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क्षेत्रीय दलों के आए दिन मिलने और लड़ने से उपजते सवाल

भारतीय लोकतंत्र एक अजीब सी दुविधा के दौर से गुजर रहा है। प्रतिपक्षी पार्टियां अपनी मजबूत सकारात्मक उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रही हैं। कभी वे गठबंधन के सहारे आगे बढ़ती दिखाई देती हैं, तो कभी स्वतंत्र...

क्षेत्रीय दलों के आए दिन मिलने और लड़ने से उपजते सवाल
Pankaj Tomarराजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकारSun, 25 Feb 2024 10:24 PM
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भारतीय लोकतंत्र एक अजीब सी दुविधा के दौर से गुजर रहा है। प्रतिपक्षी पार्टियां अपनी मजबूत सकारात्मक उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रही हैं। कभी वे गठबंधन के सहारे आगे बढ़ती दिखाई देती हैं, तो कभी स्वतंत्र अस्तित्व को लेकर इतनी संवेदनशील हो जाती हैं कि कोई समझौता नहीं करना चाहतीं। जाहिर है, वे एक-दूसरे से भयभीत या असुरक्षित अनुभव करती हैं, इसलिए यह कालखंड भारतीय राजनीति का संक्रमण-काल भी कहा जा सकता है। किसी भी लोकतंत्र में यह अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है। कालखंड के हिसाब से समाज और देश अपने आपको बदलता है, तो उसकी शासन-प्रणाली में भी क्यों परिवर्तन नहीं होना चाहिए? अभी तक बहुदलीय व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र की खास बात रही है। 
किसी भी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त सामूहिक नेतृत्व ही है। यह तभी संभव है, जब विविध संस्कृतियों और धर्मों की कोख से नेतृत्व की तमाम समान धाराएं निकलें और राष्ट्र की मुख्य प्रशासनिक गंगा में समा जाएं। हिन्दुस्तान में बीते 75 साल में ऐसा हुआ है। इसी कारण अलग-अलग सभ्यतागत चरित्र, सामाजिक संरचना, आस्था और अपनी विभिन्न मान्यताओं-धारणाओं को स्वीकार करते हुए भारत दुनिया में अपने लोकतंत्र की साख कायम कर चुका है। ऐसा कोई भी देश नहीं है, जहां संस्कृति का इतना मिश्रित स्वरूप देखने को मिलता हो। इसलिए बहुदलीय लोकतंत्र यहां के लिए सर्वाधिक अनुकूल प्रणाली है। हालांकि, हाल के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों, सियासत के बदलते चरित्र और प्रादेशिक व क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका के मद्देनजर नए सिरे से यह बहस अनिवार्य लगने लगी है कि तेजी से भाग रही दुनिया में क्या भारत के लिए अपनी राजनीतिक संरचना में परिवर्तन आवश्यक हो गया है?
वैसे तो पश्चिम और यूरोप के अनेक विकसित देशों में दो दलों की प्रधानता वाली प्रणाली भी कामयाबी से चल रही है। वहां साक्षर समाज ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि आज के संपन्न संसार में अनेक वैचारिक धाराओं की वैसी जरूरत नहीं रही है, जैसी पचास-साठ साल पहले होती थी। व्यावहारिक तौर पर देखें, तो आज समाजवाद की अवधारणा उपयोगी होते हुए भी बासी पड़ चुकी है। जिस दौर में पूंजी का इतना बोलबाला हो, उसमें सभी वर्गों के लिए समानता की बात करना अव्यावहारिक है। यही हाल वामपंथी विचारधारा का है। अधिकारों और अपने हक के लिए लड़ाई लड़ने को कितने लोग सड़कों पर उतरना चाहते हैं? नई पीढ़ी तो आंदोलन और हड़ताल करने से बिदकती है। मानव श्रम का शोषण रोकने के लिए बनाए गए कानून बेमानी हो गए हैं। आज जम्हूरियत के नाम पर कमोबेश सारे बड़े देशों में एक लचीली व व्यावहारिक दक्षिणपंथी धारा दिखाई देती है। कमोबेश सारे राष्ट्र अब एक ताकतवर चेहरे को पसंद करते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र का यही आधुनिकतम संस्करण है, जिससे अधिनायकवादी गंध भी आती है। वर्तमान उपभोक्तावादी समाज में इसे बहुत आपत्तिजनक नहीं माना जा रहा है। यही कारण है कि सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण समाज को सिद्धांतों की चिंता नहीं रह गई है।   
भारतीय संदर्भ में भी यह बात समझी जा सकती है। यहां दो दल- भाजपा व कांग्रेस ही अपना अस्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर बचाकर रखे हुए हैं। यहां राजनीतिक अस्थिरता ने अधिकतर प्रादेशिक दलों को जन्म दिया है। गठबंधन सरकारों का सिलसिला भी इसी दौर की उपज है। इन छोटे, मंझोले और क्षेत्रीय दलों को देखें, तो पाते हैं कि वे अपने आप में संपूर्ण दल नहीं बन पाए हैं। उनकी आंतरिक संरचना में जाति और परिवार ही प्रधान हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है। ऐसी पार्टियों का वैचारिक आधार नहीं होने से वे अपने स्वार्थों के आधार पर सत्ताधारी राष्ट्रीय दल के साथ गठबंधन करने लगती हैं। उन्हें गठबंधन से कोई रोक नहीं सकता, पर यदि सिद्धांतविहीन राजनीति पर देश चल पड़ा हो, तो जम्हूरियत भी कमजोर होती है। 
आज भी अनेक क्षेत्रीय पार्टियों का संगठन बिना बहस सारे निर्णय का अधिकार पार्टी सुप्रीमो के हाथ में सौंप देता है। अतीत गवाह है कि एक व्यक्ति का निर्णय तो गलत हो सकता है, मगर सामूहिक फैसले कम ही गलत निकलते हैं, तो क्या हम आने वाले दिनों में भारतीय लोकतंत्र में दो पार्टियों की व्यवस्था को निमंत्रण दे रहे हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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