DA Image
Monday, November 29, 2021
हमें फॉलो करें :

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

हिंदी न्यूज़ ओपिनियन नजरियाक्योंकि हिमालय को बहुत हल्के में लेने लगे हैं हम

क्योंकि हिमालय को बहुत हल्के में लेने लगे हैं हम

अनिल जोशी, पर्यावरणविद्Naman Dixit
Wed, 20 Oct 2021 11:58 PM
क्योंकि हिमालय को बहुत हल्के में लेने लगे हैं हम

उत्तराखंड में बेमौसम बारिश का कहर बहुत दुखद है। छोटी-मोटी सभी नदियां उफान पर हैं। बारिश ने नया इतिहास रच दिया है, करीब चालीस लोगों की मौत हुई है और कई लोग अभी तक लापता हैं। तंत्र बचाव कार्य में जुट गया है। हम केदारनाथ त्रासदी को भूले नहीं हैं, जब 600 मिली मीटर की बारिश ने तबाही का मंजर खड़ा कर दिया था, वैसा ही फिर हुआ है। मानसून तो वैसे ही इस पूरे क्षेत्र में चिंता का विषय बनता जा रहा है, लेकिन इस बार यह बड़ी बात है कि मौसम विभाग ने घोषणा कर दी थी, मानसून अलविदा कह गया है, लेकिन अप्रत्याशित वर्षा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हमें याद रखना चाहिए कि केदारनाथ की त्रासदी भी ऐसे समय हुई थी, जब मानसून का आगमन नहीं हुआ था और उसके संकेत तक नहीं थे। 

अल्मोड़ा, कुमाऊं इत्यादि क्षेत्रों में ऐसी तबाही मची है कि जान-माल के कुल नुकसान का पता आने वाले दिनों में ही चलेगा। इस बड़ी आपदा ने पूरे तंत्र को जहां हिला दिया है, वहीं पहाड़ों में बसे लोगों को बहुत डरा दिया है। हमें अब कम से कम एक बार नए सिरे से कुछ बिन्दुओं पर चर्चा करनी ही पड़ेगी। उत्तराखंड जैसे राज्य, जो हिमालय पर बसे हैं और इन हिमालयी राज्यों की संवेदनशीलता की चर्चा वैसे ही दुनिया भर में रही है। पहाड़ों में जिस ढंग से विकास हो रहा है, उससे साफ लगता है कि हमने यहां पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीरता से नहीं लिया है। इस चिंता को ज्यादा तवज्जो हासिल नहीं हुई है कि पहाड़ी इलाकों में सड़क या ढांचागत विकास कैसे होना चाहिए। हमें इस ओर गंभीरता से देखना चाहिए। हम क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट को अनदेखा नहीं कर सकते, जिसमें साफ-साफ शब्दों में यह भी कहा गया है कि आने वाला समय बहुत घातक होने वाला है। दुनिया में बदलते जलवायु और ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया को अलग दिशा मिलेगी। ऐसा पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। प्राकृतिक आपदाओं का एक सिलसिला सा दुनिया में चल रहा है। भारत की ही बात करें, तो सामान्य तौर पर ही खूब बारिश के गवाह रहे केरल जैसे राज्यों को भी जल आपदा का सामना करना पड़ रहा है। हिमालय से केरल तक प्रकृति हमारी चिंता को बढ़ा रही है। 
हिमालय क्षेत्र तो विशेष रूप से जलवायु संबंधी बदलावों को झेलता आ रहा है। अगर हमने इन बढ़ती समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया, तो तबाही के ऐसे मंजर खूब सामने आएंगे। यह भी हमारी समझ में आना चाहिए कि हिमालय में बसे राज्य दूसरे राज्यों को भी संसाधन व अन्य प्रकार की आपूर्ति करते हैं। हिमालय देश के हवा, मिट्टी, पानी की भी चिंता करता है। इस विषय को अनेक आंदोलनों व अभियानों ने सामने रखा है, लेकिन वाजिब परिणाम सामने नहीं आए हैं। हिमालय के प्रति एक नीति होनी चाहिए और यह नीति ऐसी हो कि जो लोगों को जोड़कर बनाई जाए। लोगों की आवश्यकताओं के साथ ही हिमालय की प्राकृतिक स्थिति का भी ध्यान रखा जाए।  
समस्या यह है कि हमारी तमाम तरह की नीतियों में स्थानीय भागीदारी शून्य ही दिखाई देती है। अगर हम पिछले सौ साल के आंकड़े उठा लें, तो हमने ऐसी त्रासदियां ज्यादा झेली हैं। जहां एक ओर, बेरोजगारी की समस्या पहाड़ों में बढ़ी है, वहीं इस तरह की त्रासदियों ने हिमालय को बड़े घाव दिए हैं। अब हमें इस रूप में सोचना होगा कि हम कैसे और क्या निर्णय लें, केदारनाथ या आज जैसी त्रासदी आने पर मुकाबला कैसे करें। यह विवेचना का समय है। जहां तक आपदा प्रबंधन की बात है, यह विभाग निर्बल है। आपदा प्रबंधन हमारी किसी भी सरकार के लिए गंभीर विषय नहीं है। उसको पूरे संसाधनों से लैस भी नहीं किया गया है। वर्तमान परिस्थितियों में इस विभाग का सक्षम होना सबसे जरूरी है। पहाड़ों या अपने आस-पास ऐसे तंत्र व व्यवस्था को जन्म देना जरूरी है कि ऐसी आपदाओं के समय हम संभल पाएं। स्थानीय स्तर पर देखने के साथ-साथ विश्व स्तर पर भी देखना होगा कि हम तत्काल क्या उपाय शुरू कर सकते हैं। इस आपदा ने लोगों को भी चेता दिया है। लोगों की ओर से भी ऐसी तैयारी होनी चाहिए कि वे अपने जान-माल की रक्षा कर सकें। लगातार आ रही आपदाओं ने बता दिया है कि हिमालय को आप हल्के में नहीं ले सकते। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

 

सब्सक्राइब करें हिन्दुस्तान का डेली न्यूज़लेटर

संबंधित खबरें