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20 अक्तूबर, 2020|10:59|IST

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राजनीति की संपूर्ण पाठशाला है चंपारण सत्याग्रह

चंपारण सत्याग्रह को 100 वर्ष से अधिक समय हो गया है, लेकिन किसान चेतना, अहिंसा, सत्याग्रह, शासक के भय से मुक्ति, शिक्षा, सफाई जैसे महत्वपूर्ण विषय राजनीति की परिभाषा के आवश्यक अंग बन गए हैं। गांधी राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक सरोकार एक साथ साधते थे। दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद परतंत्र भारत में चंपारण उनका पहला सफल प्रयोग था और किसानों के शोषण के विरुद्ध मुक्ति का सिंहनाद भी। वर्ष 1916  में लखनऊ में कांग्रेस का राष्ट्रीय सम्मेलन होता है और यहीं से मोहनदास के गांधी बनने की प्रक्रिया भी प्रारंभ होती है। गांधी ने स्वयं माना है कि वहां जाने से पहले मैं चंपारण का नाम तक नहीं जानता था। नील की खेती होती है, इसका ख्याल भी न के बराबर था। एक किसान राजकुमार शुक्ल अधिवेशन में उनके संपर्क में आते हैं और उनसे चंपारण चलने का आग्रह करते हैं। तब ब्रिटिश शासन ने परंपरागत भारतीय खेती को खत्म करने के लिए अभियान चला रखा था। यूरोपीय बाजारों के अनुरूप वे नील, तंबाकू, चाय, रबड़ और कपास उगाने के लिए किसानों को मजबूर कर रहे थे। वर्ष 1916 में 21,900 एकड़ जमीन पर आसामीवार, जिरात और तीनकठिया प्रथा लागू थी। चंपारण के खेतों से मडवन, फगुआही, दशहरी, सिगराहट, लरियावन, दस्तूरी समेत 46  प्रकार के टैक्स वसूले जाते थे। वसूली का तरीका भी बर्बर था। 
शोषण की प्रत्यक्ष जानकारी हासिल करने के लिए गांधी ने चंपारण जाने का निर्णय लिया। शहर में रुकने की बजाय उन्होंने जसवल पट्टी गांव जाने का फैसला किया, जहां एक किसान को बुरी तरह पीटा गया था और उसकी सारी संपत्ति जलाकर राख कर दी गई थी। गांधी ने नील के मालिक और कमिश्नर से संवाद स्थापित किया। नील मालिकों ने गांधी को परदेसी बताकर वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया। कमिश्नर अंग्रेज होने के कारण गांधी की उपस्थिति को अनावश्यक घोषित करने पर तुले थे। वहां गांधी जब पीड़ित कृषक के गांव के लिए प्रस्थान करते हैं, तब उन्हें चंपारण छोड़ने का आदेश मिल जाता है। इससे पूर्व अपनी वकील मंडली के माध्यम से रैयतों के इजहार लिखने का कार्य जोर-शोर से प्रारंभ हो चुका था। गांधी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, जब उन्हें मालूम हुआ कि 10,000 रैयतों में से सभी ने अंगूठे का प्रयोग किया है। शत-प्रतिशत निरक्षरता थी। आंदोलन के साथ-साथ गांधी मुंबई और अहमदाबाद से कुछ शिक्षकों को बुलाकर विद्यालय स्थापित करने की योजना बना चुके थे और महिलाओं के लिए अलग से शिक्षा विद्यालय की व्यवस्था की जिम्मेदारी कस्तूरबा को सौंपी गई। गांधी ने 2,900 गांवों की करीब 13,000 रैयतों की स्थिति का जायजा स्वयं लिया। एक महीने के अंदर जुलाई 1917 में एक जांच कमेटी का गठन हुआ और 10 अगस्त को तीनकठिया प्रथा समाप्त हो गई। 4 मार्च,1918 को चंपारण एग्रेरियन बिल पर गवर्नर जनरल के हस्ताक्षर के साथ अन्य काले बिल भी रद्द हो गए। 
इसी के साथ समूची मानव जाति को शांतिपूर्ण असहमति, सविनय अवज्ञा आंदोलन व सत्याग्रह जैसे जुझारू औजार भी मिले। अदालत में पेश होने पर गांधी के वक्तव्य ने अहिंसा सत्याग्रह का बीजारोपण कर दिया। उनका वक्तव्य था, मैं राष्ट्र व मानव सेवा करने के विचार से आया हूं। बिना किसी प्रकार का विरोध किए, आज्ञा न मानने, दंड सहने को तैयार हूं। मैंने सरकारी आज्ञा की अवज्ञा इस कारण से नहीं की कि मुझे सरकार के प्रति श्रद्धा नहीं है, बल्कि इस कारण से की कि मैंने उससे भी उच्चतर, अपनी विवेक बुद्धि की आज्ञा का पालन करना उचित समझा। इस वक्तव्य के साथ ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया। जिला छोड़ने के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह जिला छोड़कर नहीं जाएंगे और जेल जाने पर पुन: अपना कार्यस्थल चंपारण को बनाएंगे। अंग्रेज दक्षिण अफ्रीका में उनके सविनय प्रतिकार को देख चुके थे, उन्हें दोष मुक्त कर दिया गया। 
आज के हालात में गांधी भारतीय अस्मिता के प्रतीक हैं। दुनिया के अनेक नेता गर्व के साथ उनका अनुनायी होना स्वीकार करते हैं पर हमने गांधी का अर्थ गोलाकार चश्मा, लाठी या फिर धोती व अंबर चरखा तक सीमित कर दिया। उनके सवाल भारतीय जनमानस को अभी भी मथते हैं, जब सर्वधर्म समभाव, सत्य, अहिंसा व सत्याग्रह जैसे प्रश्नों पर नकारात्मक प्रतिक्रिया स्वीकार होती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazariya column 2 october 2020