस्से की दुनिया तो पति-पत्नी और बच्चे से आगे कुछ है ही नहीं। श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास राग दरबारी  में सनीचर कहता है, ‘यहां बिना मतलब के कोई कटी उंगली पर भी नहीं...’। 
समाज का एक बड़ा तबका जाने-अनजाने बेहद स्वार्थी व संकुचित सोच वाला है। लेकिन ध्यान रहे, कुछ गिने-चुने लोग ही ‘ट्रेंड सेटर’ बनते हैं, जो अपने हौसले से समाज के लिए कुछ सार्थक योगदान करते हैं। बाकी लोग भीड़ के हिस्से हैं, भले ही कितने ही ज्ञानी या धनी क्यों न हों। स्कूल के दिनों में हमने एक कहानी पढ़ी थी, जिसका सार था कि एक भूख से पीड़ित अनपढ़ व्यक्ति मालगाड़ी से कुछ किलोग्राम अनाज चुराएगा, लेकिन नैतिकता से रहित विश्वविद्यालय का टॉपर पूरी मालगाड़ी ही उड़ा देगा। शिक्षित व्यक्ति की इस विरोधी प्रवृत्ति के संबंध में मार्टिन लूथर किंग जूनियर अपने प्रसिद्ध लेख द पर्पज ऑफ एजुकेशन  में  लिखते हैं, ‘नैतिकता के अभाव में बुद्धि से श्रेष्ठ व्यक्ति सबसे खतरनाक अपराधी हो सकता है। ...बुद्धि ही पर्याप्त नहीं है। सच्ची शिक्षा का उद्देश्य है- बुद्धि और चरित्र।’  हमें समझना होगा कि अशिक्षित होना एक व्यक्ति विशेष के लिए समस्या हो सकती है, किंतु अनैतिक होना तो पूरी दुनिया के लिए त्रासदी है। शिक्षा बुद्धिमान और आत्म-विश्वासी बनाती है, लेकिन नैतिकता से रहित शिक्षा, महात्मा गांधी के शब्दों में कहें, तो एक सामाजिक पाप है। हम सब जानते हैं, यह केवल अज्ञान या पैसे या संसाधनों का संकट नहीं है, अपितु मूल्यों की विकृति का भी संकट है। इसका वीभत्स रूप कोरोना की दूसरी लहर में दिखा, जिसमें इंसान के साथ इंसानियत भी मरी। आज जरूरत है, मनुष्य को एक समग्रतावादी दृष्टि से देखने और समझने की, तभी हम सभ्य समाज की स्थापना की ओर कदम बढ़ा सकेंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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