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आखिर कौए बिना कैसे पूरे हों श्राद्ध के कर्मकांड

रमेश ठाकुर, स्वतंत्र पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Thu, 23 Sep 2021 11:18 PM
आखिर कौए बिना कैसे पूरे हों श्राद्ध के कर्मकांड

अब कौए नहीं दिखाई देते। कर्मकांडी मान्यता अनुसार, पुरखों तक भोजन पहुंचाने वाले वाहक रूपी ‘कौए’ ही नहीं होंगे, तो श्राद्धों की मान्यताएं कैसी पूरी होंगी? शुरू से यही माना गया है कि श्राद्ध में कौए नहीं आएंगे, तो परंपरा पूरी नहीं होगी। माना यही जाता रहा है कि कौए आएंगे, दाना-खाना चुगेंगे और पितरों तक पहुंचाएंगे। लेकिन अब कौए नहीं आते। गांवों में तो अब भी दिखते हैं, लेकिन शहरों, महानगरों में ये विरल हो चले हैं।  

बदलते वक्त के साथ-साथ श्राद्ध का स्वरूप भी बदला है। कौओं की जगह श्राद्ध के भोजन पर गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते, भेड़, बकरी आदि जानवर झपट्टा मारते जरूर देखे जाने लगे हैं। मजबूरन लोगों ने इन्हीं को कौओं का विकल्प मान लिया है। दरअसल, लगातार दूषित होते पर्यावरण में पक्षियों की कई प्रजातियां खत्म हो गई हैं, कौए भी इससे काफी प्रभावित हुए हैं। एक वक्त था, जब घर के आंगन और मुंडेरों पर उनकी कांव-कांव सुनाई पड़ती थी। पुरानी मान्यताओं में मरने के बाद कौए का शरीर औषधि के तौर पर भी प्रयुक्त किया गया। यह छोटे-छोटे जीवों और अनेक प्रकार की गंदगी खाकर जीवन-यापन करता है। मान्यता के मुताबिक, श्राद्ध पक्ष में इस दुर्लभ पक्षी को यथाशक्ति भोजन कराने की बात विष्णु पुराण  में भी बताई गई है। इसी कारण कौए को पितरों का प्रतीक मानकर श्राद्ध पक्ष के हर दिन भोजन कराया जाता है। कौए को लेकर तरह-तरह की अन्य मान्यताएं हैं। कहा जाता है, कौए मेहमानों के आगमन की सूचना देते हैं। एक वक्त वह भी था, जब परिवार की महिलाएं शगुन मानकर कौए को मामा कह देती थीं, तो कभी उसकी बदलती हुई दिशा में कांव-कांव को अपशकुन मानते हुए उड़ जा कहकर बलाएं टालती थीं। अब जब कौए कम हो रहे हैं, तब उनसे जुड़ी ऐसी अनेक लोक-धारणाएं भी लुप्त हो रही हैं। दरअसल, बेजुबान पक्षियों की आबादी घटने में मानवीय हिमाकत प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। मानव आबादियों के पास पक्षियों के रहने और खाने की सभी जगहों को नष्ट कर दिया जा रहा है। पक्षियों का ठिकाना कच्चे घरों की छतें हुआ करती थीं, वे अब नदारद हैं। पेड़ों पर भी इनका निवास होता था, वे भी लगातार काटे जा रहे हैं। आधुनिक सुविधाओं ने इंसानी जीवन को तो सुरक्षित कर दिया है, पर प्रकृति से छेड़छाड़ और धरती के अति-दोहन ने बेजुबान जीवों का जीवन मुश्किल में डाल दिया है। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के संरक्षक वैज्ञानिक केनेथ रोजेनबर्ग ने कहा है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाली विकिरणों ने पक्षियों को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई है। विशेषकर कौए, तोते, गिद्ध, गौरैया जैसे पक्षियों पर कहर टूटा है। समूची दुनिया में पक्षियों की आबादी लगभग एक तिहाई खत्म हो चुकी है।  
सवाल उठता है, कौए को बचाया कैसे जाए? सबसे पहले सामाजिक स्तर पर लोगों को जागरूक करना होगा। खेती-बाड़ी में कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचना होगा। पक्षियों के उन तमाम प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करना होगा, जिनके जरिये उनके प्राकृतिक रहन-सहन को बढ़ावा मिल सके। तमाम ऐसे प्रयास हैं, जिनसे पक्षियों की बची हुई प्रजातियों को बचाया जा सकता है। बचपन में हम देखते थे कि गांव के बाहर या सड़क किनारे मरे जानवरों को गिद्ध और कौए ठिकाने लगाते थे, लेकिन अब इनके न रहने से जानवर सड़ते रहते हैं। दुर्गंध दूर-दूर तक फैलती है, जिससे संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा बना रहता है। ये पक्षी मुफ्त में ही मानव बस्तियों और उनके आसपास सफाई रखते थे। बेशक, कौए की भूमिका को संसार नकार नहीं सकता। पर्यावरण संरक्षण की बात हो या फिर प्रकृति को संतुलित रखने की बात, हर विधा में कौओं ने अपना महत्वपूर्ण किरदार निभाया है। इतना सब होने के बावजूद कौओं के बचाव के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। इनकी संख्या तेज गति से कम हो रही है। सामाजिक संगठनों और धर्म समाज को भी कौओं के संरक्षण के प्रयास करने चाहिए। जिन जगहों पर कौओं की आबादी बची है, उन जगहों पर विशेष रूप से संरक्षण-संवद्र्धन के प्रयास किए जाने चाहिए। फिलहाल, कौए कितने बचे हैं, इसकी गिनती तक किसी के पास नहीं है। क्या हम तब जागेंगे, जब ये पक्षी खत्म हो जाएंगे? 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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