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Hindi News ओपिनियन नजरियातपन से राहत देता मानसून हमारी चिंता भी बढ़ा रहा

तपन से राहत देता मानसून हमारी चिंता भी बढ़ा रहा

बेहिसाब गर्मी (हीटवेव) झेलने के बाद अब उत्तर भारत मानसूनी फुहारों से भीगने लगा है। इस साल केरल में मानसून समय पर 30-31 मई को पहुंच गया था, लेकिन पूर्व की तरफ बढ़ते-बढ़ते यह ठहर सा गया था। 20 जून के...

तपन से राहत देता मानसून हमारी चिंता भी बढ़ा रहा
k j ramesh
Pankaj Tomarके जे रमेश, पूर्व महानिदेशक, भारतीय मौसम विभागMon, 24 Jun 2024 11:04 PM
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बेहिसाब गर्मी (हीटवेव) झेलने के बाद अब उत्तर भारत मानसूनी फुहारों से भीगने लगा है। इस साल केरल में मानसून समय पर 30-31 मई को पहुंच गया था, लेकिन पूर्व की तरफ बढ़ते-बढ़ते यह ठहर सा गया था। 20 जून के बाद यह फिर से सक्रिय हुआ है। दरअसल, केरल के तटों से टकराने के बाद मानसून दो रास्तों से ऊपर की ओर बढ़ता है। एक, बंगाल की खाड़ी की तरफ से और दूसरा, अरब सागर की ओर से। इस साल देश के पूर्वी हिस्से में बेशक यह ठहर गया था, लेकिन पश्चिमी हिस्से में, यानी अरब सागर की ओर से इसकी रफ्तार अच्छी थी और 10 जून तक यह महाराष्ट्र पहुंच चुका था। यहां कोई यह समझने की भूल न करे कि मानसून में यह ठहराव अप्रत्याशित था। इसे तो सामान्य मौसमी परिघटना माना जाता है। हां, 20 दिनों तक इसका यूं रुक जाना जरूर असामान्य था। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका मुख्य कारण तो निस्संदेह जलवायु परिवर्तन है, पर इस साल मौसमी परिस्थितियों के कारण भी उत्तर-पश्चिम से पूर्व की तरफ बहने वाली सामान्य हवा बंगाल की खाड़ी से उठने वाली मानसूनी हवा पर भारी साबित हुई।
बहरहाल, दिल्ली व उत्तर भारत के ज्यादातर इलाके अमूमन जून के अंतिम दिनों में भीगते हैं। तब तक यहां गर्मी बनी रहती है। चूंकि बीच-बीच में पश्चिमी विक्षोभ के कारण इन क्षेत्रों में बारिश हो जाती है, इसलिए गर्मी से राहत भी मिलती रहती हैै। मगर इस वर्ष पश्चिमी विक्षोभ के आने की दर तुलनात्मक रूप से कम रही और मानसून 20 दिनों तक ठहर गया, इसलिए हमने एक लंबी और अप्रत्याशित गर्मी झेली। इन दिनों तापमान लगातार 40 डिग्री से ऊपर बना रहा। नतीजतन, पहाड़ी इलाकों में भी गर्मी का रिकॉर्ड टूटा। अब छिटपुट बारिश से तापमान जरूर कम हो गया है, लेकिन वातावरण में नमी अधिक होने के कारण उमस बढ़ गई है। उम्मीद है, 27 जून के बाद जब मानसून पूरी तरह से उत्तर भारत में सक्रिय हो जाएगा, तो उमस भी खत्म हो जाएगी और गर्मी से हमें राहत मिल सकेगी।
इस बार के मानसून को लेकर एक चिंता भी है। अभी जहां-जहां यह पहुंचा है, तेज बारिश हो रही है। सिक्किम, असम सहित पूरा पूर्वोत्तर इलाका बाढ़ की चपेट में आ चुका है। इसी तरह, पश्चिमी तट, तेलंगाना, विदर्भ, मध्य प्रदेश जैसे तमाम इलाकों में सामान्य से कहीं अधिक बरसात हो रही है। उत्तर भारत में भी काफी अच्छी बारिश की संभावना मौसम विभाग ने जताई है। इससे यहां के प्यासे-पथराए खेतों को पर्याप्त पानी मिल सकेगा, लेकिन शहर-प्रबंधन के मोर्चे पर तैयारी का अभाव हमारी मुश्किलें भी बढ़ा सकता है। 
अब तक का अनुभव अमूमन यही है कि पांच-दस सेंटीमीटर बारिश में ही शहर डूबने-उतराने लगते हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि नालों की पर्याप्त साफ-सफाई नहीं होती। फिर, हमने पानी के बहाव के प्राकृतिक रास्ते भी बंद कर दिए हैं। इस कारण, हल्की बारिश भी शहरी लोगों की मुश्किलें बढ़ा देती है। ऐसे में, सिविल सोसाइटी की तरफ से स्थानीय निकायों पर दबाव बनाना जरूरी है, अन्यथा इस तस्वीर को बदलना मुश्किल होगा। वैसे, यह स्थिति छोटे कस्बों की ही नहीं, महानगरों की भी है। मुंबई में साल 2005 में 99 सेंटीमीटर बारिश हुई थी और जल-निकासी की व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाने का संकल्प लिया गया था, लेकिन आज भी बरसात होते ही मुंबई के कई इलाके पानी से डूब जाते हैं। यही कहानी बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे अन्य महानगरों की भी है। हैदराबाद तो अभी तक इस सीजन का चार बड़ा जलभराव झेल चुका है।
मौसम विभाग अपने तईं तत्परता दिखाने में पीछे नहीं हटता। बारिश का पूर्वानुमान वह रंगों के माध्यम से बताता रहता है, जिसमें नारंगी रंग बारिश शुरू होने और लाल रंग मूसलाधार बारिश होने का संकेत होता है। मगर प्रशासनिक तैयारी कमजोर रहने के कारण आम लोग परेशान होते रहते हैं। चक्रवाती तूफान को लेकर हमने जिस तरह से दिशा-निर्देशों पर अमल करना शुरू कर दिया है, ठीक उसी तरह की तत्परता शहरी प्रबंधन को तेज बारिश व बाढ़ से निपटने के लिए करनी होगी। तभी मानसून सही मायने में शहरवासियों को आनंद दे सकेगा, अन्यथा इसे आफत की बारिश ही माना जाएगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)