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Hindi News ओपिनियन नजरियादस मुकाबले जीते और एक हार गए, तो क्या हो गया

दस मुकाबले जीते और एक हार गए, तो क्या हो गया

एकदिवसीय विश्व कप क्रिकेट में हम लगातार दस मुकाबले जीतने के बाद ग्यारहवां मुकाबला हार गए, तो खामियों की चर्चा शुरू हो गई। हमारी टीम की तैयारी में किसी तरह की कमी नहीं थी, तभी तो विश्व कप फाइनल तक...

दस मुकाबले जीते और एक हार गए, तो क्या हो गया
Amitesh Pandeyकीर्ति आजाद, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरMon, 20 Nov 2023 10:48 PM
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एकदिवसीय विश्व कप क्रिकेट में हम लगातार दस मुकाबले जीतने के बाद ग्यारहवां मुकाबला हार गए, तो खामियों की चर्चा शुरू हो गई। हमारी टीम की तैयारी में किसी तरह की कमी नहीं थी, तभी तो विश्व कप फाइनल तक टीम इतना अच्छा खेलती हुई पहुंची। जिस पिच पर फाइनल हुआ, वह उतनी आसान भी नहीं थी। जहां गेंद पड़कर धीमी आती हो, वहां जब कोई बल्लेबाज जम जाए, तो उसको लंबी पारी खेलनी चाहिए। हमारी बल्लेबाजी गैर-जिम्मेदाराना थी। कप्तान रोहित शर्मा जम गए थे, तो उन्हें लंबी पारी खेलनी चाहिए थी। अगर वह टिके रहते, तो इतिहास कुछ और दर्ज होता। 
अफसोस, दूसरे बल्लेबाजों ने भी गैर-जिम्मेदाराना शॉट खेले और हमने जरूरत से कुछ कम रन बनाए। वैसे 240 भी कोई आसान स्कोर नहीं था, पर गेंदबाजी में जो लंबाई या दिशा होनी चाहिए थी, वह नहीं दिखी। मोहम्मद शमी को सीधे नई गेंद थमा दी गई, जबकि वह दो गेंदबाजों के बाद गेंदबाजी के लिए आते हैं। हमारे स्पिनर्स अगर बल्लेबाजों को आगे लाकर खिलाते, तो कारगर हो सकता था, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के लिए अच्छा दिन था। हमारी तमाम कमियां उसके पक्ष में गईं। ध्यान रहे, क्रिकेट घोर अनिश्चितताओं का खेल है। इसमें किसी को नहीं मालूम की अगली गेंद पर क्या होना है। एक गेंद भी किसी को हरा या जिता सकती है। जाहिर है, क्रिकेट में तुलना होती है और हो रही है। 1983 में विश्व कप जीतने वाली भारतीय क्रिकेट टीम के साथ अलग हालात थे, हमारे समय में बाउंसर पर कोई पाबंदी नहीं थी, अब आप एक ही बाउंसर मार सकते हैं। तब हेलमेट भी नहीं थे। अगर मैं सोचूं, तो लगता है कि 1983 की हमारी टीम 2023 की हमारी टीम को हरा देती। तब हमारे साथ एक ही मैनेजर हुआ करते थे, अब तो 15-20 का सहयोगी दल साथ होता है। पहले हम लोग अपने दिमाग को ही कंप्यूटर बनाकर सोचते थे कि सामने वाली टीम में किसके साथ कैसे खेलना है और किसको कैसे आउट करना है। 
हां, वर्तमान टीम के पास अनुभव बहुत ज्यादा है। अब खूब एकदिवसीय होते हैं, टी-20 भी होता है। हमारे समय में साल में चार या पांच एकदिवसीय मैच होते थे। क्रिकेट में बहुत अंतर आया है। यह सच है कि हम अनुभव, संसाधन में बहुत कमतर थे, पर इसके बावजूद हम 1983 में अच्छा खेलकर विश्व कप जीते थे। यह भी सवाल उठता है कि टीम इंडिया ऐन मौके पर नाकाम हो जाती है, हालांकि, यह सही नहीं है। हम विगत दो दशक से बहुत अच्छा खेलते आ रहे हैं। विश्व कप जीत चुके हैं, टी-20 जीत चुके हैं। दुनिया की शीर्ष टीम रहे हैं। केवल एक मैच में नाकाम हो जाने से पुराने कारनामे कतई नहीं धुल जाते। इस टीम के पास विश्व के बेहतरीन बल्लेबाज, गेंदबाज हैं। सिर्फ दो कमियां रह गईं। पहली, गैर-जिम्मेदाराना बल्लेबाजी व दूसरी, मौके पर गेंदबाजों का भोथरा जाना। टीम व जीत के प्रति जिम्मेदारी का एहसास बढ़ना चाहिए। बेशक, टीम में कोई बड़ी कमी नहीं है, सिर्फ जिम्मेदारी लेने की बात है। 
इस बार उम्मीद तो सबको थी कि भारत जीतेगा, लेकिन कोई टीम हर मुकाबला ही जीत जाए, यह मुमकिन नहीं। हम कैसे भुला दें कि यही टीम कैसे दस मैच जीतती हुई फाइनल में पहुंची? ऑस्ट्रेलिया के अच्छे खेल को भी देखना चाहिए। उन्होंने हमसे अच्छा अनुमान लगाया, हमसे अच्छा होमवर्क किया। ऑस्ट्रेलिया टीम छह विश्व कप जीत चुकी है। इनका मौके पर जीतने के प्रति जो जुनून है, वह सीखने लायक है। यह जुनून के साथ अपनी योजनाएं बनाती है, तभी तो दो शुरुआती मैच हारने के बाद उसने इतनी शानदार वापसी की। 
वैसे, फाइनल में हारने के बाद ज्यादा उदास होने की जरूरत नहीं है। समस्या यह है कि हमारे यहां जीतने की भावना खूब है और खेल की भावना कम है, जबकि खेल के दो पहलू तय हैं, हार और जीत। आप क्रिकेट देख रहे हैं, आप अपने देश को जिताना चाहते हैं, पर अगर दूसरी टीम जीत जाती है, तो उसकी भी प्रशंसा करनी चाहिए। हर समय सिर्फ जीत की भावना ठीक नहीं है, खेल की भावना मजबूत रहनी चाहिए। ध्यान रहे कि दूसरी टीम भी जीतने के लिए आई है। दूसरी टीम जीत गई, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी टीम को खारिज कर दें। हमारी टीम अच्छा खेल रही है। मुकाबले आगे भी होंगे, हम पहले भी जीते हैं और आगे भी जीतेंगे। 
(लेखक 1983 की विश्व कप विजेता टीम के सदस्य हैं)