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मुश्किल हालात में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का इरादा

मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Wed, 21 Jul 2021 10:35 PM
मुश्किल हालात में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का इरादा

टोक्यो ओलंपिक 2020 का कल शुभारंभ होने जा रहा है। कोरोना की वजह से बेहद मुश्किल स्थिति में हो रहे इस आयोजन में भारत का इरादा अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का है। पांच साल पहले रियो में हुए पिछले ओलंपिक खेलों में मात्र दो पदक जीत पाने की टीस भारतीय खेलप्रेमियों के दिल में आज भी ताजा है। भारत के खिलाड़ियों को यदि तकदीर का जरा साथ मिला, तो पदकों की संख्या में खासा इजाफा हो सकता है। सच तो यह है कि पहले दो दिन के खेलों से ही पता चलने लगेगा कि भारतीय प्रदर्शन का इस बार क्या ट्रेंड रहने वाला है। इस बार भारत के लिए पदक जीतने के दावेदारों की सूची में निशानेबाज सौरभ चौधरी, इलावेनिल और महिला वेटलिफ्टर मीराबाई चानू के नाम शामिल हैं। इन तीनों की एक-एक स्पद्र्धाओं का 24 जुलाई को फैसला होना है। यह तिकड़ी पदक लाकर पिछले खेलों की टीस को मिटा सकती है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ओलंपिक खेलों में हम अच्छे प्रदर्शन के लिए कभी सराहे नहीं गए हैं। यही वजह है कि ओलंपिक खेलों के इतिहास में हमारे देश के नाम सिर्फ 28 पदक दर्ज हैं, जिसमें नौ स्वर्ण पदक शामिल हैं। हम यदि अमेरिकी तैराक माइक फेल्प्स के 23 स्वर्ण पदकों को छोड़ भी दें, तो एक अन्य अमेरिकी तैराक माइक स्पिट्ज सहित तीन ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अकेले ही भारत के बराबर नौ स्वर्ण पदक जीते हैं। भारत के इन नौ स्वर्ण पदकों में से आठ तो पुरुष हॉकी टीम के खाते में हैं। इससे हम भारत के दयनीय प्रदर्शन को आसानी से समझ सकते हैं। हॉकी के स्तर में गिरावट आने के बाद तो हमें कई बार खाली हाथ लौटने की शर्म भी झेलनी पड़ी है। साल 1996 के अटलांटा ओलंपिक खेलों में लिएंडर पेस के टेनिस में कांस्य पदक जीतने के बाद से भारत कभी खाली हाथ नहीं लौटा है, फिर भी हम करीब 135 करोड़ की आबादी के हिसाब से कभी प्रदर्शन नहीं कर सके हैं।
हम भारतीयों ने पिछले कुछ ओलंपिक खेलों में उम्मीदों को पंख लगते जरूर देखे हैं। इस दौरान 2008 के बीजिंग ओलंपिक में निशानेबाज अभिनव बिंद्रा पहला व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने, तो 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत ने पहली बार छह पदकों पर कब्जा जमाया और पहलवान सुशील कुमार दो ओलंपिक पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। यह सही है कि 2016 के रियो ओलंपिक में भारत सिर्फ दो पदक ही जीत सका। पीवी सिंधु ओलंपिक रजत पदक जीतने वाली पहली शटलर बनीं। भारत के लिए कुछ न कुछ सकारात्मक पक्ष रहा है। 
भारतीय खेलों में यह बदलाव नई पीढ़ी यानी युवाओं के मोर्चा संभाल लेने से आया है। हम निशानेबाजी को ही लें, तो इस बार ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले ज्यादातर निशानेबाज युवा हैं और यह उनका पहला ओलंपिक है। इस पीढ़ी की सोच ने भी हालात बदले हैं। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि ओलंपिक में भाग लेने पर दबाव हावी होने के बारे में जब सौरभ चौधरी से पूछा गया, तो उनका कहना था कि भाग लेते समय किसी भी तरह के दबाव को वह नहीं जानते। यह सोच ही भारतीय खिलाड़ियों को अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करती है। पहलवान बजरंग पुनिया हों, विनेश फोगाट हों, अमित पंघाल हों या जेवेलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा, सभी को यह सोच पदक जीतने का दावेदार बनाती है। इसमें एमसी मैरिकॉम जैसी मुक्केबाज का अनुभव चार चांद लगा सकता है। भारतीय पदक दावेदारों की बात करने पर सबसे पहला नाम शटलर पीवी सिंधु का ही आता है। उन्होंने रियो में जिस धमाकेदार प्रदर्शन से रजत पदक जीता था, उससे इस बार उनसे स्वर्ण पदक की उम्मीद करना लाजिमी है। अच्छी बात यह है कि पुरुष हॉकी टीम को भी इस बार पदक का दावेदार माना जा रहा है। भारतीय टीम पोडियम पर चढ़ती है, तो ऐसा 41 सालों के बाद होगा। ओलंपिक में भाग लेने वाली सभी टीमों और खिलाड़ियों को अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर फोकस करने के अलावा कोरोना से बचाव पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि यह सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है। कोरोना की वजह से बने कुछ नियमों से कुछ टीमों और खिलाड़ियों को नुकसान होगा, तो कुछ को फायदा भी मिलेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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