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अपनी मातृभाषा के लिए हमारे मन में कितना बचा ममत्व 

कभी सोचिएगा, आप अपनी मूल मातृभाषा के शब्दों को कितना जानते हैं और आपने अपनी मूल भाषा के लिए अभी तक किया क्या है? मातृभाषा भी अन्य भाषाओं की तरह एक संस्कार है, जिसे हम अपनी मां से, अपने आसपास के...

अपनी मातृभाषा के लिए हमारे मन में कितना बचा ममत्व 
Monika Minalनीरजा माधव, साहित्यकारTue, 20 Feb 2024 11:19 PM
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कभी सोचिएगा, आप अपनी मूल मातृभाषा के शब्दों को कितना जानते हैं और आपने अपनी मूल भाषा के लिए अभी तक किया क्या है? मातृभाषा भी अन्य भाषाओं की तरह एक संस्कार है, जिसे हम अपनी मां से, अपने आसपास के परिवेश और लोक से सीखते हैं। किसी भाषा का महत्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उस भाषा में कितना प्रचुर साहित्य लिखा गया या उसे बोलने वालों की कितनी अधिक संख्या है, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि उस भाषा या बोली को बोलने वालों की निष्ठा उसमें कितनी है? अपनी मातृभाषा के संबंध में भी यही बात लागू होती है।
पुरानी कहावत है, ‘कोस-कोस पर पानी बदले, पांच कोस पर बानी’ यानी हमारे यहां जो लोक भाषाएं हैं, लोक बोलियां हैं, उनका स्वरूप कुछ-कुछ दूरी पर बदल जाता है, परंतु इस भिन्नता के भीतर भी एक सांस्कृतिक शक्ति नदी की तरह प्रवाहमान रहती है, जो लोगों को परस्पर जोड़े रखती है। अपने यहां मातृभाषाओं में हिंदी अग्रणी है। यह सेतु भाषा है, जिसे भोजपुरी, अवधी, बघेली, बुंदेली, कौरवी, कुमाऊंनी, गढ़वाली, हरियाणवी, ब्रज, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी, मगही, राजस्थानी, पहाड़ी, नगपुरिया आदि बोलियों-भाषाओं की उर्वरता प्राप्त है। इन लोक भाषाओं की शब्द-संपदा हिंदी की निधि है। ऐसे में, यह दुर्भाग्य है कि हममें से कई लोग मातृभाषाओं के प्रति उदासीन हैं। 
हमारी लोक भाषाओं में अकूत शब्द-संपदा है, जिससे लोगों का ध्यान हट रहा है। रिश्तों के लिए भी अलग-अलग संबोधन हैं। हमारे यहां मातृभाषा में दादी के लिए आजी, अइया, तो मां के लिए माई, मइया, अम्मा शब्द प्रचलित हैं। बाबा, बब्बा, आजा, दादा अब ‘ग्रैंडपा’ में सिमटने लगे हैं। बुआ, चाची, मौसी, मामी जैसे तमाम शब्दों का लोप अंग्रेजी के शब्द ‘आंटी’ में होने लगा है। हम न जाने कितने शब्द भूल गए हैं। मिट्टी के बर्तनों को उनके आकार-प्रकार के आधार पर हमारी मातृभाषा में कई नाम दिए गए थे, जैसे- पुरवा, परई, कसोरा, दीया, सुराही, झंझर, घड़ा, कमोरी, हड़िया, कलश आदि, पर इन तमाम शब्दों को एक शब्द ‘क्ले-पॉट’ खत्म करने में लगा है। होली, धुरंडी,चहका, कबीरा, चैती, जंतसार, नकटा, लचारी आदि की ध्वनियां अब हमारे कानों में किसी लुप्त होती सभ्यता के अवशेष की तरह सुनाई पड़ती हैं।  
किसी दूसरी भाषा का ज्ञान होना बुरी बात नहीं, पर अपनी भाषा की कीमत पर दूसरी भाषा को जानना उचित नहीं है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि भारत में सात प्रतिशत लोग तीन भाषाएं जानते हैं, जबकि 26 प्रतिशत द्विभाषी हैं। फिर भी मोटे तौर पर देश में 70 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो अपनी अकेली मातृभाषा पर निर्भर हैं। भारत में अभी 424 भाषाएं जीवित हैं, जिनमें से महज 13 भाषाओं का ज्यादा प्रयोग होता है। इन 13 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या देश में लगभग 95 प्रतिशत है। चूंकि भारत में भाषाओं के प्रति आदर का भाव है, इसलिए कुछ ऐसी मातृभाषाओं को भी मान्यता मिली है, जिनको बोलने वाले एक प्रतिशत भी नहीं हैं। वैसे यह गौर करने की बात है कि चार प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों की मातृभाषा भोजपुरी है, दो प्रतिशत से ज्यादा लोगों की भाषा राजस्थानी है, किंतु इन्हें अभी मान्यता नहीं मिली है। 
देश में 60 भाषाएं ऐसी हैं, जिनका प्रयोग दस लाख से ज्यादा लोग करते हैं। इनके उत्थान पर लोगों को ध्यान देना चाहिए, भाषा के मामले में केवल सरकार या किसी राजनीति के भरोसे रहना उचित नहीं है। हमें अपनी मातृभाषा को हर हाल में सुरक्षित रखने का संकल्प लेना होगा, क्योंकि यह भारतीय संस्कृति के सुरक्षित रहने का प्रश्न है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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