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जो करे शिष्य का समग्र विकास, वही गुरु

राम मोहन पाठक, कुलपति, नेहरू ग्राम भारती नामित विश्वविद्यालय, प्रयागराजPublished By: Naman Dixit
Fri, 23 Jul 2021 11:15 PM
जो करे शिष्य का समग्र विकास, वही गुरु

भारतीय परंपरा और जीवन शैली में गुरु का महत्व ज्ञान समृद्ध-सशक्त मानव समाज की संरचना में निर्विवाद है। गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के पर्व गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा को हम भूलते जा रहे हैं, पर आज कोरोना संकट काल में एक बार फिर गुरु का महत्व समझने और इसके क्रम में आचरण की जागृति पैदा होना स्वाभाविक है। गुरु समर्पण का दूसरा नाम है और वह समर्पण से ही खोए हुए विश्वास को पुन: बहाल कर सकता है।
हमारी मान्यता है कि गुरु का आदर्श जीवन ही उसका संदेश है, लेकिन क्या आज वह अपने जीवन से आशा का संचार कर पा रहा है? गुरु ज्ञान के संस्कार का केंद्र बिंदु है। विभिन्न धर्मों में गुरु का शीर्ष स्थान है। यद्यपि कहा गया दोषो वाच्य: गुरोरपि  यानी गुरु के भी दोष को बताने या कहने में कोई हर्ज नहीं, परंतु ‘गुरुवाणी’ को जीवन को नियमित, संचालित करने वाले सिद्धान्त के रूप में मान्यता प्राप्त है। गुरु के वचन का अनुसरण सनातन, बौद्ध, ईसाई, जैन और सिख धर्म की मौलिक मान्यता है। इस्लाम में भी धर्मगुरु-उलेमा अपनी तकरीरों से ज्ञान का संचार करते हैं। सिखों के दस गुरुओं द्वारा प्रसारित ज्ञान परंपरा सिख जीवन शैली का मूलाधार है। वर्तमान कोरोना संकटकाल में स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के बाद सर्वाधिक प्रभावित शिक्षा व्यवस्था हुई है। इस काल में गुरुकुलों और आश्रमों की सार्थकता की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक था। ‘वंचितों तक पहुंच’ की अवधारणा के ये आश्रम केंद्र थे। प्रकृति संरक्षण, नि:स्वार्थ शिक्षा, शैक्षिक सशक्तीकरण आदि दृष्टियों से हमारी गुरु परंपरा की आवश्यकता एक बार फिर सिद्ध हुई है। भारतीय परंपरा के ‘गुरु’ को पश्चिमी देशों में भी ‘गॉड इन ह्यूमन फॉर्म’ कहा गया। आज ‘गूगल गुरु’ के सहारे शिक्षा की दुर्दशा को समाप्त करने की कल्पना पूर्ण साकार नहीं हो पा रही है, क्योंकि ज्ञान-विज्ञान की मूल आत्मा-विवेचन, गूढ़ार्थ, निहितार्थ, शब्दार्थ, खंडन-विवेचन, मंडन और मंथन की ‘गूगल गुरु’ से आशा करना व्यर्थ है। वास्तविक गुरु ही ज्ञान की समग्र आवधारणा की आज भी धुरी और केंद्र है। 
गुरुओं के पारंपरिक आश्रमों का स्वरूप अब बदल गया है। गुरु के संबंध में कहा गया है, गुरु ते कोने कहेवाय, जेने जेवाथी शीश झुक जाय।  जिसे देखते ही शीश झुक जाए, वह गुरु है। हमारे यहां सद्गुरु की अवधारणा है, जिसका अर्थ और प्रयोजन यह है कि जिसे ‘सत्’ अर्थात आत्मा या अविनाशी तत्व का बोध हो जाए, वह ‘सद्गुरु’ है। 
इस दृष्टि से स्पष्ट है कि ‘गुरु’ होना आदर्श अवस्था है और तप, अध्ययन तथा ज्ञान साधना की चरम अवस्था से होकर गुजरे व्यक्तित्व को ही ‘गुरु’ का स्थान प्राप्त होता है। मौलिक चिंतन यह है कि आचार्य या गुरु संपूर्ण जीवन के परिवर्तन का कारक है, और शिक्षक या पश्चिमी ज्ञान परंपरा का ‘टीचर’ बाह्य, भौतिक जगत से संबंधित ज्ञान का बीजारोपण और विकास करता है। दूसरा मूलभूत अंतर है, शिक्षक एक वृत्ति है, जीविका है, जबकि गुरु एक संकल्प-पूरित व्रत का प्रतिरूप है, जो अपने शिष्य या अनुयायी के समग्र विकास का आधार है। मानव के इसी समग्र विकास की अवधारणा को संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दी लक्ष्य (मिलेनियम गोल) के रूप में स्वीकार किया गया है, और इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा की धुरी ‘गुरु’ के योगदान को वैश्विक मान्यता प्राप्त हुई है।
हमारी परंपरा में अच्छे गुरुओं ने केवल अक्षर ज्ञान, गणना ज्ञान या परीक्षा पास करने का शिष्य को ज्ञान नहीं दिया, बल्कि ज्ञान की समग्र शक्ति का शिष्य में शक्तिपात कर उन्हें आदर्श मानव बना दिया। यही गुरु की सफलता का मूल भी था। महर्षि दत्तात्रेय ने अपने 24 गुरु माने हैं, इनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, अजगर, कबूतर, सागर, शिशु, हिरण, मछली आदि शामिल हैं। यह अनूठी गुरु परंपरा उन्होंने स्थापित की। विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालंदा की शिक्षा और गुरु परंपरा आज भी आदर्श है। तक्षशिला के 100 दरवाजों में नि:स्वार्थ भाव से गुरुओं की उपस्थिति और समर्पण आज के नौकरी पेशा शिक्षकों के लिए भी आदर्श होनी चाहिए। आज वास्तविक ज्ञानी गुरु ढूंढ़ पाना कठिन हो गया है। आज गुरु के नाम पर ढोंग व पाखंड की भरमार हो गई है। इसीलिए यह कहावत अब भी प्रासंगिक है गुरु करो जान के, पानी पियो छान के। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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