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सख्त सजा से ही थमेगी डीपफेक की घातक लहर

सरकार डीपफेक को ‘लोकतंत्र के लिए’ खतरा मान रही है और इससे निपटने के लिए नए नियम-कानून बनाने पर विचार कर रही है। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, नए नियमों में डीपफेक...

सख्त सजा से ही थमेगी डीपफेक की घातक लहर
Amitesh Pandeyपवन दुग्गल, साइबर कानून विशेषज्ञFri, 24 Nov 2023 11:08 PM
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सरकार डीपफेक को ‘लोकतंत्र के लिए’ खतरा मान रही है और इससे निपटने के लिए नए नियम-कानून बनाने पर विचार कर रही है। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, नए नियमों में डीपफेक बनाने वाले और जिस प्लेटफॉर्म पर उसे डाला गया है, दोनों पर जुर्माने का प्रावधान किया जा सकता है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से निर्मित डीपफेक पर नकेल कसना वाकई जरूरी है। देखा जाए, तो तमाम डिजिटल उपभोक्ताओं को इसकी चुनौती से निपटना होगा। यह तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि हर आम-ओ-खास की जिंदगी को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। कुछ साल पहले एक मजाक के रूप में डीपफेक की शुरुआत हुई थी, पर अब इसका दुरुपयोग व्यक्ति-विशेष को निशाना बनाने में किया जाने लगा है। इसको लेकर नए-नए अफसाने सामने आने लगे हैं, जिसके बाद खुद प्रधानमंत्री ने इस पर चिंता जाहिर की है।
डीपफेक के जरिये व्यक्ति-विशेष की तस्वीरों अथवा वीडियो में छेड़छाड़ करके किसी दूसरे की तस्वीर या वीडियो डाल दी जाती है, और यह काम इतनी सफाई से किया जाता है कि आम व्यक्ति के लिए इसे पकड़ पाना लगभग नामुमकिन होता है। यह तकनीक न सिर्फ पीड़ित व्यक्ति के विश्वास को हिला सकती है, बल्कि राष्ट्रों की संप्रभुता, एकता और अखंडता को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाने का नया तरीका है, इसलिए इसे लेकर स्वाभाविक तौर पर चिंता जताई जा रही है। 
इस तकनीक का मुकाबला करने के लिए जरूरी है कि चौतरफा प्रयास किए जाएं। हकीकत यही है कि आज भी भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) या डीपफेक को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है। अभी जिस सूचना प्रौद्योगिकी कानून- 2000 के तहत ऐसे मामले सुने जाते हैं, उनके प्रावधान इससे निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। कुछ प्रावधान भारतीय दंड संहिता में भी हैं, पर एआई के संदर्भ में उसे अदालत में साबित कर पाना काफी कठिन हो जाता है। सुखद है कि दुनिया भर के देशों में इस पर काम हो रहा है। चीन ने तो इसी साल 15 अगस्त को जेनरेटिव एआई पर आधारित दुनिया का पहला कानून लागू किया है। यूरोपीय संघ भी एआई कानून को लेकर एक ड्राफ्ट पारित कर चुका है, जिसे वह जल्द अमल में ला सकता है। यूरोप में एक नया कानून लागू भी हो चुका है। भारत को भी इन तमाम प्रावधानों की मदद से अपने लिए खास कानून बनाना चाहिए, जो एआई को बढ़ाने में मददगार हो, लेकिन इसके दुरुपयोग से पार पाने में पूरी तरह से सक्षम हो। इसमें जाहिर तौर पर कुछ वक्त लगेगा, इसलिए तब तक जितने भी सर्विस प्रोवाइडर हैं, उनके लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 87 के तहत ऐसे नियम लागू किए जा सकते हैं। इसमें जरूरी है कि केंद्र सरकार यह परिभाषित करे कि सेवा देने वाले प्रोवाइडर को क्या-क्या कदम उठाने चाहिए, ताकि उनके सोशल मंचों के जरिये डीपफेक का दुरुपयोग प्रभावी रूप से रुक सके।
आवश्यक यह भी है कि जो लोग इसका शिकार बन रहे हैं, उनके लिए शिकायत का कोई समर्पित तंत्र हो। फिलहाल सूचना प्रौद्योगिकी नियम-2021 के तहत शिकायतें दर्ज करने का प्रावधान है, जो न तो पर्याप्त है, न डीपफेक के संदर्भ में ज्यादा प्रभावी। एक और बात। भारत में जितनी भी सेवा प्रदाता कंपनियां हैं, न सिर्फ उनमें, बल्कि उपभोक्ताओं में भी डीपफेक के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए। यह सच है कि डीपफेक अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है, और जब तक हम इसे समझेंगे नहीं, इसके दुरुपयोग का शिकार बनते रहेंगे। लिहाजा, जरूरी है कि बहुस्तरीय प्रयास किए जाएं, तभी इससे जुड़ी चुनौतियों से निपटने में हम सक्षम हो सकेंगे। डीपफेक तकनीक को रोकना तो अब काफी मुश्किल है, लेकिन हम उन लोगों को बचाने के विशेष प्रयास जरूर कर सकते हैं, जो इसके दुरुपयोग के आसन्न शिकार बन सकते हैं। इसके लिए बहुत जरूरी है कि केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे नियम-कानूनों में डीपफेक का नकारात्मक इस्तेमाल करने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान हो। यह दंड-प्रावधान ही उनमें कानून का खौफ पैदा करेगा, जिससे वे इस अपराध से बचने का प्रयास करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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