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तालिबानी शिकंजे में आधी आबादी को कितनी जगह

नगमा सहर, वरिष्ठ टीवी पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Fri, 24 Sep 2021 10:36 PM
तालिबानी शिकंजे में आधी आबादी को कितनी जगह

बीते रविवार को काबुल की सड़कों पर दो दर्जन से ज्यादा अफगान औरतों ने महिला मंत्रालय के सामने विरोध-प्रदर्शन किया। तालिबान की नई सरकार ने इस मंत्रालय पर ताला लगा दिया है। यहां काम करने वाली औरतों को घर लौटने के लिए कह दिया गया है। बाहर नई तख्ती लगी है, धर्म के प्रचार और अधर्म को रोकने का मंत्रालय। इससे पहले, तालिबान की इसी सरकार ने आईपीएल पर इसलिए रोक लगा दी, क्योंकि दर्शकों में महिलाएं होंगी, तो यह गैर-इस्लामिक होगा। इस पुरुष प्रधान सरकार ने आधी आबादी को घरों में बंद कर दिया है। 12 साल से ऊपर की लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। क्लास रूम में लिंगभेद हावी है। पुरुष अध्यापक लड़कियों को पढ़ा नहीं सकते। खेल-कूद की दुनिया बिल्कुल निराश है। गायिकाएं, कलाकार, जो निकल सकते थे, वे देश से भाग निकले हैं। इनके लिए अब यहां कोई जगह नहीं। यह नया अफगानिस्तान है।

तालिबान-2.0 में औरतों, अल्पसंख्यकों और किसी तरह की विविधता की कोई जगह नहीं। यह वह समावेशी सरकार नहीं है, जिसका झूठा वादा तालिबान दुनिया से करते रहे। यह सिर्फ कट्टर सुन्नी पुरुषों की सरकार है, जिसमें मुट्ठी भर उज्बेक व ताजिक हैं, पर अल्पसंख्यक मूल निवासी हजारा की कोई जगह नहीं। यह तालिबान का वही पुराना रूढ़िवादी चेहरा है, जो अमेरिका के वहां आने से पहले 1996 से 2001 के दौरान अफगानिस्तान पर काबिज रहा। उस दौर के अफगानिस्तान में लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी थी, औरतें नौकरी नहीं कर सकती थीं, वे परदे में और घर की चारदीवारी के अंदर थीं। लेकिन अमेरिकी सैनिकों के साए में लड़कियों के  स्कूल-कॉलेज फिर से गुलजार हुए। इस साल अगस्त में जब आखिरी अमेरिकी सैनिक ने बगराम एयर बेस से उड़ान भरी, तब दो दशक बीत चुके थे। इन 20 वर्षों में बच्चों की पूरी एक नस्ल जवान हुई है। इनमें वे लड़कियां भी हैं, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई की। इन्होंने आजादी को जिया है। इन्हें अब दीवारों के अंदर कैद होकर, काले बुर्कों में बंद रहना मंजूर नहीं। राजधानी काबुल, हेरात, कंधार व कई बड़े शहरों की सड़कों पर विरोध के बाद दुनिया भर में रह रही अफगान औरतों ने तालिबान की कट्टर नीतियों के खिलाफ सोशल मीडिया का सहारा लिया और एक ऑनलाइन कैम्पेन चलाया, डूनॉटटचमाईक्लॉथ्स।  यह जवाब था उस स्याह बुर्के का, जिसे पहनाकर तालिबान ने काबुल विश्वविद्यालय में 300 औरतों से कहलवाया था कि वे इस नई सरकार और इसकी नीतियों से खुश हैं। 
इतिहास गवाह है, अफगान संस्कृति काफी उदार व आधुनिक रही है। 1919 से एक दशक तक राज करने वाले बादशाह अमानुल्लाह के शासन में वहां की रानी सोराया ने काबुल में लड़कियों का पहला स्कूल खोला। वह महिलाओं के अधिकार के लिए आवाज बुलंद करने वाली महिला थीं। बीच के दौर में कुछ उथल-पुथल रही, पर अफगानिस्तान के आखिरी बादशाह जहीर शाह के शासन के दौरान अफगान महिलाएं कई क्षेत्रों में आगे थीं। 1964 में महिलाओं ने उस संविधान को बनाने में मदद की, जिसने उन्हें वोट का हक दिया और चुने जाने का अधिकार। नौकरी, कारोबार और सियासत सभी जगह वे मौजूद थीं। फिर, सोवियत हमला हुआ और उनके व मुजाहिदीन के बीच गृह युद्ध में महिलाएं पिसती गईं। तालिबान ने जब 1996 में रूसियों को भगाकर अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमाया, तब अफगानी औरतों की दुनिया बदल गई। इस्लाम के नाम पर उन्होंने धार्मिक शरिया कानून लागू किया। नतीजतन, महिलाएं समाज से नदारद होकर घरों में बंद कर दी गईं।
क्या मध्य एशिया के दूसरे इस्लामी मुल्कों में भी महिलाओं के अधिकारों पर ऐसी ही पाबंदी है? निस्संदेह, सऊदी अरब, यूएई जैसे मुल्कों में महिलाओं की कुछ यही दशा है। हालांकि, यूएई में महिलाओं के अधिकार तो हैं, पर ये किसी पुरुष अभिभावक की मर्जी पर निर्भर है। वहां उन्हें गाड़ी चलाने, वोट करने और संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार है, लेकिन मर्जी से शादी करने, बच्चों की कानूनी कस्टडी लेने जैसे मामलों में पुरुषों पर उनकी निर्भरता है। इन दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र चल रहा है। अफगानिस्तान का मुद्दा केंद्र में है। क्या वहां की मानवीय त्रासदी पर दुनिया गौर करेगी? 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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