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मोदी-बाइडन वार्ता और क्वाड पर रहेगी सबकी निगाह

फ्रैंक एफ इस्लाम, अमेरिकावासी उद्यमी व समाजसेवीPublished By: Naman Dixit
Tue, 21 Sep 2021 11:29 PM
मोदी-बाइडन वार्ता और क्वाड पर रहेगी सबकी निगाह

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाशिंगटन पहुंच रहे हैं, जहां वह क्वाड सम्मेलन में शामिल होंगे। क्वाड भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का अनौपचारिक संगठन है, जो एक महाशक्ति के रूप में चीन के निरंतर उभार की प्रतिक्रिया में बन रहा है। मोदी की सप्ताह भर की इस यात्रा में हालांकि कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कार्यक्रम होंगे, मगर जिन पर सबसे ज्यादा नजर होगी, उनमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ उनकी संभावित पहली द्विपक्षीय मुलाकात और संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में उनका शिरकत करना खास है। वैसे, शुरुआत में सभी का ध्यान चारों देशों के संयुक्त शिखर सम्मेलन पर होगा, जो कोविड के बाद के माहौल और ट्रंप के बाद की विश्व व्यवस्था का संकेत देगा।

क्वाड की पहली बैठक वर्चुअल तरीके से मार्च में आयोजित की गई थी। यह संगठन जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, उससे शुरुआती उत्साह के बाद भारतीय समुदाय निराश है। इसके कुछ स्वाभाविक कारण हैं। दरअसल, हाल के वर्षों में चीन के अतिक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में भारत भी शामिल रहा है। पूर्वोत्तर में डोका ला में 2017 के सीमा विवाद के बाद से चीन कई बार उस विवादित सीमा से भारतीय क्षेत्र में दाखिल हुआ है। मई, 2020 में तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के सैनिक आपस में हिंसक झड़प भी कर बैठे थे। मगर पिछले तीन दशकों के भारत-अमेरिका रिश्तों में चीन पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हो सकी है। इसलिए, यह समझ में आता है कि भारत में कई लोग क्वाड की  शक्तिशाली भूमिका की कल्पना करते हैं, क्योंकि इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के दो अन्य लोकतंत्र भी शामिल हैं, जिनके चीन से अच्छे संबंध नहीं हैं। बाइडन प्रशासन ने क्वाड की सैन्य टुकड़ी को लेकर कोई उत्सुकता अब तक नहीं दिखाई है। संभव है, अफगानिस्तान में दो दशक लंबे युद्ध की समाप्ति के बाद ह्वाइट हाउस विदेशों में अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं से दूरी बरतने की सोच रहा हो। पर जहां तक भारत का मामला है, उलझन यह भी है कि अमेरिका ने क्वाड सदस्य ऑस्ट्रेलिया के साथ एक अन्य गठबंधन ‘ऑकस’ का एलान पिछले हफ्ते किया है। इस संगठन का तीसरा सदस्य देश ब्रिटेन है। भारत इस सुरक्षा समझौते को ज्यादा तवज्जो देता नहीं दिख रहा, क्योंकि उसे डर है कि यह सुरक्षा के नजरिए से क्वाड के संभावित महत्व को काफी कम कर सकता है। हालांकि, ह्वाइट हाउस ने नई उभरती विश्व व्यवस्था में क्वाड की भूमिका को सराहा है। इसके प्रेस सचिव कहते हैं, क्वाड नेताओं की मेजबानी संकेत है कि बाइडन-हैरिस प्रशासन इंडो-पैसिफिक को प्राथमिकता दे रहा है। जो भी हो, 24 सितंबर की बैठक से क्वाड की प्रकृति स्पष्ट तरीके से उभर सकती है।
रही बात बाइडन के साथ मोदी की द्विपक्षीय बातचीत की, तो पिछले सात वर्षों में मोदी की विदेश नीति की यह पहचान ही रही है कि वह कूटनीतिक संबंधों को आपसी दोस्ती तक ले जाते हैं। मगर ट्रंप के विपरीत, बाइडन मुद्दों और नीतियों के प्रति विशेष आग्रही रहे हैं। नतीजतन, ऐसी शायद ही कोई संभावना है कि वह पूर्व राष्ट्रपति की तरह प्रधानमंत्री मोदी के साथ किसी रैली को संबोधित करेंगे। मगर मोदी बाइडन के अलावा अन्य शख्सियतों के साथ भी वार्ता और बैठकें करेंगे। खबरों के मुताबिक, वह उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस से भी मिलेंगे, जिनके साथ अन्य मसलों के साथ-साथ अफगानिस्तान, आर्थिक व रक्षा सहयोग और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। अपनी पिछली यात्राओं की तरह नरेंद्र मोदी अमेरिकी व्यापार जगत की शीर्ष हस्तियों के साथ-साथ भारतवंशी अमेरिकी समुदाय के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे। हालांकि, उनकी पिछली कुछ यात्राओं जैसी ठाट-बाट और आडंबर कोविड व बाइडन प्रशासन की अंतर्मुखी शैली के कारण इस बार शायद ही देखने को मिले। फिलहाल हम सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं कि क्वाड सम्मेलन और मोदी की अन्य बैठकों का क्या नतीजा निकलेगा। हालांकि, ऐसे अनुमान बेमानी होते हैं। मायने तो यह रखता है कि विभिन्न राष्ट्रों और शासनाध्यक्षों के बीच विकसित होते ये गठबंधन और रिश्ते हकीकत की जमीन पर क्या-कुछ रचते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के बारे में भी यही कहा जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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