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अखिल भारतीय स्तर पर शुरू है ‘खेला होबे’की तैयारी

विजय विद्रोही, वरिष्ठ टीवी पत्रकारNaman Dixit
Tue, 23 Nov 2021 09:54 PM
अखिल भारतीय स्तर पर शुरू है ‘खेला होबे’की तैयारी

पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान ही ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ देश भर में ‘खेला होबे’ का खत कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को लिख दिया था। तब भी चुनाव जीतने या यूं कहें कि भाजपा को परास्त करने के बाद बंगाल की शेरनी का दिल्ली दौरा हुआ था। सोनिया गांधी से मुलाकात हुई थी। तब ममता ने कहा था कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री का सवाल बेमतलब है, कौन नेतृत्व करेगा, यह भी बेमानी है। मायने कुछ रखता है, तो भाजपा को 2024 में हराना और नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना। तब टीम विपक्ष बनाने की बात हो रही थी, पर अब देखिए हो क्या रहा है? त्रिपुरा में ममता ने खुद को कांग्रेस का विकल्प कहना शुरू कर दिया है। महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और असम के सिल्चर से लोकसभा चुनाव जीत चुकीं तेजतर्रार नेता सुष्मिता देव को अपने साथ मिलाकर और फिर राज्यसभा में भेजकर असम में टीएमसी को खड़ा करना शुरू कर दिया है। गोवा में भी जोर-शोर से चुनाव लड़ने का एलान हो चुका है। बंगाल की मछली-गोवा की मछली, बंगाल की फुटबॉल-गोवा की फुटबॉल की बात हो रही है। यूपी में अखिलेश यादव के साथ मीठे संबंध बना लिए गए हैं। कमलापति त्रिपाठी के पोते और पड़पोते को अपने साथ मिला लिया है। बंगाल में तो भाजपा विधायकों व सांसदों के लिए पार्टी का दरवाजा चौबीसों घंटे खुला ही है।
मुक्तिबोध के अंदाज में सवाल उठाया जा सकता है कि पार्टनर (ममता) आपकी पॉलिटिक्स क्या है? ममता बनर्जी आखिर बंगाल के बाहर तेजी से सियासी पांव क्यों पसार रही हैं? इसकी चार-पांच वजहें दिखती हैं। पहली, ममता को लगता है कि कांग्रेस के बाद पूरे देश में वही एक नेता हैं, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में यदि चमत्कारिक नतीजे आते हैं, तो प्रधानमंत्री पद पर दावा ठोक सकने की गुंजाइश रखती हैं। बंगाल की 42 में से 40 सीटों पर उनकी नजर है। बाबुल सुप्रियो को इसी रणनीति के तहत पार्टी में लाया गया है। ममता को लगता है कि त्रिपुरा, असम, गोवा आदि में कुल मिलाकर तीन-चार सीटें भी निकाल लीं, तो 44-45 के साथ दिल्ली जीती जा सकती है। उनको लगता है कि अगर गैर-भाजपा सरकार के गठन के आसार बने, तो कांग्रेस को नापसंद करने वाले नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी और चंद्रशेखर राव सरीखे नेता दीदी के साथ आ सकते हैं। तब कांग्रेस को मजबूरी में अपना समर्थन देना ही पड़ेगा। 
दूसरी, ममता बनर्जी 2024 तक अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाना चाहती हैं। इसकी शर्त है, लोकसभा में कम से कम चार सीटें और चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कुल पड़े वैध मतों का छठवां हिस्सा हासिल करना। वैसे, राष्ट्रीय पार्टी के लिए दूसरी शर्त लोकसभा की दस सीटें हासिल करना है, पर ये सीटें चार अलग-अलग राज्यों से होनी चाहिए। दीदी इस शर्त को पूरा करने में लगी हैं। 
तीसरी वजह, ममता बनर्जी को लगता है कि केवल उन्हीं राज्यों के मुख्यमंत्री या वहां की क्षेत्रीय पार्टी के नेता प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होंगे, जहां लोकसभा की 40 या उससे ज्यादा सीटें होंगी। दीदी ठीक-ठाक बोल लेती हैं और हिंदीभाषी राज्यों के साथ-साथ दक्षिण भारत में भी जाना-पहचाना नाम हैं। वैसे, पार्टी ने उत्तर भारत में अपनी छवि चमकाने के लिए यशवंत सिन्हा को भी अहम जिम्मेदारी सौंपी है, जो उत्तर भारत की जटिल राजनीति को समझते हैं। 
चौथी वजह, ममता इतनी भागदौड़ इसलिए कर रही हैं, ताकि विपक्ष के अन्य दलों की नजर में वह साबित कर सकें कि विपक्षी एकता की वही धुरी बन सकती हैं। ममता खुद को ऐसे नेता के रूप में विपक्षी दलों से मान्यता दिलवाना चाहती हैं, जो तन-मन-धन और आक्रामक अंदाज में भाजपा से लोहा लेने को तैयार है। गालिब का शेर है, ऐसा आसां नहीं लहू रोना/ दिल में ताकत जिगर में हाल कहां।  कांग्रेस भले ही बीस फीसदी वोट ( करीब बारह करोड़) लोकसभा चुनाव में लाई हो, लेकिन उसकी स्वीकार्यता कम होती जा रही है। विपक्षी दल छिटक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस के हाथ से दो हाथ की दूरी बना रखी है। साल 2014 में कांग्रेस को पूरे देश में 44 सीटें मिली थीं, तो ममता को अकेले बंगाल में 34 सीट, शायद इसीलिए उन्हें लगता है कि ‘खेला होबे’। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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