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Hindi News ओपिनियन नजरियाएग्जिट पोल पर हमारे ऐतबार से जुड़े पुराने सवाल-जवाब

एग्जिट पोल पर हमारे ऐतबार से जुड़े पुराने सवाल-जवाब

चाहे अखबारों में हो, पत्रिकाओं में या फिर टीवी चैनलों पर, एग्जिट पोल के नतीजों का प्रकाशन-प्रसारण एक चेतावनी या ‘डिसक्लेमर’ के साथ होता है- ‘एग्जिट पोल मतदान बाद किए गए सर्वेक्षण पर आधारित हैं...

एग्जिट पोल पर हमारे ऐतबार से जुड़े पुराने सवाल-जवाब
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Pankaj Tomarहरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकारSun, 02 Jun 2024 10:48 PM
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चाहे अखबारों में हो, पत्रिकाओं में या फिर टीवी चैनलों पर, एग्जिट पोल के नतीजों का प्रकाशन-प्रसारण एक चेतावनी या ‘डिसक्लेमर’ के साथ होता है- ‘एग्जिट पोल मतदान बाद किए गए सर्वेक्षण पर आधारित हैं, ये चुनाव नतीजों का संकेत भर हो सकते हैं, ये असल चुनाव नतीजे नहीं हैं।’ अगर एग्जिट पोल के नतीजे असल परिणाम होते, तो मतगणना जैसी दु:साध्य कवायद के इंतजार की शायद जरूरत ही न रह जाती। 
पिछले दो आम चुनावों या पिछले कुछ समय में हुए विधानसभा चुनावों को भी देखें, तो अक्सर एग्जिट पोल के नतीजे वास्तविक नतीजों के काफी करीब रहे हैं। लेकिन ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं, जब ये वास्तविकता से काफी दूर थे। इसका एक बड़ा उदाहरण 2022 में हुआ पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव है। ज्यादातर राष्ट्रीय स्तर के खबरिया चैनलों ने वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनवा दी थी। बाद में जब नतीजे आए,  तो वहां तृणमूल कांग्रेस ने आसानी से बहुमत हासिल कर लिया। एक और उदाहरण 2004 के आम चुनाव हैं। चुनाव की शुरुआत में माहौल प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में दिख रहा था, लेकिन बाद में माहौल बदल गया था और एग्जिट पोल इस बदलाव को पकड़ नहीं पाए।  
इसका अर्थ यह नहीं है कि इस समय हमारे सामने 2024 के आम चुनाव के एग्जिट पोल के जो नतीजे हैं, हम उन सबको शक की नजर से देखने लगें। हमें यह मानकर चलना होगा कि एग्जिट पोल एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें त्रुटियों की गुंजाइश काफी ज्यादा रहती है और इस बात को एग्जिट पोल व राजनीति के तमाम विशेषज्ञ भी स्वीकार करते हैं। दुनिया में जितने भी लोकतांत्रिक देश हैं, उन सभी में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण व एग्जिट पोल निर्वाचन परंपरा का जरूरी हिस्सा बन चुके हैं और तकरीबन सभी जगहों पर वे सही व गलत, दोनों ही होते रहे हैं। समस्या इसमें है भी नहीं, समस्या अक्सर इससे आगे आती है। 
जीवन में हम अक्सर बहुत सी चुनौतियों की व्यवस्था को एक औपचारिकता मानकर उनसे आंखें मूंद लेते हैं। जैसे, यहां कूड़ा फैलाना मना है, वगैरह। अक्सर यही व्यवहार एग्जिट पोल के साथ दी जाने वाली सूचना के साथ भी किया जाता है। टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल के बाद होने वाली बहसों को देखिए। वहां चर्चा इस पर चलने लगती है कि किसकी रणनीति गलत रही और किसकी सही? किसने किस मसले को गंभीरता से लिया और किसने असली मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया? ऐसी बातचीत लगातार चलती रहती है, यह जानते व मानते हुए भी कि सारा बहस-मुबाहिसा जिस धरातल पर किया जा रहा है, वह बहुत ठोस नहीं है। 
एग्जिट पोल हमेशा से ऐसे नहीं थे। एक दौर था, जब यह कवायद कुछ बडे़ अखबार ही किया करते थे। वे एग्जिट पोल शुरुआती चरणों में ही महत्वपूर्ण होते थे, क्योंकि आखिरी चरण के मतदान के साथ ही मतगणना भी शुरू हो जाती थी। इस बीच तीन चीजें हुई हैं। एक तो मतगणना आखिरी चरण के दो-तीन दिन बाद ही होती है। दूसरी, मीडिया को पाबंद कर दिया गया है कि वे आखिरी चरण का मतदान खत्म होने से पहले एग्जिट पोल के नतीजों का प्रसारण नहीं कर सकते। तीसरी चीज यह हुई कि 24 घंटे लाइव रहने वाले अनगिनत टीवी चैनल हमारे बीच आ चुके हैं और सबसे ज्यादा असर इसी का पड़ा है। जब आखिरी चरण का मतदान खत्म हो जाता है, तब यह समस्या खड़ी हो जाती है कि अब आगे दर्शकों को कैसे जोडे़ रखा जाए? ठीक यहीं पर उनकी मदद के लिए आगे आता है एग्जिट पोल। इसके नतीजों का सिरा पकड़कर वे अगले दो-तीन दिन आसानी से बिता सकते हैं। 
चुनाव को लेकर हम अक्सर कुछ धारणाएं बना लेते हैं और वही धारणाएं जमीनी सच लगने लगती हैं। जब ये धारणाएं एग्जिट पोल से मेल खाती नहीं दिखतीं, तो उनको स्वीकारना आसान नहीं होता। 
मनोविज्ञान यह कहता है कि अक्सर जब हम पूरी शिद्दत से किसी चीज को देखना चाहते हैं, तो वही चीज हमें दिखाई भी देने लग जाती है, जबकि वह हकीकत में वैसी नहीं होती। मनोविज्ञान का यह नियम सिर्फ राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों पर लागू नहीं होता, उन पर भी लागू होता है, जो एग्जिट पोल का आयोजन करते हैं!  
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)