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हरित ऊर्जा विकास में नेतृत्व संभालने में सक्षम भारत

फ्रैंक एफ इस्लाम अमेरिकावासी उद्यमी व समाजसेवी Naman Dixit
Tue, 30 Nov 2021 12:11 AM
हरित ऊर्जा विकास में नेतृत्व संभालने में सक्षम भारत

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन इस समझौते के साथ समाप्त हो चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग को पूर्व-औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाएगा। अन्य उपायों के अलावा सम्मेलन में मोटे तौर पर इस बात पर भी सहमति बनी कि जीवाश्म ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म की जाएगी, कोयले से बिजली उत्पादन को सिलसिलेवार कम किया जाएगा और वनों की कटाई रोकी जाएगी। इसके अतिरिक्त, विकसित देशों से यह गुजारिश की गई कि वे विकासशील राष्ट्रों को आर्थिक मदद दें, ताकि वे स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ सकें। 140 से अधिक देशों ने कार्बन उत्सर्जन को ‘नेट-जीरो’ (शुद्ध-शून्य) करने का वादा भी किया है। 
बावजूद इसके अमेरिका और अन्य विकसित देश ग्लासगो जलवायु समझौते से कुछ हद तक निराश थे। इसका एक कारण यह भी था कि भारत और चीन जैसे देश सम्मेलन खत्म होते-होते पश्चिमी मुल्कों के कोयले का इस्तेमाल सिलसिलेवार बंद करने संबंधी दबाव को हटाने में सफल रहे। बजाय इसके उन्होंने कोयले का इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से कम करने पर सहमति जताई। हालांकि, सम्मेलन के 26 साल के इतिहास में यह पहला मौका था, जब शिरकत करने वाले देशों ने ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम करने पर सहमति जताई, जबकि यह ईंधन कई राष्ट्रों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। 
भारत ने भी इस दशक के अंत तक अक्षय स्रोतों से अपनी आधी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का संकल्प लिया है। सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा। भारत की यह प्रतिबद्धता काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कार्बन-उत्सर्जक है। कुल मिलाकर, तमाम राष्ट्र यह मानने लगे हैं कि जलवायु परिवर्तन मानव जाति के लिए आसन्न खतरा है, और एक-दूसरे पर दोषारोपण से न इसका हल हो सकता है, न जलवायु को सुधारने में मदद मिल सकती है। 
भारत जैसे देशों के लिए हरित होना काफी फायदेमंद सौदा हो सकता है। अगर सही तरीके से यह काम किया जाता है, तो इससे पर्याप्त आर्थिक लाभ मिलेगा। जिस तरह से 20वीं सदी की शुरुआत में ऑटोमोबाइल ने और 20वीं सदी के अंत व 21वीं सदी की शुरुआत में सूचना प्रौद्योगिकी ने बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का कायांतरण कर दिया था, ठीक वैसे ही हरित ऊर्जा विश्वव्यापी आर्थिक विकास की नई राह बन सकती है। ये आर्थिक गतिविधियां इतनी अहम साबित होंगी कि वे विकास को बढ़ावा देंगी और पूरे विश्व में जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाएंगी। हरित ऊर्जा में अवसर किस तरह से बढ़ेंगे, इसका एक उदाहरण अमेरिकी कंपनी टेस्ला है। इस कंपनी ने बहुत कम समय में अपने अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिस्पद्र्धी कंपनियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। टेस्ला का मार्केट कैप (जो हाल ही में एक ट्रिलियन डॉलर को छू गया) टोयोटा, वोक्सवैगन, डेमलर, जनरल मोटर्स, बीएमडब्ल्यू और फरारी के संयुक्त मार्केट कैप से अधिक है। यह अब निवेशकों के लिए सोने की खान है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यह सिर्फ एक उदाहरण है। हरित ऊर्जा के क्षेत्र की कई ऐसी कंपनियां और उद्योग हैं, जो राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के लिए विकास का पहिया बनने को बेताब हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में तो बाइडन सरकार हरित ऊर्जा में जबर्दस्त क्षमता देख रही है, और हरित अर्थव्यवस्था पर बड़ा दांव लगाने जा रही है। राष्ट्रपति बाइडन ने दो ट्रिलियन डॉलर खर्च का जो फ्रेमवर्क घोषित किया और जिसे अमेरिकी सदन ने हाल ही में पारित किया है, उसमें भी स्वच्छ ऊर्जा पर 555 बिलियन डॉलर खर्च की योजना है।
इस मामले में भारत को अमेरिका से हाथ मिलाना चाहिए और कम कार्बन-उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ऐसा नहीं करने का मतलब होगा, पर्यावरण का लगातार क्षरण और हरित ऊर्जा से मिलने वाले आर्थिक अवसरों से दूरी। अधिकांश क्षेत्रों की तरह, हरित ऊर्जा में भी शुरुआती निवेशकों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। लिहाजा, भारत हरित ऊर्जा आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाकर अपने नागरिकों के लिए आर्थिक लाभ और जलवायु परिवर्तन से जुड़े फायदे उठा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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