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22 जनवरी, 2021|11:34|IST

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और भी जरूरी हुआ मानव व्यवहार को समझना 

कोविड महामारी वास्तव में एक वैश्विक समस्या है। 188 देशों में बीमारी फैलाने के लिए एक ही वायरस जिम्मेदार है। जलवायु या लोगों के भोजन की आदतों के आधार पर कहीं भी वायरस ने अलग व्यवहार नहीं किया है। इसके लक्षण दुनिया भर में लगातार समान बने हुए हैं। इसके फैलने की अहम वजह थी वैश्विक यात्राएं, जो वैश्वीकरण की ही एक उत्पाद हैं। हालांकि, इस महामारी का प्रबंधन वैश्विक स्तर पर नहीं किया गया। अलग-अलग देशों के पास इससे निपटने के अलग-अलग तरीके हैं। कुछ देशों, जैसे ताइवान ने इसे देश के स्तर पर ही संभाल लिया। भारत में लॉकडाउन जैसे कुछ कदम राष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए, लेकिन महामारी की रोकथाम के लिए अधिकांश प्रबंधन राज्य सरकारों ने ही किए। अमेरिका जैसे देश भी हैं, जिन्होंने रोकथाम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम प्रयास किए। महामारी का प्रबंधन करने की जिम्मेदारी वहां राज्यों पर ही छोड़ दी गई। हां, एक कारगर पहल वैक्सीन विकसित करने का प्रयास है, जिसके लिए दुनिया भर में देशों, दवा कंपनियों और विश्वविद्यालयों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कई टीमें एक साथ लगी हैं। ये टीमें वैश्विक स्तर पर इस तरह की समस्या से निपटने की कवायद में बेहतरीन मिसाल हैं। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि महामारियों में कोविड आखिरी नहीं है, इसलिए अगली बार जब हम इस तरह के वैश्विक संकट का सामना करेंगे, तब हमें कैसे अलग ढंग से मुकाबला करना चाहिए? यह मूल्यांकन न सिर्फ अगले संकट को अधिक कुशलता के साथ संभालने में मदद करेगा, बल्कि  मौजूदा समस्याओं के हल की दिशा में भी कारगर साबित होगा। हर समस्या के प्रबंधन में चार व्यापक चरण होते हैं- समस्या को समझना, समाधान विकसित करना, समाधान लागू करना और उसकी निगरानी करना। इसमें कोई संदेह नहीं कि क्रियान्वयन व निगरानी के अंतिम दो चरण स्थानीय स्तर पर सबसे अच्छे तरीके से प्रबंधित होते हैं। प्राय: समस्या को समझने व समाधान विकसित करने के पहले दो चरण को भी स्थानीय स्तर पर पूरा किया जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि नीति निर्माताओं का प्रबल विश्वास है कि स्थानीय संस्कृतियों के बीच अंतर या मतभेद समस्या के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। हालांकि सांस्कृतिक तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में हालिया घटनाक्रमों ने एक अलग  दृष्टिकोण को जन्म दिया है। 
न्यूरोसाइंटिस्ट एंटोनियो दामासियो ने अपनी नवीनतम पुस्तक द स्ट्रेंज ऑर्डर ऑफ थिंग्स : लाइफ, फीलिंग ऐंड द मेकिंग ऑफ कल्चर्स में यह उल्लेख किया है कि एककोशिकीय जीव उन व्यक्तिगत कोशिकाओं को दंडित करते हैं, जो बड़े समूह के साथ सहयोग नहीं करते हैं। इस संदर्भ में देखें, तो वर्तमान मानव व्यवहार के कुछ कोड अरबों वर्ष पहले जीवित प्राणियों में भी अंतर्निहित थे। हमारा तंत्रिका तंत्र, व्यवहार का स्रोत, पिछले 6,000 लाख वर्षों से विकास की प्रक्रिया में है। 
सांस्कृतिक मानव विज्ञानी एडवर्ड टायलर के मुताबिक, संस्कृति वह जटिल समुच्च्य है, जिसमें ज्ञान,  कला, नैतिकता, कानून, रीति-रिवाज व समाज के सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा हासिल की गई क्षमताएं और आदतें शामिल हैं। मानव व्यवहार में किसी समस्या का अध्ययन करते समय पता चलता है कि वह तो मानव तंत्रिका तंत्र की मूल प्रकृति में शामिल है। यह दृष्टिकोण हमें ऐसे समाधान की ओर ले जा सकता है, जो अधिक मौलिक और सार्वभौमिक है।
ऐसी अनेक समस्याएं हैं, जिनके समाधान की समझ मानव मस्तिष्क की बुनियादी बनावट के अध्ययन से निकल सकती हैं। इसलिए संस्कृतियों में अंतर के बावजूद कई समाधान दुनिया में कहीं भी लागू किए जा सकते हैं। कोविड संकट से बाहर आने के लिए एक अच्छी बात यह है कि वायरस की सार्वभौमिकता ने दुनिया को एक ऐसी वैक्सीन तैयार करने की दिशा में प्रेरित किया है, जिसका इस्तेमाल हर जगह हो सकता हो। वैश्विक वैक्सीन विकास टीमों की तरह क्या हम ऐसी वैश्विक टीमों का गठन कर सकते हैं, जो अन्य वैश्विक समस्याओं के समाधान की दिशा में अधिक समग्र दृष्टिकोण से काम कर सकें? वैश्विक समस्याओं के हल में क्या हम मानव मस्तिष्क की समानता पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते, जो सैकड़ों सहस्राब्दियों में विकसित हुए हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazariya column 25 september 2020