फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन नजरियाजलवायु खतरों से निपटने में सबको राह दिखाए भारत

जलवायु खतरों से निपटने में सबको राह दिखाए भारत

आज (30 नवंबर) से संयुक्त अरब अमीरात की अध्यक्षता में कॉप-28 सम्मेलन की शुरुआत हो रही है। यह प्रभावी जलवायु कार्रवाई की दिशा में एक नई राह तैयार करने का मंच बन सकता है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की...

जलवायु खतरों से निपटने में सबको राह दिखाए भारत
Amitesh Pandeyसुनीता नारायण, पर्यावरणविद और महानिदेशक,सीएसईWed, 29 Nov 2023 10:49 PM
ऐप पर पढ़ें

आज (30 नवंबर) से संयुक्त अरब अमीरात की अध्यक्षता में कॉप-28 सम्मेलन की शुरुआत हो रही है। यह प्रभावी जलवायु कार्रवाई की दिशा में एक नई राह तैयार करने का मंच बन सकता है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में कहा गया है कि आठ साल पहले हुए पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उचित वैश्विक प्रयास नहीं हो रहे। 2015 में हुए पेरिस समझौते का मकसद ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को इस हद तक कम करना है, ताकि वैश्विक तापमान में वृद्धि औद्योगिक युग से पूर्व के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न होने पाए।
कॉप-28 में दुनिया भर के नेता शामिल होंगे और यह सुखद है कि ये सभी इस सच से वाकिफ हैं कि जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और इस संदर्भ में बहुत जल्द हमें कदम उठाने चाहिए। ‘सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयर्नमेंट’ की रिपोर्ट बताती हैकि इस साल जनवरी से सितंबर तक भारत में लगभग 86 प्रतिशत दिवसों में चरम मौसमी घटनाएं हुईं। लगभग हर दिन कहीं न कहीं मौसम के चरम पर पहुंचने के कारण करीब 3,000 लोगों को  जान गंवानी पड़ी। ऐसी घटनाओं से बचने का सवाल पूरी दुनिया के सामने है, और उम्मीद है कि कॉप-28 में इस पर सार्थक बातचीत होगी। 
इस सम्मेलन में भारत की भूमिका दो तरह की होगी। पहली भूमिका यह कि हम विकसित देशों की कतार में शामिल होना चाहते हैं, और यह जरूरत सिर्फ हमारी नहीं है, बल्कि उन तमाम देशों की भी है, जो विकास के पैमाने पर पीछे हैं। ऐसे में, कार्बन-उत्सर्जन से बचते हुए विकास-कार्यों को कैसे अंजाम दिया जाए, इसको लेकर भारत आधुनिक तकनीक व पूंजी की मांग को लेकर अपनी और अपने जैसे हरेक देश की तरफ से आवाज उठा सकता है। 
दूसरी भूमिका, जिम्मेदारी की है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषण-मुक्त विकास को हम तवज्जो देंगे। अनियोजित विकास का नुकसान हमने अभी-अभी देखा है। बेशक सिलक्यारा की सुरंग से सभी मजदूरों को सुरक्षित निकाल लिया गया, पर यह हादसा इसलिए हुआ, क्योंकि हम समझना ही नहीं चाहते कि हिमालय में विकास के लिए नया तरीका अपनाना होगा। बेशक, जहां विकास-कार्य होंगे, वहां प्रकृति को नुकसान हो सकता है, लेकिन स्थानीय पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। अंधाधुंध विकास को अब रोकना ही होगा। भारत ऐसे विकास का खाका खींचकर विश्व समुदाय का नेतृत्व कर सकता है। विकास जरूर हो, लेकिन यह ऐसा होना चाहिए कि पृथ्वी को नुकसान न पहुंचे। अन्यथा, विकसित देशों की तरह हम भी पर्यावरण के नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराए जाएंगे। पूरे यूरोप को यदि एक मान लें, तो आज भारत विश्व में चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है, लेकिन चीन और भारत में उत्सर्जन की दर में भारी अंतर भी है। इसलिए, हमें ऐसे ईंधन इस्तेमाल करने होंगे, जिसमें हमें कम से कम कार्बन-उत्सर्जन करना पड़े। 
इस लिहाज से कुछ कदम कारगर हो सकते हैं। मसलन, आज बड़े शहरों की ही नहीं, छोटे-छोटे कस्बों की सड़कें भी मोटरगाड़ियों से भरी नजर आती हैं। यदि हम सार्वजनिक परिवहन पर ध्यान दें, तो न सिर्फ प्रदूषण कम होगा, बल्कि उत्सर्जन में भी कटौती कर सकेंगे। इसी तरह, नए घरों को इस तरह बनाना होगा कि वे ऊर्जा-किफायती हों और उनमें कम बिजली खपत में भी पर्याप्त रोशनी की गुंजाइश बनी रहे। ऊर्जा के क्षेत्र में भी नीतिगत बदलाव आवश्यक है। आज भी हम कोयले को जलाकर बिजली पैदा कर रहे हैं। अगर हम सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा या अक्षय ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल करेंगे, तो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता घट सकती है। इसी तरह के रास्तों को हमें आगे बढ़ाना होगा, तभी हम विश्व समुदाय का नेतृत्व कर सकेंगे। ऐसा करना आवश्यक भी है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हम पर खूब पड़ रहा है। 
कॉप-28 सम्मेलन इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस सम्मेलन में शिरकत कर रहे हैं, इसलिए उम्मीद है कि यहां से कोई न कोई ठोस रास्ता जरूर निकलेगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें