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शेयर बाजार की मौजूदा बढ़त बेकार न जाए

मदन सबनवीस, अर्थशास्त्रीPublished By: Naman Dixit
Wed, 28 Jul 2021 11:30 PM
शेयर बाजार की मौजूदा बढ़त बेकार न जाए

फूड डिलीवरी कंपनी जोमैटो के आईपीओ ने शेयर बाजार और उसकी विशेष प्रकृति के बारे में एक मिसाल पेश की है। पिछले साल जब अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी और लगभग सभी सेक्टर तबाह थे, तब भी शेयर बाजार मजबूती से खड़ा था। यही स्थिति आज भी जारी है, इस आशंका के बावजूद कि कोविड संक्रमण की तीसरी लहर देश में कभी भी आ सकती है। 50,000 बीएसई सेंसेक्स को भी सहजता से लिया जा रहा है और निवेशक इसके 60,000 तक पहुंचने की अटकलें लगा रहे हैं। विशेषज्ञों के मशविरों से मीडिया भरा हुआ है। कुछ विशेषज्ञ शेयर बाजार के लिए बड़ी संभावनाएं बता रहे हैं, तो कुछ सशंकित भी हैं। 
बहरहाल जोमैटो के आईपीओ को 38 गुना अधिक बोलियां मिलीं और उसका एक रुपये का शेयर 75 रुपये के प्रीमियम पर बेचा गया। लिस्टिंग पर ही अनेक लोग करोड़पति हो गए। जाहिर है, बाजार को यह पेशकश पसंद आई। शेयरों का मूल्यांकन इस बात पर आधारित होता है कि किसी कंपनी से कैसे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है। यदि कोई भारत की विकास गाथा पर भरोसा करता है, तब अर्थव्यवस्था को जल्द ही आठ प्रतिशत की तेजी से सरपट दौड़ना चाहिए और निवेशक भी इसी दौड़ में शामिल हो सकते हैं। इस दृष्टि से आज का नुकसान कल का मुनाफा होगा, जो शेयर धारकों की आय बढ़ाएगा और यह इसकी कीमत में प्रतिबिंबित होगा। इस सकारात्मक परिदृश्य में शेयरों के आगे बढ़ने का मार्ग खुला हुआ है। आइए देखते हैं कि पिछले दशक में बीएसई सेंसेक्स कैसे बढ़ा है। जनवरी 2010 से यह 45 महीनों के आसपास यानी लगभग चार वर्ष 15,000-20,000 के दायरे में रहा। इसके बाद, अक्तूबर 2013 और अप्रैल 2017 के बीच यानी 43 महीने की अवधि में यह 20,000 और 30,000 के बीच ऊपर-नीचे होता रहा। एक बार फिर इसे नए शिखर पर पहुंचने में लगभग साढ़े तीन साल लग गए। अगले 29 महीनों के लिए, सितंबर 2019 तक, सेंसेक्स 30,000 और 40,000 के बीच था। इससे संकेत मिलता है कि 10,000 अंक तक के उछाल में कम समय लगा। कोविड के चलते बाजार नीचे आ गया। यह झटका अल्पकालिक रहा, जून के बाद से रुझान बदलने लगा। जून से अक्तूबर 2020 के बीच सेंसेक्स 30,000 से 40,000 के दायरे में रहा। अगले छह माह में यह 50,000 के अंक तक पहुंच गया। इस वर्ष मई से अर्थात कोविड लॉकडाउन का दूसरा दौर शुरू होने के बाद से सेंसेक्स 50,000 से ऊपर है। यह तेजी का दौर है, शेयर बाजार नए शिखर हासिल कर रहा है। जाहिर है, खुदरा निवेशकों की मंशा 50,000 से अधिक के स्तर पर बाजार में निवेश की है। आज बाजार में प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को इसका लाभ तभी मिल सकेगा, जब सूचकांक 60,000 और फिर 70,000 की ओर बढ़े। जो निवेशक पहले आए थे, यहां तक कि 2019 में भी, उन्हें भी 30 प्रतिशत से अधिक का लाभ हुआ होगा। सवाल यह कि क्या यह कायम रहेगा? लाभ के लिए चार वर्ष या सिर्फ छह माह, कितना इंतजार करना होगा, आज कोई नहीं कह सकता।
लेकिन आम आदमी शेयरों के पीछे क्यों भाग रहा है? किसी बड़े बाजार के चार चालक होते हैं। पहला है लालच। वॉल स्ट्रीट  फिल्म में काल्पनिक चरित्र गॉर्डन गेको ने कहा है, ‘लालच अच्छा है।’ फायदा पहले भी हुआ है, तो आगे भी हो सकता है। दूसरा है, ‘लाभकारी प्रभाव।’ आईपीओ के इश्यू होने के बारे में चर्चा चलने पर हर कोई विश्वास कर लेता है कि लिस्टिंग होने पर इसकी कीमत बढ़ जाएगी, जिससे तत्काल फायदा होगा। तीसरा है, ‘विशेषज्ञ प्रभाव।’ बिजनेस टीवी चैनलों या बिजनेस अखबारों में सलाहकार हमेशा निवेश करने के लिए कहते हैं। चौथा है, ‘पुश-टु-ए-कॉर्नर इफेक्ट’। अर्थात अन्य कहीं निवेश में जब कोई फायदा मिलता नहीं दिखता है, तो वह शेयरों में निवेश के लिए खुद को मजबूर पाता है। मसलन, छह प्रतिशत से ज्यादा मुद्र्रास्फीति का मतलब है फिक्स्ड डिपॉजिट पर कोई लाभ न होना। ऐसे में, विशेषज्ञ जो कहते हैं, उन्हें वही अच्छा लगता है। शेयर बाजार का रुख उत्साहजनक लगता है। इसका मतलब यह भी है कि सरकार के लिए यह अच्छा समय है कि वह संसाधन जुटाने के लिए अपनी विनिवेश योजनाओं को आगे बढ़ाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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