DA Image
हिंदी न्यूज़ › ओपिनियन › नजरिया › उस मुलाकात से जुड़ी थीं आशाएं और आशंकाएं 
नजरिया

उस मुलाकात से जुड़ी थीं आशाएं और आशंकाएं 

यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाताPublished By: Naman Dixit
Sun, 26 Sep 2021 11:32 PM
उस मुलाकात से जुड़ी थीं आशाएं और आशंकाएं 

सेकंड मिनट में बदल गए और मिनट एक घंटे में बदल गए। वास्तव में बातचीत में एक घंटे से थोड़ा अधिक समय बीत गया। तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ बैठक चल रही थी। बाहर भारतीय राजनयिक सबसे ज्यादा आशंकाओं से घिरे बैठे थे और घड़ी देख रहे थे। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, उनका तनाव भी बढ़ता जा रहा था। अमेरिका में सत्ता में आए जो बाइडन प्रशासन के तहत अमेरिका के साथ भारत के संबंधों के भविष्य के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण बैठक थी।

सब जानते हैं, भारतीय मूल से ताल्लुक रखने वाली अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस विगत वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार की कड़ी आलोचक रही हैं। एक डेमोक्रेटिक सीनेटर के रूप में उन्होंने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को रद्द करने के कदम का विरोध किया था। इस विशेष दर्जे को जिस तरह से अप्रभावी किया गया, उस पर उन्हें आपत्ति थी। इसके अलावा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के तहत गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को ही भारतीय नागरिकता देने के प्रावधान के भी वह खिलाफ थीं। वास्तव में, इन मुद्दों पर मोदी सरकार की कमला हैरिस द्वारा आलोचना, भारतीय प्रधानमंत्री के बारे में डेमोक्रेटिक पार्टी, विशेष रूप से इसके प्रगतिशील तबके में अंतर्निहित बेचैनी की ही अभिव्यक्ति थी। यह बात छिपी नहीं है कि अमेरिका के प्रगतिशील तबके में नरेंद्र मोदी को एक अनुदार, सत्तावादी नेता के रूप में देखा जाता था और आज भी देखा जाता है। जब साल 2019 में भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जे को समाप्त किया था या जब इस राज्य की सांविधानिक स्थिति में बदलाव किया था, तब लगभग आवेशपूर्ण ढंग से कमला हैरिस ने कहा था कि हमें कश्मीरियों को याद दिलाना होगा कि वे दुनिया में अकेले नहीं हैं। हम स्थिति पर नजर रख रहे हैं। स्थिति की मांग होने पर हस्तक्षेप करने की जरूरत है। कमला हैरिस द्वारा की गई आलोचना के साथ-साथ यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि चेन्नई में जन्मी अमेरिकी डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल ने भी भारतीयों को  फटकार लगाई थी और कहा था कि पूरा भारतीय-अमेरिकी समुदाय इस फैसले में भारतीयों के साथ नहीं है। जयपाल को पहला झटका तब लगा, जब उनकी भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ सार्वजनिक  नोकझोंक हो गई। जयशंकर अमूमन ऐसी आलोचनाओं को नजरंदाज कर देते हैं। पर जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा कांग्रेस में विदेश संबंध समिति में पेश होकर जवाब देने का मौका आया, तब जयशंकर ने बातचीत के लिए उपस्थित होने से इनकार कर दिया। उन्हें पता लग गया था कि समिति में प्रमिला जयपाल रहेंगी और सवाल-जवाब से अप्रिय स्थिति बनेगी। तब भी कमला हैरिस ने ट्वीट करके कहा था, ‘किसी भी विदेशी सरकार के लिए कांग्रेस को यह बताना गलत है कि कैपिटल हिल पर बैठकों में सदस्यों को क्या अनुमति है। मैं प्रमिला जयपाल के साथ खड़ी हूं।’ 
तब भारत ने माना था और आज भी माना जाता है कि उसने डेमोक्रेटिक पार्टी या कम से कम उसके प्रगतिशील सांसदों को खो दिया है। लेकिन अब हम देख रहे हैं, स्थिति बदली हुई है। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस अमेरिका में दूसरा सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पद संभाल रही हैं। जिन पर अपने देश की नीतियों को दिशा देने की बड़ी जिम्मेदारी है, अब उन्होंने एक तरह से मौका गंवा दिया है। वह भारतीय प्रधानमंत्री के सामने वे मुद्दे उठा सकती थीं, जिसे लेकर कई अमेरिकी आंदोलित थे। कमला हैरिस ने कश्मीर, सीएए और तमाम विवाद के मुद्दों पर कोई सवाल-जवाब नहीं किया। नरेंद्र मोदी के साथ उनका सामना हुआ और दूसरे मुद्दों पर बातें हुईं। अमेरिका में मोदी के आलोचक इस मौके को अलग ंढंग से देख रहे थे। हालांकि, गौर करने की बात यह भी है कि साल 2020 से ही अमेरिकी सरकार के सभी तीन स्तंभों- व्हाइट हाउस, कांग्रेस और सीनेट को डेमोके्रट ने ही नियंत्रित किया है। बेशक, गुरुवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उस विरोध को परखने के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति से मिलना एक साहसिक व जोखिम भरा कदम था। पासा किसी भी तरफ पलट सकता था, लेकिन उनका दांव रंग लाया।

संबंधित खबरें