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Hindi News ओपिनियन नजरियाअपनी जिम्मेदारियों से अब मुंह न चुराएं विकसित देश

अपनी जिम्मेदारियों से अब मुंह न चुराएं विकसित देश

आगामी 30 नवंबर से दुबई में शुरू होने जा रही दो सप्ताह लंबी जलवायु-वार्ता ‘कॉप-28’ में एक बार फिर उन तमाम मुद्दों पर गहन मंथन होगा, जो जलवायु खतरों के लिए जिम्मेदार हैं। यह वार्षिक बैठक इसलिए भी...

अपनी जिम्मेदारियों से अब मुंह न चुराएं विकसित देश
Amitesh Pandeyमदन जैड़ा, राजनीतिक संपादक, हिन्दुस्तानWed, 22 Nov 2023 11:04 PM
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आगामी 30 नवंबर से दुबई में शुरू होने जा रही दो सप्ताह लंबी जलवायु-वार्ता ‘कॉप-28’ में एक बार फिर उन तमाम मुद्दों पर गहन मंथन होगा, जो जलवायु खतरों के लिए जिम्मेदार हैं। यह वार्षिक बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण हो उठी है कि समय बीता जा रहा है और इस मोर्चे पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो पा रही है। नतीजा यह है कि जलवायु संकट समूची मानव जाति और दुनिया को खतरे में डाल रहा है। इसलिए, जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की खातिर बड़े नीतिगत फैसले 2025 से पहले लेने जरूरी हैं और 2040 तक उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है, तभी सदी के अंत तक तापमान में बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक सीमित किया जा सकेगा। 
ऐतिहासिक पेरिस समझौते से लेकर अब तक हर साल होने वाली वार्ताओं में जो भी निर्णय लिए गए, वे कमतर आंके गए हैं। ऐसा कई अध्ययन रिपोर्टों से भी साबित हो चुका है। चाहे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की रिपोर्ट हो या इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की। ये रिपोर्टें यही बताती हैं कि जिस रफ्तार से अभी दुनिया में जलवायु खतरों से निपटने के लिए कार्य हो रहा है, वह बिल्कुल नाकाफी है। उससे पेरिस समझौते के लक्ष्य को सदी के आखिर तक हासिल करना नामुमकिन है। ये शोध रिपोर्टें कहती हैं कि मौजूदा हालात में तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक सीमित करना संभव नहीं होगा और यह बढ़ोतरी तीन डिग्री तक जा सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो दुनिया एक विनाशकारी जलवायु संकट का सामना करेगी, इसलिए हर शोध रिपोर्ट में यही सुझाव आ रहे हैं कि हर देश अपने जलवायु लक्ष्यों को नए सिरे से निर्धारित करें तथा उन्हें पहले की तुलना में बढ़ाए। दूसरे, जिन देशों के पास इन खतरों से मुकाबला करने के लिए संसाधनों की कमी है, उन्हें विकसित देश मदद प्रदान करें। तीसरे, ऐतिहासिक रूप से मौजूदा जलवायु खतरों के लिए विकसित देश ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि औद्यौगिकीकरण की शुरुआत उन्होंने ही की, इसलिए उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे इस संकट के समाधान में अग्रणी भूमिका निभाएं। इसलिए यह कहना गलत नहीं कि जलवायु-वार्ता विकसित देशों की अग्नि-परीक्षा है।
विकसित देश जीवाश्म ईंधन का उपयोग बंद करें, यह संभव है, लेकिन विकासशील व गरीब देशों को इसके लिए और समय देना होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि इस मुद्दे पर दुनिया के सभी देशों के लिए एक पैमाना लागू नहीं किया जा सकता। इसे विकसित देशों को समझना होगा। भारत का रुख इस पर स्पष्ट है और वह पूर्व में भी ऐसे प्रयासों का विरोध करता रहा है और आगे भी करेगा। 
इस जलवायु-वार्ता में हरित कोष और क्षति से जुड़े कोष को लेकर भी स्थिति साफ होनी है। दरअसल, हरित कोष की परिकल्पना 2009 में की गई थी, तब इसमें 100 अरब डॉलर की राशि सालाना जमा करने की बात हुई थी। विकसित देशों को यह राशि प्रदान करनी थी, ताकि गरीब व विकासशील देशों को जलवायु खतरों को कम करने के उपायों के लिए इससे मदद दी जा सके। राशि जमा नहीं हो पाई। नतीजा यह हुआ कि जरूरतमंद देशों को मदद नहीं मिली। विकसित देश चाहते हैं कि धनराशि देना बाध्यकारी नहीं, बल्कि स्वैच्छिक हो। दूसरा, विकसित देश यह भी चाहते हैं कि विश्व बैंक इस कोष का संचालन करे, जबकि जलवायु विशेषज्ञ इसके लिए अलग तंत्र की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि विकसित देशों के लिए इस कोष में राशि देने को भी बाध्यकारी बनाया जाए। यूएई सम्मेलन में यह एजेंडा अहम हो सकता है।  
इसी प्रकार, हरित कोष की राशि बढ़ाने पर भी इस जलवायु-वार्ता में चर्चा की संभावना है। सितंबर में जब भारत की अध्यक्षता में जी-20 देशों की बैठक हुई थी, तब इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी और यह अनुमान व्यक्त किया गया है कि जलवायु खतरों से निपटने के लिए एक बड़े कोष की जरूरत है, जिसे करीब 5.8 खरब डॉलर का होना चाहिए। यह जलवायु-वार्ता विकसित देशों के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने का मौका है। वहीं विकासशील और गरीब देश अपने नए जलवायु लक्ष्यों के निर्धारण के साथ इस संकट से निपटने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं। 

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