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स्कूली पढ़ाई की बुनियाद मजबूत करने का समय 

रुक्मिणी बनर्जी, सीईओ, प्रथमPublished By: Naman Dixit
Wed, 22 Sep 2021 10:56 PM
स्कूली पढ़ाई की बुनियाद मजबूत करने का समय 

कोविड की लंबी तालाबंदी के बाद अब स्कूल खुलने लगे हैं। कुछ राज्य धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे हैं। पहले उन्होंने ऊंची कक्षाओं के छात्र-छात्राओं को बुलाया। अब छोटी कक्षाओं के बच्चों की बारी है। कुछ राज्यों में सभी कक्षाएं एक साथ खोली जा रही हैं। बहरहाल, स्कूल बंद हुए लगभग 500 दिन बीत चुके हैं। अब स्कूल खोलने के एलान के बाद बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय जाने के लिए प्रेरित करना होगा। शहरी इलाकों में तो अभिभावक झिझक रहे हैं। उन्हें संक्रमण के फिर से फैलने का डर सता रहा है। ग्रामीण माता-पिता बेसब्री से स्कूल खुलने का इंतजार कर रहे हैं। पर यह याद रखना जरूरी है कि नियमित रूप से पाठशाला जाना, पूरे दिन वहां रहना और पढ़ाई करना, यह आदत कुछ हद तक हम सब भूल चुके हैं। ‘असर’ के सर्वेक्षण बताते हैं कि उत्तर  प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में महामारी के पहले भी विद्यालयों में उपस्थिति औसतन 55-60 प्रतिशत रहती थी। आने वाले दिनों में उपस्थिति पर कड़ी नजर रखनी होगी व अनुपस्थित बच्चों के माता-पिता से लगातार संपर्क करना होगा। 

पहला कदम, बच्चे रोज स्कूल जाएं। दूसरा कदम, बच्चों की पढ़ाई फिर से चालू हो जाए। यहां गहराई से सोचना जरूरी है। करीब डेढ़ साल से विद्यालय बंद थे। अब जब स्कूली पढ़ाई फिर से शुरू होगी, तो सीखने-सिखाने की शुरुआत कहां से करनी चाहिए? आगे कैसे बढ़ा जाए? पिछले साल मार्च में जब अचानक स्कूल बंद हुए, बच्चे अपनी कक्षा में कहां थे? तभी से ‘लर्निंग लॉस’ की खूब चर्चा हो रही है। हाल के कई शोध अध्ययनों ने इस समस्या पर रोशनी डाली है। 2018  का ‘असर’ सर्वे देश के लगभग सभी ग्रामीण जिलों में किया गया था। लेकिन उसके बाद 2020 में सिर्फ एक राज्य- कर्नाटक में उसी तरह का सर्वेक्षण हो पाया। 2018 में कक्षा पांच में आधे बच्चे आसान पाठ (दूसरी कक्षा के स्तर का) पढ़ सकते थे, पर 2020 में पांचवीं में सिर्फ एक तिहाई बच्चे सरल कहानी पढ़ पा रहे हैं। इन आंकड़ों से निराशा पैदा हो सकती है, लेकिन इस विश्लेषण के साथ-साथ कई राज्यों के अनुभवों पर भी अवश्य गौर करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर उत्तर  प्रदेश को लें। साल 2018 के सर्वे के अनुसार, राज्य के सरकारी स्कूलों के कक्षा तीन के मात्र 12 प्रतिशत बच्चे सरल कहानी पढ़ पा रहे थे। इसी साल उत्तर प्रदेश शासन ने प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों की बुनियादी शैक्षिक क्षमताओं को मजबूत करने के मकसद से ‘ग्रेडेड लर्निंग प्रोग्राम’ नामक एक अभियान चलाया। राज्य के सभी सरकारी स्कूल इस कार्यक्रम में शामिल हुए। अभियान का बुनियादी तत्व प्रथम संस्था के ‘टीचिंग ऐट द राइट लेवल’ मॉडल पर आधारित था। विश्वविख्यात नोबेल अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी और एस्थर दुफ्लो ने कई बार उत्तर प्रदेश के ही मूल्यांकन के आधार पर सीखने के इस तरीके को प्रभावी और सफल बताया है। इस मॉडल में पहले हर बच्चे की सरल कहानी पढ़ने और बुनियादी गणित कर पाने की क्षमता की मौखिक जांच की जाती है। इसके बाद प्रतिदिन एक घंटा भाषा और एक घंटा गणित के लिए होता है, जिसमें कक्षा के निर्धारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इनकी जगह बच्चों की समझ के मौजूदा स्तर के अनुरूप गतिविधियां की जाती हैं। 2018-19 में ‘ग्रेडेड लर्निंग प्रोग्राम’ दो से तीन महीने चला। इस अवधि में बच्चों के पढ़ने के स्तर में 15 से 20 प्रतिशत प्रगति हुई। अगर स्कूल खुलते ही हम इस तरह से बुनियादी कौशल को मजबूत बनाने के काम में उत्साह से जुट जाएं, तो बच्चों की प्रगति निश्चित है। आज जो बच्चा पांचवीं कक्षा में है, वह पिछले साल मार्च में तीसरी में था। शायद उस समय भी उसे सरल पाठ पढ़ने में दिक्कत रही होगी। आज उसे पांचवीं की पाठ्यपुस्तक पढ़ाने का कोई फायदा नहीं होगा। इस समय कक्षावार पढ़ाई कतई नहीं होनी चाहिए। आज पहली से लेकर आठवीं तक के बच्चों की नींव को पुख्ता करना पूरी शिक्षा-व्यवस्था का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। नई शिक्षा नीति 2020 की प्राथमिकता है कि हर बच्चा बुनियादी शैक्षिक कौशल में दक्ष हो, हमारी जमीनी जरूरत भी यही है। 500 दिनों के बाद जब स्कूल खुल रहे  हैं, तो नए नजरिए से नए लक्ष्य को सामने रखते हुए हमें कदम उठाने चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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