DA Image
हिंदी न्यूज़ › ओपिनियन › नजरिया › समय से काफी पहले चुनावी तैयारी में जगन सरकार
नजरिया

समय से काफी पहले चुनावी तैयारी में जगन सरकार

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Mon, 27 Sep 2021 11:43 PM
समय से काफी पहले चुनावी तैयारी में जगन सरकार

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने पिछले दिनों अपनी पार्टी वाईएसआरसी से चुनाव की तैयारी शुरू करने को कहा, जिससे राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। जगनमोहन सरकार का तीसरा वर्ष चल रहा है और इतनी जल्दी इस तरह के बयान ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को चौंका दिया है। संभव है, मुख्यमंत्री चौथे वर्ष में ही, निर्धारित समय से 24 महीने पहले, विधानसभा चुनाव कराने का इरादा रखते हों, लेकिन उनका असल मकसद बिना किसी विरोध के चुनावी जीत हासिल करने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना है।

दरअसल, जगनमोहन ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ रखा है और कयास है कि 2022 के मध्य से वह पार्टी के लिए काम करना शुरू कर सकते हैं। वह इस तरह का माहौल बना सकते हैं कि चौथे वर्ष के अंत में चुनाव कराए जा सकें। पर फिलहाल इसे अटकल कहना ही ज्यादा सही होगा। वैसे, सत्तारूढ़ पार्टियां सत्ता-विरोधी लहर से पार पाने के लिए ऐसी रणनीति अपनाती रही हैं। मगर कार्यकाल के बीचोबीच चुनाव की वकालत करना किसी भी सरकार के लिए  असामान्य घटना मानी जाती है। लिहाजा, अभी चुनाव की चर्चा करने की आखिर क्या वजह हो सकती है? जगनमोहन सरकार ने कल्याण के कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। कुछ का सुझाव है कि इन योजनाओं के असर खोने से पहले इनका लाभ उठा लेना चाहिए। और फिर, वाईएसआरसी ने स्थानीय निकाय चुनावों में कमोबेश सारी सीटें जीतकर काफी अच्छा प्रदर्शन भी किया है। संभवत: यह रुझान विधानसभा चुनाव में भी कारगर साबित हो। मगर क्या समय-पूर्व चुनाव सत्ता-विरोधी लहर को बेअसर कर सकता है? अकादमिक अध्ययन बताते हैं कि नवनिर्वाचित सरकार के लिए शुरुआती महीने काफी हद तक मुधमास जैसे होते हैं, लेकिन दूसरा वर्ष पूरा होते-होते साख फीकी पड़ने लगती है और मतदाता शासकों में दोष खोजने लगते हैं। यह गुणा-भाग उन पार्टियों पर और ज्यादा असरंदाज होता है, जो किसी एक व्यक्ति के करिश्मे के आधार पर सत्ता में पहुंचती हैं। वाईएसआरसी भी जगनमोहन के एकल नेतृत्व वाली पार्टी है। विभिन्न अध्ययनों का यह भी निष्कर्ष है कि सत्ता में रहते हुए फिर से चुनाव जीतना कठिन होता है। हालांकि, राजनीतिक दल आमतौर पर सत्तारूढ़ व पूर्व मंत्रियों को टिकट न देकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह मसला तब और उलझ जाता है, जब पार्टी का नेतृत्व ऐसा व्यक्ति कर रहा हो, जो अपने करिश्मे पर जीतता हो। भारतीय चुनावों पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय का एक अध्ययन बताता है कि सत्तारूढ़ नेता फिर से यदि चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो परिस्थितियां पहले से ही 15 फीसदी उनके खिलाफ होती हैं। 
हाल के स्थानीय निकाय चुनावों ने बेशक जगनमोहन की लोकप्रियता बढ़ाई है, पर वह अपने पिता वाईएसआर रेड्डी के कदमों पर चलने के इच्छुक हैं, जिन्होंने जन-कल्याणकारी योजनाओं की मदद से मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का काम किया था। मगर यह सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि योजनाएं किस हद तक जमीन पर उतरती हैं। विपक्ष के असमंजस में होने से भले मौजूदा माहौल जगनमोहन के पक्ष में दिख रहा हो, लेकिन उन्हें अब भी बहुत कुछ करना होगा। पर्यवेक्षकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में प्रशांत किशोर का दांव सफल रहा और वह ममता को लगातार तीसरी बात सत्ता तक ले आए, पर आंध्र प्रदेश के हालात बंगाल से जुदा हैं। अपने पिता की मौत से उपजी सहानुभूति और कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ उनके मुखर विरोध से पैदा हुई जनभावना ने जगनमोहन को सत्ता तक पहुंचाया है। उन्होंने राज्य के विभाजन का भी विरोध किया था। मगर उनका शासनकाल प्रभावशाली नहीं रहा है। नई राजधानी अमरावती का निर्माण उन्होंने रोक दिया और चार प्रशासनिक केंद्र बनाए, जिससे लोगों को काफी परेशानी हुई है। चंद्रबाबू नायडू की तरह, जगनमोहन भी केंद्र से विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने में विफल रहे।
इतना ही नहीं, राज्य की जीडीपी भी नकारात्मक है और नियमित कामकाज के लिए भी भारी कर्ज लेना पड़ा है। ऐसे में, जगनमोहन ने जन-कल्याणकारी योजनाओं पर काफी खर्च करने की प्रतिबद्धता जताई है। तो क्या वह जल्द चुनाव का दांव चलने वाले हैं? 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

संबंधित खबरें